कैसी है 'मटरु की बिजली का मंडोला'

 'मटरु की बिजली का मंडोला'

फिल्म मटरु की बिजली का मंडोला की कहानी हरियाणा के एक गांव की है जहां एक अमीर उद्योगपति हैरी मंडोला (पंकज कपूर) है. उसकी नज़र गांव के किसानों की ज़मीन पर है. और वो किसी भी तरह से वो ज़मीन हथियाकर वहां अपनी फैक्ट्री बनाना चाहता है.

दूसरी ओर किसान अपनी ज़मीन बेचना नहीं चाहते लेकिन उनकी आर्थिक हालत बेहद ख़राब है. बारिश ना होने की वजह से फसलें नहीं हो पा रही हैं और बैंक अपना लोन वसूलने के लिए उनके पीछे पड़े हैं.

हुकुम सिंह मटरु (इमरान खान) एक पढ़ा लिखा ड्राइवर है और मंडोला का सहयोगी है. बिजली (अनुष्का शर्मा) मंडोला की बिंदास बेटी है.

Image caption पंकज कपूर ने शानदार अभिनय किया है.

मंडोला बिजली की शादी बादल (आर्य बब्बर) से कराना चाहता है जो मंत्री चौधरी देवी (शबाना आज़मी) का बेटा है. मंत्री के एक दस्तखत से मंडोला को फैक्ट्री बनाने की इजाजत मिल सकती है.

मटरु, किसानों से हमदर्दी रखता है और चाहता है कि वो ज़मीन ना बेचें. जल्द ही बिजली भी मटरु के इस मकसद में उसकी मदद के उद्देश्य से शामिल हो जाती है और बादल के साथ शादी ना करने का फैसला कर लेती है. क्योंकि वो जानती है कि बिना इस शादी के बादल की मां मंडोला को ज़मीन पर फैक्ट्री बनाने की इजाज़त नहीं देगी.

लेकिन बादल की मां और बादल भी इस शक्तिशाली उद्योगपति की बेटी से शादी करने पर आमादा हैं.

इसके बाद क्या होता है. क्या मंडोला अपनी बेटी की शादी बादल से करा पाता है. या मटरु इस शादी के बीच में आ जाता है. क्या आखिर में किसी का ह्रदय परिवर्तन होता है. अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बेटे या बेटी की शादी कराना, बॉलीवुड में ये कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है.

फिल्म की लंबाई कमज़ोर पहलू

अभिषेक चौबे और विशाल भारद्वाज का स्क्रीनप्ले ज़रूरत से ज़्यादा खींचा गया है और कहानी बिखरी हुई ली लगती है.

कहानी में नयापन नहीं है इसलिए ड्रामा लोगों को बोर करने लगता है. इंटरवल से पहले कहानी काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है और दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है.

कहानी में गति इंटरवल के बाद ही आती है और ये दूसरा हिस्सा थोड़ा बेहतर है.

दर्शकों के एक खास वर्ग को ही फिल्म थोड़ी पसंद आ सकती है. ऐसे बहुत कम दृश्य हैं जिन पर सभी को हंसी आएगी. ज़्यादातर दृश्य सिर्फ क्लास को भाएंगे.

जैसे बार-बार माओ-त्से-तुंग से संबंधित हास्य सिर्फ कुछ लोगों को ही पसंद आएगा.

साथ ही मंडोला का नशे में धुत होकर अपने ही खिलाफ मोर्चा निकालना कई लोगों का शायद उतना हास्यास्पद ना लगे.

Image caption अनुष्का शर्मा ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन उनको कम मौके दिए गए हैं.

हां, बादल और बिजली की शादी का दृश्य काफी मनोरंजक बन पड़ा है. हेलीकॉप्टर दुर्घटना के बाद यूएफओ का कोण ज़बरदस्ती डाला गया लगता है. इस दृश्य में हंसी नहीं आती और दर्शक इसकी तुलना हालिया फ्लॉप 'जोकर' से करने पर मजबूर करता है.

फिल्म एक लड़की और दो लड़कों की कहानी है लेकिन इसमें रोमांस नहीं है. भावनाएं नहीं है. ड्रामा कई दूसरी फिल्मों जैसा है.

अभिनय

पंकज कपूर ने ज़बरदस्त काम किया है. वो बेहद स्वाभाविक लगे हैं और उनकी जितनी तारीफ की जाए वो कम है.

इमरान खान एक हरियाणवी लड़के का रोल ठीक से निभा गए हैं. उनका अभिनय भी काबिले-तारीफ है. वो देखने में भी अच्छे लगे हैं.

अनुष्का शर्मा भी बढ़िया हैं हालांकि उनको ज़्यादा मौके नहीं मिले हैं. शादी वाले दृश्य में उनका अभिनय शानदार है.

आर्य बब्बर ने ज़ोरदार काम किया है. वो इस फिल्म से सबसे ज़्यादा उभर कर सामने आए हैं. शबाना आज़मी ने भी बेहद सहज अभिनय किया है और अपना प्रभाव छोड़ती हैं.

नवनीत निशान भी अच्छी हैं. फिल्म में नेत्रहीन बालक की भूमिका निभाने वाले बच्चे ने शानदार काम किया है.प्रणय नारायण ( मंत्री के सेक्रेट्री), एस के बत्रा (डॉक्टर) और बाकी कलाकारों ने भी अच्छा सहयोग दिया है.

निर्देशन

विशाल भारद्वाज का निर्देशन अच्छा है. लेकिन वो दर्शकों के सभी वर्ग को लुभा नहीं पाए हैं.

गांव का माहौल और किसानों की समस्या से शहरी जनता ज़्यादा इत्तेफाक़ नहीं रख पाएगी. विशाल का संगीत मिला जुला है.

'ओए ब्वॉय ओ ब्वॉय चार्ली' और टाइटल गीत अच्छे बन पड़े हैं. लेकिन बाकी गाने उतना प्रभाव पैदा नहीं कर पाएंगे. हां गुलज़ार के गीतों के बोल ज़रूर अच्छे हैं. गानों की कोरियोग्राफी (दिनेश, बॉस्को-सीज़र और सरोज खान) अच्छी है. लेकिन और बेहतर हो सकती थी.

विशाल का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है. फिल्म कुछ हिस्सो में ही मनोरंजन प्रदान करती है. वरना पूरी फिल्म लंबी और बोरिंग है और बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा प्रभाव पैदा नहीं कर पाएगी.

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