कैसी है चटगांव

 शुक्रवार, 12 अक्तूबर, 2012 को 13:32 IST तक के समाचार
चटगांव

अगर इतिहास का सिलसिलेवार वर्णन ना किया जाए तो कई बार उसे भुला दिया जाता है. इसलिए इसका सही विवरण बहुत ज़रूरी है.

अगर इतिहास की किसी महत्तवपूर्ण घटना के बारे में लोगों को सही तौर पर जानकारी देने के लिए इसे प्रमाणिक तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा जाना एक अच्छा तरीका है. चटगांव कहानी है 18 साल से कम उम्र के युवा, उत्साही बच्चों के स्वतंत्रता संघर्ष की, जिसे लगभग भुला दिया गया है.

इस फिल्म के साथ निर्देशन के मैदान में उतरे बेदब्रत पाइन ने जबरदस्त शुरुआत की है. उन्होंने अपनी पत्नी शोनाली बोस के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा भी लिखी है. इतिहास को पसंद करने वाले लोगों को ये फिल्म बहुत भाएगी.

हम सब जानते हैं कि ब्रिटिश राज के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की कहानी तकरीबन 100 साल तक चली. चटगांव संघर्ष की इस दास्तां में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के शामिल होने की वजह से कई नेताओं को इस संघर्ष पर अपनी निगाह जमाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

कहानी

फिल्म की कहानी आखिर तक बांधे रखती है.

हालांकि किशोरों की इस सेना के नेता सूर्या सेन (मनोज बाजपेई) थे लेकिन फिल्म की कहानी सुबोध उर्फ झुनकू रॉय (देलज़ाद हिवाले) के इर्द गिर्द घूमती है.

झुनकू के अलावा इस सेना के दूसरे महत्तवपूर्ण किरदार हैं प्रीतिलता, कल्पना दत्ता, गणेश घोष, निर्मल सेन, अंबिका चक्रवर्ती, नरेश रॉय, जिबन घोषाल, आनंद गुप्ता, सुरेश डे, , तारकेश्वर, और अनंता सिंह.

फिल्म चटगांव संघर्ष की कहानी झुनकू रॉय के नज़रिए से दिखाती है. ये संघर्ष अंतत: नाकामयाब रहा और कई किशोरों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

चटगांव

  • कलाकार: मनोज बाजपेई, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, बैनी जॉन
  • संगीत: शंकर-अहसान-लॉय
  • गीतकार: प्रसून जोशी
  • रेटिंग: ***1/2

झुनकू, इस बाग़ी दल के नेता सूर्या सेन का ज़बरदस्त प्रशंसक है. सूर्या को उनके अनुयायी मास्टरदा भी बुलाते हैं.

संघर्ष की ये कहानी आपको पूरे समय बांधे रखती हैं. जिसमें ब्रिटिश राज के अत्याचार भी विस्तार से दिखाए गए हैं.

बेहतरीन अभिनय

फिल्म के सभी कलाकारों के शानदार अभिनय ने निर्देशक का काम काफी आसान कर दिया है. मनोज बाजपेई, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, राज कुमार यादव, दिब्येंदु भट्टाचार्य, बैरी जॉन और जयदीप अहलावत जैसे कलाकारों ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया है.

फिल्म एक मस्ट वॉच है. स्वतंत्रता के इस संघर्ष को बेहद प्रमाणित तरीके से पेश किया गया है.

फिल्म का एक्शन ड्रामा आपको पूरे वक्त बांधे रखता है. फिल्म की पटकथा अगर सशक्त ना होती तो फिल्म एक डॉक्यूमेंट्री बनकर रह जाती.

इससे पहले भी इसी विषय पर खेलें हम जी जान नाम की एक फिल्म भी बनी थी जो दर्शकों को बिलकुल प्रभावित नहीं कर पाई थी. लेकिन चटगांव उस फिल्म से काफी बेहतर बन पड़ी है.

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