'स्पेशल 26' में क्या है स्पेशल?

अक्षय कुमार
Image caption ये अक्षय की नीरज के साथ पहली फिल्म है.

चेतावनी: मैंने पूरी कोशिश की है कि मैं फिल्म के सस्पेंस को बरक़रार रखूं लेकिन फिर भी समीक्षा के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां पटकथा की कमियों को उजागर करने के लिए मुझे कहानी के कुछ पहलुओं पर रौशनी डालनी पड़ी है. अगर आप फिल्म की कहानी नहीं जानना चाहते तो आपसे निवेदन है कि आप ये समीक्षा न पढ़ें.

स्पेशल 26 एक सस्पेंस थ्रिलर है. अजय (अक्षय कुमार), शर्मा (अनुपम खेर), जोगिंदर (राजेश शर्मा) और इक़बाल (किशोर कदम) एक गुट की तरह काम करते हैं. एक ऐसा गुट जो नकली सीबीआई अधिकारीयों का भेस धर जगह-जगह रेड डालते हैं और फिर सारा माल लेकर उड़ जाते हैं.

चूहे-बिल्ली का खेल

एक ऐसी ही रेड में नकली सीबीआई वाले सारा माल लेकर फुर्र हो जाते हैं और फंस जाता है असली पुलिस वाला रणवीर सिंह (जिमी शेरगिल). रणवीर को जब इस बात का एहसास होता है कि उसे बेवक़ूफ़ बनाया गया है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

रणवीर को उसकी लापरवाही के लिए उसके पद से निलंबित कर दिया जाता है. रणवीर बार-बार ये कहता है कि उसकी कोई गलती नहीं है लेकिन उसकी एक नहीं सुनी जाती. फिर वो असली सीबीआई का सहारा लेता है ताकि वो इस नकली सीबीआई को पकड़ सके. रणवीर सिंह असली सीबीआई ऑफिसर वसीम (मनोज वाजपेयी) से वादा करता है कि वो इस नकली गुट को पकड़ने में जी जान लगा देगा. इस बीच नकली सीबीआई बनकर अजय और शर्मा अपनी रेड जारी रखते हैं और हर बार इसलिए बच जाते हैं क्योंकि जिनके घर में रेड पड़ती है वो इस डर से पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करवाते क्योंकि ऐसा करने से उनके काले धन की सच्चाई सबके सामने आ जाएगी.

रणवीर सिंह किसी तरह से शर्मा का पता लगाने में कामयाब हो जाता है. तो क्या शर्मा अपना मुंह असली सीबीआई ऑफिसर वसीम के आगे खोल देता है? क्या वसीम अजय को पकड़ने में कामयाब हो जाता है? या फिर अजय वसीम से ज्यादा शातिर साबित होता है? क्या शर्मा अजय को अपनी और वसीम की मुलाक़ात के बारे में बताता है? शर्म का पता लगाने के बाद रणवीर सिंह की इस पूरे प्रकरण में क्या कोई भूमिका रहती है?

धीमी गति

Image caption नीरज की पहली फिल्म थी 'ए वेडनेसडे'

निर्देशक नीरज पाण्डेय की पटकथा में जो कौतूहल है वो दर्शकों को कहानी से बांधे रखता है. लेकिन फिल्म में ऐसे कई पल हैं जो लम्बे दृश्यों की वजह से फिल्म की गति को धीमा कर देते हैं. नीरज की कहानी में एक सवाल ऐसा है जिसका जवाब ढुंढने की कोशिश शायद हर दर्शक करे. यही की रणवीर सिंह ने असली सीबीआई से नकली सीबीआई की शिकायत क्यों की?

जो शिकायत कहानी की शुरुआत में सही लगती है, वही शिकायत सस्पेंस के खुल जाने पर व्यर्थ लगने लगती है. कहानी में अगर असली सीबीआई को शामिल न भी किया जाता और सारी धर पकड़ अकेले रणवीर सिंह ही कर लेता तो भी फिल्म की कहानी आसानी से आगे बढ़ सकती थी. मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि फिल्म में ये जो भी कमियां है वो अंत में आती हैं जिसकी वजह से दर्शक अंत तक फिल्म में डूबे रहते हैं. लेकिन एक बार जब ये कमियां, छोटी नहीं बड़ी कमियां, दर्शकों के सामने आ जाती हैं तो ये दर्शकों को बड़ा परेशान करती हैं.

फिल्म में जो अक्षय कुमार और काजल अगरवाल के बीच प्रेम प्रसंग दिखाया गया है वो बहुत ही कमज़ोर है. स्पेशल 26 में अगर कुछ और हल्के-फुल्के पल और अच्छा संगीत होता तो शायद फिल्म जनता को और भी भाती.

बढ़िया संवाद, बढ़िया अभिनय

फिल्म के संवाद जो खुद नीरज पाण्डेय ने लिखे हैं अच्छे हैं. अक्षय कुमार ने बड़ी ही सरलता से एक नकली सीबीआई ऑफिसर का किरदार निभाया है. काजल अगरवाल को अक्षय की प्रेमिका के रूप में फिल्म में कुछ खास कर पाने का मौका नहीं मिला है. अनुपम खेर भी बढ़िया हैं.

जिमी शेरगिल ने भी अपना किरदार बहुत ही असरदार तरीके से निभाया है. जहां तक बात आती है मनोज वाजपेयी की, एक असली सीबीआई ऑफिसर की भूमिका को बहुत इमानदारी के साथ निभाया है उन्होंने. राजेश शर्मा और किशोर कदम का काम भी तारीफ के लायक है. मैं कहूंगा की नीरज पांण्डेय का निर्देशन उनकी पटकथा लेखन से बेहतर है, हां ये ज़रूर है की उनके दृश्य बड़े ही लम्बे होते हैं और उनमें ज़रूरत से ज्यादा बारीकियों पर ध्यान दिया जाता है. लेकिन इसके बावजूद वो कहानी में कौतूहल को बरक़रार रखने में कामयाब रहते हैं.

कमजोर संगीत

फिल्म का संगीत बेहतर हो सकता था. 'गोरे मुखड़े पे' (हिमेश रेशमियां) एक अच्छा गाना है, 'कौन मेरा' (एमएम क्रीम) मधुर लेकिन धीमा गीत है. फिल्म के बाकी गीत जिन्हें एमएम क्रीम ने ही धुनबद्ध किया है साधारण हैं. गीतों में इरशाद कामिल के बोल भी साधारण ही हैं हालांकि गणेश आचार्य का नृत्य निर्देशन अच्छा है.

फिल्म का बैकग्राउंड संगीत सुरेंदर सोढी ने दिया है जो कि बहुत ही भड़कीला है. बॉबी सिंह का कैमरावर्क अच्छा है. अब्बास अली मुग़ल का ऐक्शन भी ठीक-ठाक ही है. फिल्म की एडिटिंग, जो की श्रीनारायण सिंह ने की है थोड़ी और बढ़िया हो सकती थी. स्पेशल 26 यूं तो एक मनोरजक फिल्म है लेकिन इसकी भी अपनी कमियां हैं. टिकट खिड़की पर इस फिल्म का डिस्ट्रीब्यूटर के लिए फायदेमंद साबित होना मुश्किल है क्योंकि फिल्म को निर्माताओं से एक महंगे दाम पर लिया गया है(करीब 36-37 करोड़ रूपए). हां ये ज़रूर है कि निर्माता फिल्म से पैसा कमा लेंगे.

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