फ़िल्मों में औरत सिर्फ़ गाना क्यों गाती है ?

तिग्मांशू धुलिया,निर्देशक
Image caption तिग्मांशू की नई फिल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर में माही गिल मुख्य भूमिका में है.

मैं औरतों से डरता हूं. मुझे लगता है औरतें जिस दिन अपने पर आ जाए तो वो सब कुछ कर सकती है जो पुरुष नहीं कर सकते.

अभी हालांकि हालात थोड़े बेहतर हो गए हैं लेकिन एक वक्त था जब परिस्थिति बहुत अलग थी और वो गलत भी था.

हां मैं ये मानता हूं कि औरतें कुछ चीज़ों में अच्छी होती हैं कुछ में नहीं. जैसे मुझे नहीं लगता कि महिलाएं गाड़ी अच्छी चला सकती हैं या मैप पढ़ सकती हैं.

लेकिन जहां तक फ़िल्मों की बात है तो मुझे गुस्सा आता था जब हिंदी फ़िल्मों में औरत चार गानों के लिए आती थी, हीरो के कंधे पर सर रखकर रोती थी और अंत में ड्रम पर मां के साथ लटक जाती जिसे हीरो बचाता था.

मुझे गुस्सा आता था जब मैं एक्शन फ़िल्म देखने जाता था और उसमें लव स्टोरी शुरू हो जाती थी. अच्छा हुआ कि टिपिकल मसाला फ़िल्मों का दौर चला गया है.

हीरोइन ज़रुरी क्यों ?

हमारी हिंदी फ़िल्मों की पता नहीं ये कैसी ज़रुरत है कि हीरो है तो हीरोइन का होना ज़रुरी है.

ख़ैर, इसलिए मैंने सोचा कि जब हीरोइन लेनी ही है तो उसको कुछ मीट दो, उसको कुछ करने को दो. मैं हमेशा ये कोशिश करता हूं कि हीरोइन भी उतनी ही जज़्बाती हो और उतना ही प्लॉट को आगे बढ़ाए जितना की हीरो, वो फ़िल्म में सिर्फ एक चेहरा बनकर ना रह जाए.

जितनी भी हिट फ़िल्में है, जो ब्लॉकबस्टर रही हैं, मील का पत्थर साबित हुई हैं उन फ़िल्मों में हीरोइन का किरदार काफी तगड़ा रहा है.

मुग़लेआज़म में मधुबाला को हटाकर क्या फ़िल्म बन सकती है, मदर इंडिया में नरगिस को हटा दो तो क्या फ़िल्म बन पाती, गंगा जमना में वैजयंती माला को हटा दो तो क्या फ़िल्म बन पाती?

जिस दिन लोग ये समझ जाएंगे कि औरत बस एक हाड़-मांस का पुतला नहीं है, उसके अंदर एक दिल है और एक सक्षम दिमाग भी है, उस दिन ये बात भी समझ आ जाएगी.

( बीबीसी के लिए रेखा ख़ान से बातचीत पर आधारित )

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