सितारे जोखिम नहीं उठाते: ज़ोया अख़्तर

रानी मुखर्जी. रीमा कागती, ज़ोया अख्तर

हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री ने 70 और 80 के दशक में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और मौजूदा दौर में शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान और आमिर ख़ान सरीखे सुपरस्टार देखे हैं.

बॉलीवुड को इस 'स्टार कल्चर' ने फ़ायदा ज़्यादा पहुंचाया है या नुक़सान. लंबे समय से ये बहस चली आ रही है.

क्योंकि कई लोगों का मानना है कि फ़िल्म में अगर बड़े सितारे हों तो उसके कामयाब होने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है जबकि कई लोगों का ये भी मानना है कि सितारे फ़िल्म में हों तो बाक़ी बातें जैसी उसकी कहानी या निर्देशन गौण हो जाते हैं जिससे अंतत: फ़िल्म की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

निर्देशक और लेखक ज़ोया अख़्तर क्या सोचती हैं इस बारे में. बीबीसी से ख़ास बातचीत करते हुए ज़ोया अख़्तर कहती हैं, "सच्चाई तो ये है कि इस स्टार कल्चर ने ही हमारी इंडस्ट्री को ज़िंदा रखा है. जिन फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ में सितारे नहीं है वो ख़त्म हो रही हैं. हॉलीवुड, बॉलीवुड और चीनी फ़िल्म इंडस्ट्री में ज़बरदस्त स्टार कल्चर है. और देखिए, ये तीनों ही इंडस्ट्री ना सिर्फ़ ज़िंदा हैं, बल्कि लगातार प्रगति करती जा रही हैं."

स्टार सिस्टम का नुकसान

ज़ोया, इस महीने के आख़िर में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म तलाश की सहलेखिका हैं. तलाश में आमिर ख़ान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी जैसे बड़े सितारे हैं.

ज़ोया के मुताबिक़ फ़िल्म में बड़ा सितारा हो तो लोग उसे देखने के लिए सिनेमाहॉल में खिंचे चले आते है. इससे फ़िल्म व्यापार को ज़बरदस्त फ़ायदा होता है और इंडस्ट्री में लगातार पैसा आता रहता है. लेकिन ज़ोया इस सिस्टम में एक कमी भी पाती हैं.

वो कहती हैं, "बड़े सितारे जोखिम नहीं उठाना चाहते. वो वही करते हैं जो उनके प्रशंसक उनसे चाहते हैं या जो वो पसंद करते आए हैं. फ़िल्म में कुछ मारधाड़ वाले सीन डाल दो. आइटम सॉन्ग डाल दो. लो बन गई फ़िल्म. अब सितारे प्रयोग नहीं करेंगे तो अच्छी फ़िल्में कहां से बनेंगी."

लेकिन ज़ोया अपने आपको इस मामले में ख़ुशनसीब मानती हैं कि उनकी फ़िल्म 'तलाश' में आमिर ख़ान जैसे बड़े सितारे हैं जो बाक़ी स्टार्स से अलग हैं और जोखिम लेने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते.

कामयाबी का भरोसा

'तलाश' एक सस्पेंस ड्रामा है. इस तरह की फ़िल्में बनाने में क्या ख़तरा नहीं होता क्योंकि एक बार जो ये फ़िल्म देख ले उसे सस्पेंस का पता चल जाता है और वो दोबारा फ़िल्म को देखने से हिचकिचाएगा.

ये सवाल पूछने पर ज़ोया बोलीं, "फ़िल्म सस्पेंस ड्रामा है. लेकिन हमने इसके किरदारों को काफ़ी इमोशनल स्ट्रेंथ यानी भावनात्मक शक्ति दी है. क्योंकि मुझे लगता है कि दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ना बेहद ज़रूरी है. तभी आपकी फ़िल्म कामयाब हो सकती है. हमने ऐसा किया है इसलिए फ़िल्म की सफलता को लेकर हम आशान्वित हैं."

फ़िल्म 'तलाश' ज़ोया अख्तर और रीमा कागती ने मिलकर लिखी है. इसका निर्माण ज़ोया के भाई फ़रहान अख़्तर की एक्सेल इंटरटेनमेंट कंपनी और आमिर ख़ान मिलकर कर रहे हैं. फ़िल्म का निर्देशन रीमा कागती ने किया है और ये 30 नवंबर को रिलीज़ हो रही है.

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