कैसा है प्रकाश झा का 'चक्रव्यूह'?

 बुधवार, 24 अक्तूबर, 2012 को 12:23 IST तक के समाचार
चक्रव्यूह

प्रकाश झा की छवि एक ऐसे फिल्मकार की है जो कला और व्यवसाय का ख़ूबसूरत समन्वय करना जानते हैं. लेकिन मुझे तो दामुल और मृत्युदंड वाले प्रकाश झा से ही उम्मीदें थीं. उसके बाद तो वो भी बॉक्स ऑफिस के मोह में फंस गए.

मुझे उनके इस बॉक्स ऑफ़िस प्रेम से कोई तकलीफ नहीं है लेकिन परेशानी तब हो जाती है जब वो इस चक्कर में अपने सिनेमा से समझौता करने लगते हैं.

'चक्रव्यूह' नाम से ऐसा लगता है मानो एक बेहद रोचक प्लॉट लेकर आए हैं प्रकाश झा.

"फिल्म नक्सलवाद की समस्या पर आधारित है. हालांकि कहानी काल्पनिक है लेकिन इसमें कई वास्तविक घटनाओं के संदर्भ लिए गए हैं, गोविंद सूर्यवंशी (ओम पुरी) का किरदार जो कोबाड़ गांधी से प्रेरित है."

अर्णब बनर्जी, फिल्म समीक्षक

फिल्म के केंद्रबिंदु में हैं दो दोस्त- आदिल खान (अर्जुन रामपाल) और कबीर (अभय देओल). आदिल एक सीनियर रैंक का पुलिस अफसर है और कबीर एक तुनकमिजाज आदर्शवादी.

फिल्म नक्सलवाद की समस्या पर आधारित है. हालांकि कहानी काल्पनिक है लेकिन इसमें कई वास्तविक घटनाओं के संदर्भ लिए गए हैं, जैसे आदिल ख़ान का तबादला नंदीघाट (वास्तविक नंदीग्राम को यहां नंदीघाट कर दिया गया है) नाम की जगह पर होता है, जहां नक्सलियों ने कहर ढा रखा है.

गोविंद सूर्यवंशी (ओम पुरी) का किरदार जो कोबाड़ गांधी से प्रेरित है.

फिल्म की कहानी

अर्जुन रामपाल अपने किरदार की गहराई को समझ नहीं पाए हैं.

राजन (मनोज बाजपेई) एक कुख्यात नक्सली नेता है. जिस पर 80 से ज़्यादा पुलिसवालों को मारने का आरोप है.

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उसके गुट के साथ एक एनकाऊंटर के दौरान आदिल खान (अर्जुन रामपाल) घायल हो जाता है. तब उसका जिगरी दोस्त कबीर (अभय देओल) पुलिस का मुखबिर बनकर राजन के गैंग में शामिल हो जाता है.

फिल्म में 'मेदांता स्टील' का भी ज़िक्र किया गया है और लोगों को तकलीफ नहीं होगी ये समझने में प्रकाश झा कैसे असल ज़िंदगी में प्रादेशिक सत्ता, आदिवासी और पुलिस के बीच के संघर्ष को दिखाना चाहते हैं.

कबीर, पुलिस का मुखबिर बनकर राजन के गैंग में शामिल होता है, लेकिन धीरे धीरे उसे नक्सलियों से हमदर्दी होने लगती है और अब पुलिस और नक्सलियों के साथ ही आदिल और कबीर के बीच एक संघर्ष छिड़ जाता है. आदर्शवादी आदिल ख़ान, कबीर को धोखेबाज़ समझने लगता है.

फिल्म की गति काफी तेज़ है. लेकिन कहानी उतनी मज़बूत नहीं है.

अभय देओल अपने रोल में छाप छोड़ते हैं.

कबीर का राजन के गिरोह में आसानी से शामिल हो जाना, राजन को उस पर शक़ ना होना इसके बाद कबीर की विचारधारा में अचानक बदलाव आना और आदिल का कबीर पर से भरोसा टूटने जैसे दृश्य बहुत विश्वसनीय नहीं बन पाए हैं.

कलाकारों का अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी कमी है अर्जुन रामपाल. वो अपने रोल की गहराई को समझ ही नहीं पाए. देखने में वो ज़रूर प्रभावशाली लगे हैं.

अभय देओल एक सशक्त अभिनेता है लेकिन उनका रोल उभरकर नहीं आ पाया है. हालांकि उन्हें जितना मौका मिला है वो अपनी छाप छोड़ते हैं.

चक्रव्यूह

  • कलाकार: अर्जुन रामपाल, अभय देओल, मनोज बाजपेई, ईशा गुप्ता
  • निर्देशक: प्रकाश झा
  • रेटिंग: ** 1/2

ओम पुरी और मनोज बाजपेई के करने के लिए फिल्म में कुछ खास था ही नहीं लेकिन जितना भी है वो संभाल लेते हैं.

परदे पर दो दोस्तों की कहानी हमेशा ही रोचक लगती है लेकिन यहां एक हटकर और अच्छी बात ये है कि सिर्फ दोस्ती पर ही पूरी फिल्म नहीं है.

कैसा है निर्देशन

'चक्रव्यूह' बहुत से सवाल खड़े करती है. क्या नक्सलवादियों का रास्ता सही है? क्या पुलिस की भूमिका सही है? क्या अफ़सरशाही ठीक फैसले लेती है. क्या सत्ता सिर्फ अपना फायदा देखती है.

अपनी फिल्म 'राजनीति' की अस्पष्ट खिचड़ी और 'आरक्षण' की बेसिरपैर की कहानी के बाद प्रकाश झा ने इस बार मुद्दा तो सही उठाया है और उनकी मंशा भी सराहनीय है लेकिन इन सबके बावजूद प्रकाश झा एक कलात्मक फिल्म नहीं दे पाए हैं.

इतना गंभीर विषय उठाकर भी प्रकाश झा दर्शकों के दिलों को झकझोर नहीं पाते.

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