खान और बच्चन का इतिहास होता है औरों का नहीं

Image caption मनोज बाजपेयी ने 18 वर्षों में अपना एक प्रशंसक समूह बना लिया है.

पहले फ्लोर पर आ जाओ....ऊपर से आवाज़ आई..नज़र उठा कर देखा तो मनोज बाजपेयी आवाज़ लगा रहे थे. फटाफट ऊपर चढ़े तो दरवाज़ा भी मनोज ने खुद खोला था. दिल्ली से सटे गाजियाबाद का एक मिडिल क्लास फ्लैट होगा. बोले आप तैयारी कर लो मैं आता हूं बस.

पांच मिनट में वो बगल में आ बैठे थे. साधारण टी शर्ट, पैंट और हवाई चप्पल. लाइव चैट शुरु था. अंदाज़ा नहीं था कि इतना खुल कर जवाब देंगे मनोज.

सत्या का भीखू म्हात्रे और गैंग्स ऑफ वासेपुर का सरदार खान एकदम सामने था और सवालों के एकदम ईमानदार जवाब. बोले पैसा कमाना चाहता हूं प्रकाश झा को बोलिए आप लोग कि हमको ज़रा और पैसा दे.

तो क्या मनोज को अच्छा पैसा नहीं मिलता मतलब करोड़ में तो मिलता ही होगा ? अरे नहीं......कहां बात कर रहे हैं यही तो हम बोल रहे हैं मिलना चाहिए अच्छा पैसा. अच्छा रोल मिले लेकिन पैसा कमाना भी चाहते हैं.

और अभिनय से जो पहचान मिली उसका क्या? ऐसा है न कि जब इतिहास देखा जाएगा तो उसको तो डिफाइन शाहरुख और सलमान से ही न किया जाएगा. दिलीप कुमार की बात होगी, अमिताभ की होगी. शाहरुख की होगी. कोई मोतीलाल की बात नहीं करेगा.

हां लेकिन क्या पता इतिहास हमने तो नहीं देखा और आप तो कम से कम उन कलाकारों में से हैं जिनका चरित्र लोगों की जुबान पर चढ़ता है. अरे कहां यार हमारे प्रशंसक गिने चुने हैं. कम हैं निश्चित रुप से. हर दौर का स्टार होता है जो उस समय के माहौल को भी दिखाता है.

'पॉलिटिक्ली इनकरेक्ट हूं मैं'

ये बात सोचने वाली थी. बात सही है आज का दौर औसत दर्जे के अभिनय का तो ज़रुर है जिसमें कभी कभार मनोज वाजपेयी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकार आ टपकते हैं. खुशी की बात यही होती है कि इन लोगों को भी काम मिल रहा है.

लाइव चैट पर सवालों की बौछार के बीच मनोज उठे थे. लौटे तो हाथ में ट्रे थी. तीन कप चाय. बीच बीच में अपने मां पिताजी से भोजपुरी में बतियाते भी रहे. बच्ची से खेलते भी रहे.

सवालों के जवाब में एकदम कड़ा जवाब. कोई लाग लपेट नहीं. नक्सली मुद्दे पर बनी फिल्म चक्रव्यूह पर बोले नक्सलियों पर राय निजी है लेकिन इतना ज़रुर कहेंगे कि नक्सलियों की मांग गलत नहीं है तरीके पर बहस हो सकती है. किसी ने पूछा ये जवाब पॉलिटिकली करेक्ट तो नहीं. मनोज ने पलटवार किया- इंडस्ट्री में मेरे जितना पॉलिटिकली इनकरेक्ट कोई शायद ही होगा.

ब्लॉगिंग, टिवटर फेसबुक सब जगह हैं मनोज लेकिन क्यों. अरे हम जानना चाहते थे टेकनोलॉजी. इतना कुछ हो रहा है उसी के चक्कर में लेकिन फिर लगा कि लोग हमको हमारे अभिनय से जानें वही सबसे अच्छा है. हमको फॉलोअर बनाने का शौक नहीं है. अभी मां बाबूजी के लिए समय दिए हैं लैपटॉप ही नहीं लाए हैं.

मैंने कहा कि मनोज आप स्टार जैसे लगते नहीं हैं..बोले अरे अब क्या करें लबादा ओढ़ लें स्टार का क्या. जैसे हैं वैसे ही हैं.

उनकी छोटी सी बेटी गोद में चढ़ गई थी. मनोज सफल हैं और खुश भी कि उन्हें काम मिल रहा है. नाराज़गी भी है कि उनसे कई बेहतर अभिनेता पुराने दौर में बिना काम के खत्म हो गए.

गुस्सा कि अभी भी अभिनय का वो मेहनताना शायद नहीं मिलता जो मिलना चाहिए. गुस्सा वाजिब है लेकिन एक गर्व भी है कि ऐसे समय का हिस्सा हैं जिसने फिल्मोद्योग में न केवल बदलाव किया बल्कि उस बदलाव में एक भूमिका अदा की.

हो सकता है कि मनोज को पसंद करने वाले, उनके अभिनय के मुरीद सलमान खान और शाहरुख के फैन्स से कम हों लेकिन उन फैन्स के लिए मनोज किसी सुपरस्टार से कम नहीं हैं.

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