हर फ़िल्म देखने का 'दर्द' !

 रविवार, 28 अक्तूबर, 2012 को 08:58 IST तक के समाचार
एक था टाइगर

फ़िल्म समीक्षा करने में दर्द कैसा? लगभग हर नई फिल्म देखो और उनकी चीर-फाड़ करो.

फ़िल्म समीक्षकों को कुछ ऐसा ही जवाब मिलता है जब वो किसी से खराब फ़िल्म को देखने का दुख बांटते हैं.

अपनी पहली किताब "द एडवेंचर्स ऑफ एन इंट्रेपिड फ़िल्म क्रिटिक" में फ़िल्म समीक्षक एना वेट्टिकाड लिखती हैं, "मेरे दोस्त कहते हैं कि ख़राब फिल्में देखने की जरुरत क्या है. सिर्फ अच्छी फिल्में देखो. तो मेरा जवाब होता है बगैर देखे कैसे तय कर लूँ कि कौन सी फ़िल्म अच्छी है और कौन सी बुरी?"

एना ने अपनी किताब में 2011 में रिलीज हुई सभी छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी, जानी-पहचानी हिंदी फिल्मों को देखकर उनकी समीक्षा करने का अनुभव बांटा है.

"साल की सबसे बुरी फिल्म देखने की यातना क्या होती है काश आप भी जान पाते. खुद को दुख पहुंचाने का इससे अच्छा तरीका कोई नहीं हो सकता."

फिल्म समीक्षक एना वेट्टिकाड की किताब से

एना कहती हैं "जनता तो रिव्यू देखकर तय कर सकती है कि उसे फलां फ़िल्म देखने जाना है या नहीं पर एक समीक्षक के नाते हमारे पास ये आज़ादी नहीं है. इसलिए कभी-कभी हमारी जिंदगी दुख भरी हो जाती है."

समीक्षा में निष्पक्षता

समीक्षक सुभाष के झा मानते हैं कि कई बार फ़िल्म जगत से दोस्ती होने के कारण भी उनका काम कठिन हो जाता है.

सुभाष बताते हैं "पश्चिम में समीक्षकों को किसी भी सितारे से मेलजोल बढ़ाने की मनाही है.अगर वो किसी फिल्मी हस्ती के साथ देखे जाते हैं तो उन्हें समीक्षक के पद से हटा दिया जाता है. पर भारत में ऐसा नहीं है. हम समीक्षक भी हैं और फ़िल्म वालों के दोस्त भी हैं. मेरे तो कई दोस्त हैं."

सुभाष कहते हैं कि उनके लिए समीक्षा में निष्पक्षता लाना मुश्किल है. साथ ही वो ये भी मानते हैं कि समीक्षा करने के लिए गांधी बनने की जरुरत नहीं है.

वहीं एना मानती है कि फिल्मी हस्तियों के साथ उनके अच्छे संबंध है पर उनकी दोस्ती किसी से नहीं है.

एना कहती हैं "मेरी किताब की भूमिका रणबीर कपूर ने लिखी है लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि मैं उनकी हर फ़िल्म की तारीफ ही करूँ.
मुझे करण जौहर की 'माय नेम इज़ खान' बहुत अच्छी लगी थी, पर 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी और मैंने ये साफ-साफ कहा भी."

बॉक्स ऑफिस हिट की समीक्षा

चिटगांव,हिंदी फिल्म

बॉक्स ऑफिस पर चिटगांव हिट नहीं थी पर समीक्षकों को काफी पसंद आई.

बॉक्स ऑफिस पर तीन दिन में पैसा कमाने वाली सुपरहिट फिल्मों के बारे में बात करते हुए एना कहती हैं,"ऐसी फिल्मों को शायद हमारी समीक्षा से कोई फर्क ही नहीं पड़ता. जैसे सलमान के फैंस तो उनकी फ़िल्म देखने जाएंगे ही पर हां, जो उसके फैंस नहीं है हमारी समीक्षा शायद उनके कुछ काम आ जाती है."

सुभाष के मुताबिक "बड़ी नहीं छोटी फिल्मों को समीक्षकों की ज़्यादा जरुरत है. वो फिल्में जो बड़ा बजट रखने या मार्केटिंग करने में सक्षम नहीं है, समीक्षकों का रोल वहां ज्यादा महत्वपूर्ण होता है."

छोटी और गुमनाम फिल्में

पर ज़रूरी नहीं कि हर छोटी फ़िल्म अच्छी ही हो. 2011 की एक छोटी और अज्ञात फ़िल्म 'टेंशन दूर' ने एना को इतना तनाव दिया कि उन्होंने अपनी किताब का आखिरी अध्याय उस फ़िल्म को समर्पित किया.

वहीं सुभाष झा को इस साल रिलीज हुई फ़िल्म 'क्या सुपर कूल हैं हम' इतनी बुरी लगी कि उन्होंने फ़िल्म को कोई रेटिंग ही नहीं दी .

पर वो मानते हैं कि फिल्मों की सफलता पर समीक्षा का कोई असर नहीं पड़ता है.

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.