किसमें है देसी जेम्स बॉन्ड बनने का दम?

काफी वर्षों से मैं 60 के दशक की एक फिल्म की कोई कॉपी ढूँढने की कोशिश में लगी हूँ. शायद कोई वीसीडी मिल जाए, घिसा पिटा कैसेट मिल जाए....इस फिल्म का नाम है गोल्डन आइज़: सीक्रेट एजेंट 077

अगर आप भी पहली नज़र में धोखा खा गए हों कि ये जेम्स बॉन्ड की कोई फिल्म है तो आप अकेले नहीं हैं. ये 007 नहीं 077 है. ये दरअसल बॉन्ड की तर्ज़ पर बनी एक ‘कॉपीकैट’ हिंदी फिल्म है.

ब्रिटेन के पास जेम्स बॉन्ड जैसा आशिकमिजाज़, दिलफेंक, दिलेर, आधुनिक गैजट से लैस, तेज़ तर्रार जासूस है. पर क्या बॉलीवुड के पास अपना जेम्स बॉन्ड है? क्या हिंदी सिनेमा में बनने वाली स्पाई फिल्में जेम्स बॉन्ड को टक्कर दे पाई हैं?

जेम्स बॉन्ड के दीवाने भारत में कम नहीं. हिंदी फिल्मों के किंग खान भी बॉन्ड फैन हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि वे भी बॉन्ड का रोल करना चाहते हैं.

हिंदी सिनेमा में समय-समय पर जासूसी फिल्में बनी हैं लेकिन जासूस कभी भी बॉलीवुड का पसंदीदा किरदार नहीं रहा.

देसी बॉन्ड: न आशिक मिजाज़ न दिलफेंक

40 और 50 के दशक के सुपरस्टार अशोक कुमार की फिल्म समाधि जासूसी से जुड़ी चंद शुरुआती फिल्मों में से एक है. वैसे अशोक कुमार की युवा, जोशीले और साहसी जासूस के तौर कल्पना करना ज़रा मुश्किल है लेकिन ये फिल्म सुपरहिट थी. अशोक कुमार के साथ थी दो हसीनाएँ नलिनी जयवंत और कुलदीप कौर.

कहने को तो ये स्पाई फिल्म थी लेकिन जासूसी और देश प्रेम के साथ-साथ ये एक भावनात्मक, रिश्तों में उलझी प्रेम कहानी भी थी जहाँ हीरोइन गाती है- गोरे गोरे ओ बाँके छोरे.

50 के दशक से कितनी ही हिंदी स्पाई फिल्में आई हैं लेकिन देसी जेम्स बॉन्ड विदेशी जेम्स बॉन्ड से बहुत अलग हैं.

जेम्स बॉन्ड के पास आधुनिक गैजेट हैं, उसका शायद ही कोई परिवार दिखाया जाता है, वो भावनात्मक तानों में कम ही उलझता है, वो शायद थोड़ा सा ‘सेक्सिस्ट’ है, कई हसीनाओं के साथ रिश्ते बनाने और तोड़ने में उसे पल भर का भी वक़्त नहीं लगता.

पर भारतीय जेम्स बॉन्ड ऐसा नहीं है. वो पारिवारिक है, उसकी ज़िंदगी में एक ही लड़की के लिए जगह होती है, फिल्म की कहानी जासूस की कहानी होते हुए भी रिश्तों के तानों बानों की कहानी होती है.

हिंदी फिल्मों के जासूसी हीरो

मिसाल के तौर पर 1967 में आई हिट फिल्म फ़र्ज़. एजेंट 116 बने जितेंद्र इसमें एक अन्य एजेंट की हत्या का मामला सुलझाते हैं. फिल्म की शुरुआत ही होती है बहन की शिकायत से जो भाई के जासूसी काम से अनजान उससे नाराज़ है.

जासूसी और दुश्मनों से लड़ने के बीच हीरो को हीरोइन के साथ मस्त बहारों का मैं आशिक और हम तो तेरे आशिक हैं सदियों पुराने गाने का भी समय मिल जाता है.

फ़र्ज़ के एक ही साल बाद आई धर्मेंद्र और माला सिन्हा की फिल्म आँखें. इसमें हीरो और हीरोइन दोनों ही जासूस हैं. इनके पास बॉन्ड जैसे आधुनिक गैजेट तो नहीं है पर दीवार के पीछे छुपे टेलीफोननुमा बक्से और ऐसे कई उपकरण इसमें दिखाने की कोशिश ज़रूर की गई. ये बॉन्ड तो भारत के बाहर जापान और बेरुत में भी जाता है.

ये कमोबेश हिंदी सिनेमा की बेहतर स्पाई फिल्मों में से एक है. लेकिन इसका मूल भी देश भक्ति के साथ-साथ पारिवारिक और भावनात्मक रिश्ते हैं.

इन दो फिल्मों की कामयाबी के बाद 60 और 70 के दशक में कई स्पाई फिल्में बनीं- ज़्यादातर विफल और कुछ एक सफल.

भारतीय परिवेश से अलग है बॉन्ड

लोगों ने भले ही अब जाकर सैफ अली खान को एजेंट विनोद के रूप में देखा हो लेकिन 1977 में आई फिल्म एजेंट विनोद पहले ही धूम मचा चुकी थी.

अभिनेता महेंदर संधू ने बॉन्डनुमा किरदार किया था. कोशिश की गई थी उन्हें जेम्स बॉन्ड के काफी करीब दिखाने की....आधुनिक तकनीक, सेक्सी अंदाज़, कोई परिवार नहीं. हीरो के बारे में कहा जाता था...लोमड़ी का दिमाग, शेर का जिगर.

फ़र्ज़ के निर्देशक रविकांत ने 1979 में जासूस को नए कलवेर में पेश किया मिथुन के रूप में फिल्म सुरक्षा में- जासूस का नाम था गनमास्टर जी 9. फिल्म और बप्पी लाहिड़ी के गाने भले ही हिट हुए हों लेकिन ये किरादर जेम्स बॉन्ड के इर्द-गिर्द भी नहीं थी.

मुझे जेरी पिन्टो का एक लेख याद जाता है जहाँ उन्होंने फिल्म सुरक्षा की बात करते हुए कुछ यूँ लिखा था, “फिल्म में एक जासूस का शव निकाला जाता है जिसे देखकर एक व्यक्ति कहता है कि लगता है कि इसकी प्लास्टिक सर्जरी हुई है. इसके सुबूत के तौर पर वो प्लास्टिक के कुछ टुकड़े दिखाता है.”

क्यों देसी बॉन्ड जेम्स बॉन्ड की तुलना में कमतर नज़र आता है. क्या हिंदी सिनेमा के पास वैसा डैशिंग हीरो नहीं है जो बॉन्ड जैसे जासूस का किरदार निभा सके. क्या वैसी स्क्रिप्ट नहीं है, वैसे निर्देशक नहीं है?

न पैसा, न स्क्रिप्ट

कारण कई हैं. पहले तो जेम्स बॉन्ड का सांस्कृतिक परिवेश एकदम अलग है. बॉन्ड के जैसी आशिकमिजाज़ी, अंतरंग संबंध ,चुंबन वाले दृश्य भारतीय परिवेश पूरी तरह से फिट नहीं बैठते.

हालांकि ऐसे अंतरंग दृश्यों वाली वाली हिंदी फिल्में अब बनने लगी हैं लेकिन इस बात के आसार कम ही हैं कि बॉन्डनुमा बड़ी बजट वाली फिल्म का कोई हीरो इसके लिए तैयार होगा- कोई शाहरुख, आमिर या सलमान या फिर अक्षय कुमार.

शाहरुख़ खान ट्विटर पर लिखते हैं, “ मैं भी बॉन्ड जैसा रोल करना चाहता हूँ लेकिन मुझे बताया गया है कि मैं औरतों और बंदूकों के साथ उतना कारगर नहीं हूँ.”

सलमान खान ने हाल ही में सुपरहिट स्पाई फिल्म एक था टाइगर में जासूस का रोल किया था. ये देसी बॉन्ड जासूस तो है पर अंतत: फिल्म प्रेम कहानी भी है.

कौन होगा देसी बॉन्ड

एजेंट विनोद हो या एक था टाइगर...इनमें बॉन्डनुमा गुण हैं. ये सब अपने देश के लिए काम कर रहे हैं, क्यूबा, रूस जैसी जगहों पर जाकर देश के दुश्मनों का पीछा करते हैं....

लेकिन एक अच्छी स्पाई फिल्म के लिए खूबसूरत लोकेशन, हसीनाएँ, एक्शन सीन, देशभक्ति की भावना और आकर्षक हीरो काफी नहीं है...इसके लिए अच्छी कहानी की भी दरकार है जो दर्शकों को बाँधे रखे. शायद बजट भी यहाँ आड़े आता होगा. बॉन्ड फिल्मों जैसा बजट हिंदी फिल्मों के पास कहाँ?

इसलिए शायद बॉन्ड कभी देसी नहीं हो पाएगा...कम से कम आने वाले सालों में तो नहीं.

फिलहाल तो एजेंट विनोद और टाइगर जैसे जासूसों से ही काम चलाना होगा. सोचने वाली बात ये है कि कौन से भारतीय हीरो जेम्स बॉन्ड जैसा किरदार कर सकते हैं– जिसमें वैसी ही कशिश हो, जो कुछ भी करे पर वो विश्वसनीय लगे, जो अभिनय से भी वैसा ही जादू कर सके जैसा वो लड़कियों पर करता है...

काश जवानी के दिनों में अमिताभ बच्चन को ऐसा कोई रोल करने को मिला होता. इस बीच हिंदी स्पाई हीरो को समझने की मेरी तलाश जारी है और साथ ही इस गोल्डन आइज़: सीक्रेट एजेंट 077 नाम की फिल्म की कैसेट ढूँढने की भी.

007 से तो कई बार मिल चुकी हूँ लेकिन 077 कहीं मिल जाए तो ज़रूर बताएँ.

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