फिल्मी अवार्ड:कितने सच कितने झूठ?

 शनिवार, 26 जनवरी, 2013 को 07:02 IST तक के समाचार
स्क्रीन अवार्ड्स

आजकल ठंड के साथ-साथ अवार्ड का मौसम भी चल रहा है. ठंड जितनी तेज़ पड़ रही है,उतनी ही तेज़ी से बॉलीवुड में अवार्ड भी दिए जा रहे हैं.

पहले एकाध अवार्ड्स समारोह ही देखने को मिलते थे लेकिन अब हाल ये है कि एक छूट गया तो दर्शक को उदास होने की ज़रुरत नहीं,अगले रविवार दूसरा आ जाएगा. हालांकि इस बढ़ती संख्या से इन समारोहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.

फिल्म पत्रिका स्क्रीन की पूर्व संपादक भावना सोमाया के मुताबिक बाहर वाले लोगों को लगता है कि ये अवार्ड बहुत ही गैर ज़िम्मेदारी से दिए जाते हैं बल्कि ऐसा बिल्कुल नहीं है.मेहनत हर अवार्ड में लगती है,बस अब इनकी संख्या बढ़ गई है और हमारे यहां कुछ भी ज़्यादा होता है तो वो अच्छा नहीं माना जाता.

पिछले साल की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नामांकित हुए मनोज वाजपेयी के मुताबिक सच तो ये है कि इंडस्ट्री का कोई भी आदमी इन पुरस्कारों को गंभीरता से नहीं लेता है.ये नए लोगों को उत्साह देने का काम कर सकता है लेकिन जैसे लोग पुराने होते जाते हैं अवार्ड की परत खुलती जाती है.

"सच तो ये है कि इंडस्ट्री का कोई भी आदमी इन अवार्ड्स को सीरियसली नहीं लेता है.ये नए लोगों के लिए उत्साह का काम कर सकता है लेकिन जैसे लोग पुराने होते जाते हैं अवार्ड की परत खुलती जाती है."

मनोज वाजपेयी,अभिनेता

वहीं भावना के अनुसार, "सच तो ये है कि जिसे अवार्ड मिलता है वो बिल्कुल खुश होता है और जिसे नहीं मिलता है और इसकी कोई अहमियत ही नहीं है तो आप उदास क्यों होते हैं."

अवार्ड शो नहीं टीवी शो

इस साल कई अवार्ड्स के लिए नामांकित होने वाली फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश के निर्माता आर बाल्की के मुताबिक ये बस एक मनोंरंजन की शाम है जो अब अवार्ड शो कि जगह टीवी शो बनकर रह गया है.लोग जब तक टीवी देखते रहेंगे,ये शो चलते रहेंगे.लोगों को स्टार्स को देखना पसंद है इसलिए ये सब चल रहा है.

"मुझे नहीं लगता कि ये श्रेणियां अजीब है और किसी को खुश करने के लिए बनी है.बल्कि ऐसी कैटेगरी से तो अवार्ड में बदलाव आया है.जैसे बेस्ट एक्शन फिल्म या बेस्ट सोशल फिल्म इन सब से तो कलाकारों को बढ़ावा ही मिलता है."

भावना सोमाया,वरिष्ठ फिल्म पत्रकार

अवार्ड कार्यक्रमों में कम दिखने वाले अभिनेता अजय देवगन भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. साजिद खान की फिल्म 'हिम्मतावाला' में मुख्य भूमिका निभाने वाले अजय हंसते हुए कहते हैं, "मैं और साजिद खान भी एक ऐसा ही शो शुरु करने वाले हैं जिसमें हम एक दूसरे को अवार्ड देंगे.ये अवार्ड शो रहे नहीं टीवी शो बनकर रह गए हैं."

गौरतलब है कि खुद साजिद खान कई अवार्ड शो को होस्ट करते नज़र आते हैं.

वहीं जॉन अब्राहम का कहना है, "मैं पिछले 10 साल से अवार्ड शो में नही गया.सीधा हिसाब है जो परफॉर्म करता है,उसे अवार्ड मिलता है."

अवार्ड:खुश करने के लिए

इन बॉलीवुड अवार्ड्स पर सबको खुश करने का आरोप भी लगाया जाता है. अवार्ड की विभिन्न श्रेणियों को देखकर शायद इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.एक प्रसिद्ध फिल्म पत्रिका द्वारा आयोजित अवार्ड में 'हॉटेस्ट निर्माता' और 'हॉटेस्ट फिल्ममेकर' जैसी श्रेणियां भी रखी गई है.

भावना कहती हैं "मुझे नहीं लगता कि ये श्रेणियां अजीब है और किसी को खुश करने के लिए बनी है.बल्कि ऐसी कैटेगरी से तो अवार्ड में बदलाव आया है.जैसे बेस्ट एक्शन फिल्म या बेस्ट सोशल फिल्म इन सब से तो कलाकारों को बढ़ावा ही मिलता है."

दूसरी ओर ख़राब फिल्म और घटिया अभिनय के लिए पुरुस्कार देने वाले 'फिल्मफेल अवार्ड' के आयोजक वरुण ग्रोवर कहते हैं "मौजूदा अवार्ड्स सबको खुश करने का धंधा सा है.पोपुलर और क्रिटिक चॉइस नाम से दो अलग कैटेगरी क्यों है ? सीधा मतलब है कि आप असली विजेता को कम इज्ज़त देकर,पैसे कमाने वाली फिल्म को पोपुलर अवार्ड देना चाहते हैं."

कुल मिलाकर या तो अंगूर खट्टे हैं या फिर बॉलीवुड के अवार्ड समारोह को वाकई में मरम्मत की ज़रुरत है ?

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.