क्या स्वीकार होगी 'इनकार'?

  • 18 जनवरी 2013
इनकार

दफ्तर में होने वाले यौन उत्पीड़न की कहानी है 'इनकार'. एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में काम करने वाली माया(चित्रांगदा)अपने मेंटर और सीनियर राहुल वर्मा (अर्जुन रामपाल) के खिलाफ यौन शोषण का केस दर्ज करती है.

राहुल एजेंसी का सीईओ है और माया में उसे काफी संभावनाएं नज़र आती हैं. राहुल के सानिध्य में रहकर माया काफी कुछ सीखती है और अपने काम में दक्ष हो जाती है. इस बीच दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं और ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं.

एजेंसी के मालिक माया का प्रमोशन कर देते हैं और नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर बना देते हैं. राहुल को लगता है कि कंपनी के मालिक जॉन के साथ शारीरिक संबंध बनाकर माया ने प्रमोशन पाया है. माया भी राहुल से अपसेट हो जाती है जब उसे पता चलता है कि राहुल किसी मॉडल से नज़दीकियां बढ़ा रहा है.

और फिर एक दिन माया,राहुल के खिलाफ ऑफिस में यौन उत्पीड़न का केस दर्ज कर देती है. इसके बाद क्या होता है? क्या राहुल ने वाकई में माया का शोषण किया था? क्या माया का केस झूठा है?

नया विषय

मनोज त्यागी की कहानी इस मायने में नई लगती है कि यौन उत्पीड़न जैसे विषय को पहली बार मुख्य प्लॉट बनाया गया अन्यथा ये विषय अक्सर सब-प्लॉट बनकर रह जाता है. माया और राहुल के बीच की टेंशन बहुत अच्छे से दिखाई गई और किसी का पक्ष लेने की बजाय पटकथा में दोनों के पक्षों को बराबरी से दिखाया गया. ड्रामा इस तरह से गढ़ा गया कि दर्शक इंतज़ार करते हैं कि केस का क्या होगा.माया को वाकई में राहुल ने परेशान किया था या वो झूठ बोल रही है.

Image caption फिल्म में चित्रांगदा ने माया का किरदार निभाया है

माया से हमदर्दी नहीं

वहीं फिल्म की कमज़ोरी ये रही कि दर्शक माया के साथ हमदर्दी नहीं दिखा पाते हैं.एक फिल्म जिसमें लड़की ने यौन शोषण का केस किया और दर्शक उसके साथ जुड़ ही नहीं पाए,ये कहानी कहने के हिसाब से थोड़ा ठीक नहीं.

क्योंकि माया के राहुल के साथ पहले से ही संबंध थे इसलिए दर्शक बहुत देर तक इसे एक असफल प्यार की कहानी के रुप में देखते हैं.ये नहीं भूलना चाहिए कि भारत की अधिकतम दर्शक संख्या अभी भी काफी परंपरागत है और शादी से पहले संबंध बनाने वाली लड़की के साथ वो अभी भी हमदर्दी नहीं रखते.

फिल्म का अंतिम हिस्सा भी काफी कमज़ोर है जब निर्देशक ने एक बेहद पेचीदा परिस्थिति को बड़ी आसानी से सुलझा दिया और दर्शक ठगा से महसूस करते रहे गए. ये कहा जा सकता है कि फिल्म का स्क्रीनप्ले सिर्फ एक सीमित वर्ग को ही समझ में आएगा. फिल्म में विज्ञापन से जुड़े शब्द जैसे (क्लाइंट,कॉपीराइटिंग) भी काफी बाधा डालते हैं. सुधीर मिश्रा और मनोज त्यागी के संवाद अच्छे हैं.

Image caption राहुल के रोल में अर्जुन का अभिनय अच्छा है पर एक जैसा है

अभिनय

अर्जुन रामपाल का काम अच्छा है लेकिन एक जैसा है. वो अपने किरदार को अलग अलग शेड नहीं दे पाए जो देने से शायद उनका अभिनय बेहतर हो पाता.

चित्रांगदा सिंह बेहतर हो सकती थी. एक एनजीओ की सदस्य के रुप में दीप्ती नवल का अभिनय अच्छा था पर उनके पास ज़्यादा कुछ करने को था नहीं.

सुजाता सेगल ने कविता का रोल अच्छा किया.गुप्ता के रोल में विपिन शर्मा हमेशा कि तरह सहज दिखे.

सुधीर मिश्रा का निर्देशन अच्छा है लेकिन ये विषय और उसे कहने का अंदाज़ सीमित वर्ग के लिए है.शांतनु मोइत्रा का संगीत बढ़िया है.स्वानंद के लिखे गीत अच्छे बन पड़े हैं.

कुल मिलकार इंकार सीमित वर्ग को लुभाने वाली फिल्म है जिसका क्लाइमैक्स काफी कमज़ोर है और जिसे देखकर दर्शक पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता.

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