देसी फ़िल्में विदेशी बाज़ार

लंदन में अगर हिन्दी फ़िल्म देखने का मूड हो तो सीधे इल्फ़र्ड इलाक़े में चले जाइए, वहाँ सिनवर्ल्ड नाम का सिनेमाहॉल है, वहाँ नई फ़िल्म तो होगी ही, हो सकता है कुछ ऐसी फ़िल्में भी देखने को मिल जाएँ जो आपसे छूट गई होंगी.

जैसे फ़रवरी के अंतिम सप्ताह की लिस्ट देखिए – कुल सात हिन्दी, दो तमिल और एक पंजाबी फ़िल्म लगी है यहाँ.

'काइ पो चे' और 'ज़िला गाज़ियाबाद' तो है ही, 'एक था टाइगर' और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' जैसी पहले जारी हो चुकी फ़िल्मों को बड़े पर्दे पर देख सकते हैं.

वैसे दर्शक वीकेंड में ही अधिक जुटते हैं, बाक़ी दिनों में भीड़ कम होती है, मगर टिकट पाउंड में होता है, इसलिए विदेश का एक टिकट देश के लिए काफ़ी मायने रखता है.

इल्फ़र्ड सिनेवर्ल्ड में सामान्य टिकट की कीमत औसतन सात सौ रूपए के बराबर बैठती है.

विदेशी मुद्रा की ये कमाई ही भारतीय फ़िल्म जगत को सात समुंदर पार के बाज़ार पर ध्यान देने के लिए बाध्य करती है.

कमाई

विदेशी बाज़ार कितना अहम है इसकी एक मिसाल मिलती है 'काइ पो चे' के कारोबार से. इस फ़िल्म ने पहले वीकेंड में जहाँ देश के भीतर 18 करोड़ रूपए की कमाई की, वहीं विदेशों से इसने लगभग सात करोड़ रूपए कमाए, यानी कुल कमाई का लगभग 30 फ़ीसदी हिस्सा भारत के बाहर से आया.

फ़िल्म कारोबार विश्लेषक कोमल नाहटा कहते हैं,”ख़ासकर जो बड़े सितारों वाली फ़िल्में होती हैं जैसे शाहरूख़, सलमान, आमिर, अक्षय, हृतिक की फ़िल्में विदेशों में ख़ूब कमाती हैं, कई बार तो वे विदेशों से भारत के ही बराबर या उसके लगभग 80 प्रतिशत तक कमा लेती हैं “.

विदेशी बाज़ार में अभी तक की सबसे सफल हिंदी फ़िल्म का रिकॉर्ड 'थ्री इडियट्स' का है जिसने विदेशी बाज़ार से ढाई करोड़ डॉलर या लगभग 116 करोड़ रूपए की कमाई की.

दूसरे नंबर पर आती है 'माइ नेम इज़ ख़ान'. ये एक ऐसी फ़िल्म है जिसने भारत से बाहर कम-से-कम भारत के बराबर कमाई की.

बाज़ार

यदि 'काइ पो चे' को उदाहरण लिया जाए तो बाहर सबसे बड़ा बाज़ार अमरीका है, फिर संयुक्त अरब अमीरात, तब ब्रिटेन और आयरलैंड और इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और फ़िजी का नंबर आता है.

अभी भारतीय फ़िल्में 55 देशों में रिलीज़ हुआ करती हैं जिन्हें पारंपरिक बाज़ार समझा जाता है जिनमें अमरीका, ब्रिटेन, यूएई जैसी जगहें आती हैं.

लंदन स्थित फ़िल्म विश्लेषक नमन रामचंद्रन बताते हैं कि फ़िल्म जगत इन 55 बाज़ारों के अलावा और 105 नए देशों में संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं.

नमन ने कहा,”'गुज़ारिश' पेरू में रिलीज़ हुई थी, 'रोबोट' ताइवान में, 'थ्री इडियट्स' दक्षिण कोरिया और चीन में...ऐसी कई जगहों पर बाज़ार के विस्तार की कोशिश हो रही है.”

और कोशिश पूरी दीवानगी के साथ हो रही है. नमन मोरक्को की एक दिलचस्प घटना बताते हैं,”पिछले साल मैं वहाँ गया था, वहाँ एक सिनेमाघर में सुनील शेट्टी की एक फ़िल्म चल रही थी – 'अंत'“.

निश्चित तौर पर हिंदी फ़िल्म जगत के कारोबारी वहाँ इस 'अंत' से किसी आरंभ की राह तैयार कर रहे होंगे.

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