टैलेंट वैलेंट कोई नहीं पूछता :केके मेनन

  • 11 फरवरी 2013
केके मेनन,अभिनेता
Image caption केके मेनन ने फिल्म 'एबीसीडी' में एक डांसर का रोल निभाया है

बॉलीवुड में सत्तर प्रतिशत टैलेंट पैकेजिंग और मार्केंटिग के बलबूते पर बेचा जाता है - ये दावा है अभिनेता केके मेनन का जिनकी नई फिल्म 'एबीसीडी' में वो एक ऐसे डांसर बने हैं जो मानता है कि टैलेंट कोई मायने नहीं रखता और सब कुछ मार्केटिंग और कलेवर पर निर्भर करता है.

पिछले हफ्ते रिलीज़ हुई फिल्म एबीसीडी में अपने रोल के बारे में केके ने कहा कि उन्हें ये भूमिका निभाने में बिल्कुल भी परेशानी नहीं हुई क्योंकि सत्तर प्रतिशत फिल्म इंडस्ट्री तो ऐसी ही है जिनके लिए टैलेंट का कोई मतलब नहीं है.

केके के अनुसार उनके अलावा नसीरुद्दीन शाह से लेकर मनोज वाजपेयी और इरफान खान जैसे कई कलाकार हैं जिनकी प्रतिभा को दरकिनार किया गया है. हालांकि केके मानते हैं कि स्टार्स में भी आमिर खान और रणबीर कपूर जैसे लोग हैं जो अपनी स्टारडम के बूते पर अच्छा काम और अच्छी फिल्में कर रहे हैं.

फिल्मों में अनफिट?

तो क्या बॉलीवुड की इस विचारधारा के बीच केके खुद को कमर्शियल हिंदी फिल्मों के लिए अनुपयुक्त मानते हैं ?

केके कहते हैं "अनफिट तो वो लोग हैं ना,अगर मैं 100 मीटर की दौड़ दस सैकंड में पूरी कर सकता हूं तो मैं फिट हुआ ना,मैं तो अपनी कला को बखूबी निभा रहा हूं. अनफिट तो वो हैं जो चलकर 100 मीटर पूरी करते हैं और फिर भी खुद को स्पोर्ट्समैन कहते हैं."

स्टार सिस्टम पर अपना नज़रिया बताते हुए केके ने कहा कि बॉलीवुड औऱ हॉलीवुड में यही अंतर हैं.वहां आर्नोल्ड श्वाज़नेगर जैसा ख़राब एक्टर अगर स्टार है तो रसल क्रो या रोबर्ट डी नीरो जैसे अभिनेता भी स्टार है. वहां ये समानता तो है लेकिन यहां पर तो एक नॉन-एक्टर स्टार हो जाता है लेकिन नसीरुद्दीन शाह कभी स्टार नहीं होंगे. अच्छी चीज़ों को वहां संरक्षण किया जाता है यहां नहीं.

तो क्या केके ने भी खुद को बॉलीवुड के अनुकूल बना लिया है? केके का जवाब है "मैं तो पहले से ही एक ही लकीर पर चल रहा हूं और उसी पर चलता आ रहा हूं. अगर आप किसी माहौल में रहते हो तो वहां की आबोहवा तो लगती ही है बार बार जिससे आप कंडीशन हो ही जाते हैं."

केके की आने वाली फिल्मों में भट्ट कैंप की 'अंकुर अरोड़ा मर्डेर केस' है जो मेडिकल लापरवाही पर आधारित फिल्म है.

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