कैसी है इंग्लिश-विंग्लिश

इंग्लिश विंग्लिश

बॉलीवुड में किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री के लिए 'धमाकेदार वापसी' एक सपना होती है. फिर चाहे वो मुमताज रही हों, विनोद खन्ना हों, माधुरी दीक्षित हों या डिंपल कपाड़िया सबके लिए उनकी वापसी चुनौती रही है.

हां, अमिताभ बच्चन की बात अलग है जिन्होंने 80 और 90 के दशक में कुछ लापरवाह फिल्मों के बाद शानदार वापसी की. बात श्रीदेवी की करें तो उन्हें पूरा श्रेय जाता है अपनी वापसी के लिए एक ऐसी कहानी चुनने का, जिसकी 'हीरो' वो हैं.

गौरी शिंदे निर्देशित ये फिल्म बेहद मजेदार बन पड़ी है और इसे मध्यम वर्गीय परिवार जरूर पसंद करेंगे.

श्रीदेवी द्वारा निभाए गए शशि गोडबोले नाम की गृहिणी के किरदार से बहुत लोग आइडेंटिफाई करेंगे.

गौरी ने हल्के फुल्के दृश्यों के अलावा कई भावुक दृश्यों को भी खूबसूरती से फिल्माया है और उन्होंने फिल्म को जटिल होने से बचाए रखा है इस वजह से फिल्म काफी व्यावहारिक लगती है.

फिल्म की कहानी

Image caption श्रीदेवी फिल्म की जान हैं. उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया है.

ये फिल्म कहानी है एक घरेलू महिला शशि गोडबोले की, जिसे अंग्रेजी नहीं आती. ऐसा नहीं है कि इस वजह से उसकी जिंदगी में बड़ी दिक्कतें आती हैं.

एक कामयाब पति, दो प्यारे बच्चे और एक संपूर्ण परिवार है उसका. उसे महसूस होता है कि अंग्रेजी ना आने की वजह से उसे अपने परिवार से वो इज्जत नहीं मिल पा रही है जिसकी वो हकदार है.

कहानी में मोड़ तब आता है जब अमरीका में रह रही उसकी बहन की बेटी की शादी का न्यौता उसे मिलता है. वो खुशी से झूम उठती है और उसे लगता है कि चलो इस बहाने उसके एकाकी जीवन में कुछ रोमांच आएगा.

शादी की तैयारी के सिलसिले में उसे अपने बाकी परिवार से पहले अमरीका जाना पड़ता है लेकिन वहां पहुंचकर उसे करना पड़ता है कई मुश्किलों का सामना, क्योंकि इंग्लिश तो उसे आती नहीं.

अपने घर से पहली बार इतनी दूर आई शशि को अपने बच्चों और पति की याद सताने लगती है. तब अमरीकी सभ्यता और अंग्रेजी भाषा से अनजान शशि तय करती है कि अब वो अपनी पहचान खुद बनाएगी और वो तय करती है अंग्रेजी भाषा सीख कर रहेगी.

चंद ही हफ्तों में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से शशि इतनी अच्छी इंग्लिश सीख जाती है कि जब इसका खुलासा उसके परिवार वालों के बीच होता है तो सब भौंचक्के रह जाते हैं.

दिल को छू जाती है फिल्म

फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले ना दिखाया गया हो, लेकिन जिस सादगी और ईमानदारी से फिल्म बनाई गई है वो दिल को छू जाती है.

Image caption निर्देशक गौरी शिंदे के साथ श्रीदेवी. गौरी ने पहली ही फिल्म में अपनी प्रतिभा दिखा दी है.

कई दृश्य बड़े अच्छे बन पड़े हैं, जैसे अपने बच्चों के स्कूल में पैरेंट्स टीचर मीटिंग के दौरान अंग्रेजी ना आने पर शशि का शर्माना या उसके पति का उसे सिर्फ अच्छे लड्डू बनाने वाली समझना और उस पर शशि की प्रतिक्रिया वाले दृश्य काबिले तारीफ हैं.

श्रीदेवी का दमदार अभिनय

श्रीदेवी की जितनी तारीफ की जाए कम है. उन्होंने अपने किरदार के साथ इस कदर न्याय किया है कि फिल्म के अंत में आप भूल जाते हो कि वो श्रीदेवी हैं, आप उन्हें शशि गोडबोले ही समझने लगते हो.

साथी कलाकारों के रूप में उनके पति की भूमिका में आदिल हुसैन बहुत जमे हैं. कुछ कुछ दृश्यों में तो वो श्रीदेवी से भी बाजी मार ले गए हैं. बाकी के कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है. हां, कहीं कहीं पर फिल्म प्रिडिक्बल जरूर हो जाती है लेकिन दृश्यों को जरूरत से ज्यादा नहीं खींचा गया है इसलिए निराशा नहीं होती.

कुल मिलाकर इंग्लिश विंग्लिश आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में कामयाब होती है और नई पीढ़ी के लोगों को महसूस कराती है कि आखिर क्यों कभी श्रीदेवी इतनी बड़ी स्टार थीं. अब निश्चित तौर पर लोगों को उनकी अगली फिल्म का बेसब्री से इंतजार रहेगा.

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