'चक्रव्यूह' में बिड़ला और टाटा, अंबानी और बाटा

 शुक्रवार, 28 सितंबर, 2012 को 06:39 IST तक के समाचार
अभय देओल

'टाटा-बिरला' वाला ये गाना फिल्म में अभय देओल पर ही फिल्माया गया है.

प्रकाश झा की फ़िल्म बाद में रिलीज़ होती है, विवादों में पहले आ जाती है. अब उनकी आनेवाली फ़िल्म चक्रव्यूह भी 'टाटा-बिड़ला' के चक्रव्यूह में फंस गई है.

फ़िल्म का गाना 'बिड़ला हो या टाटा, अंबानी हो या बाटा, सबने अपने चक्कर में देश को है काटा' कई बड़े उद्योगपतियों के गले से नीचे नहीं उतर रहा है.

लेकिन प्रकाश झा किसी की भी परवाह किए बग़ैर कहते हैं, ''इस गाने पर कोई विवाद होना तो नहीं चाहिए. क्योंकि जो शब्द हमनें इस्तेमाल किए हैं जैसे टाटा या बिरला वो तो हमने विशेषण के तौर पर किए हैं. क्या असल ज़िंदगी में भी हम किसी बहुत अमीर आदमी की तुलना टाटा और बिड़ला से नहीं करते. हमने ये नाम प्रतीकात्मक तौर पर ही इस्तेमाल किए हैं. इस गाने के ज़रिए हम किसी पर कोई व्यक्तिगत प्रहार करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं.''

प्रकाश झा ये भी मानते हैं कि चक्रव्यूह के इस गाने पर जो विवाद हो रहा है उसे इतना तूल नहीं देना चाहिए और हर इंसान को अपने विचारों को रखने की आज़ादी होनी चाहिए.

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि क्योंकि चक्रव्यूह नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या पर आधारित फ़िल्म है तो इसमें 'हार्ड हिटिंग' बातें तो होंगी ही.

प्रकाश झा की बात से कुछ हद तक संगीत समीक्षक पवन झा भी सहमत दिखते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए पवन कहते हैं, ''क्रांतिकारी स्वभाव के जो गीत होते हैं उनमें विरोधाभास कूट-कूट कर भरा होता है और इस तरह के गाने कोई नई बात नहीं है. आज़ादी से पहले से ऐसे गीत बनते आए हैं जिनकी धार बहुत तीखी है. बात यहाँ हद और इरादे की है. जहाँ तक चक्रव्यूह के गीत की बात है मुझे वो गीत पसंद आया है. मुझे उसमें ज़्यादा कोई आपत्ति नहीं है.''

'शोषित वर्ग का विरोध'

"क्रांतिकारी स्वभाव के जो गीत होते हैं उनमें विरोधाभास कूट-कूट कर भरा होता है और इस तरह के गाने कोई नई बात नहीं है. आज़ादी से पहले से ऐसे गीत बनते आए हैं. बात यहाँ हद और इरादे की है. जहाँ तक चक्रव्यूह के गीत की बात है मुझे उससे ज्यादा कोई आपत्ति नहीं है."

पवन झा, संगीत समीक्षक

अपनी बात को पूरा करते हुए पवन झा कहते हैं, ''गीत में जो टाटा-अंबानी का नाम लिया गया है वो गीत का तोड़ नहीं है वो बस गीत को और निखार रहा है. मुझे लगता है कि ये इस्तेमाल अपनी हद में ही है लेकिन हाँ ये भी ज़रूर है कि जो बड़े ब्रांड हैं उन्हें अपने नाम के ऐसे इस्तेमाल से परेशानी होती है. लेकिन इस तरह के गीत हमेशा से ही हमारी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं.''

पवन झा ये भी मानते हैं कि अगर उद्योगपतियों को इस बात की आज़ादी है कि वो करोड़ों रूपए ख़र्च कर अपने ब्रांड को बनाए तो शोषित वर्ग को भी इस बात की आज़ादी होनी चाहिए कि वो अपना विरोध जता सकें.

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि अगर फ़िल्मकार इस तरह के गाने से किसी को कोई निजी क्षति पहुंचाने की कोशिश कर रहा है तो वो बात ग़लत है और इसीलिए तो हमारे पास सेंसर बोर्ड है जो इस तरह की बातों पर अंकुश लगा सकता है.

वैसे हम आपको ये भी बता दें की सेंसर बोर्ड को चक्रव्यूह के इस गाने से तब तक कोई आपत्ति नहीं हैं जब तक प्रकाश झा इसे एक डिसक्लेमर के साथ चलाते हैं.

वैसे एक बात तो मानने वाली है कि प्रकाश झा की फ़िल्मों का विवादों से चोली-दामन का साथ रहता है. उनकी फ़िल्म 'राजनीति' हो या फिर 'आरक्षण' सभी किसी न किसी विवाद में ज़रूर आई.

लेकिन ये बात उन्हें ज़्यादा परेशान नहीं करती. वो कहते हैं, ''अगर मैं किसी गंभीर मुद्दे पर आधारित कोई फ़िल्म बनाता हूँ और मेरी फ़िल्म पर कोई विवाद उठा है तो ये तो हमें एक मौक़ा प्रदान करता है न फ़िल्म के विषय पर चर्चा करने का. हम एक बुद्धिजीवी समाज का हिस्सा हैं और किसी भी प्रकार की बहस समाज के लिए अच्छी है.''

ये फ़िल्म अगले महीने की 12 तारीख़ को रिलीज़ हो रही है.

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