नए स्क्रीन पर पुरानी फ़िल्में

जाने भी दो यारों, हिंदी फिल्म
Image caption जाने भी दो यारों, 2012 में री-रिलीज़ हुई थी.

पुरानी जींस और पुरानी फ़िल्मों से अक्सर लोगों का लगाव रहता है. यही पुरानी फ़िल्म जब थिएटर में फ़िर से रिलीज़ होती है तो प्रशंसकों के लिए एक अलग अनुभव होता है.

'सलाम बॉम्बे' और 'चश्मे बद्दूर' - 80 के दशक की ये दो फ़िल्में जल्द ही थिएटर में फ़िर से दस्तक देगी.

हालांकि इससे पहले भी कुछ फ़िल्में फ़िर से सिनेमा हॉल में अपना जादू बिखरने पहुंची थी जैसे 'मुग़्ले-आज़म', 'हम दोनों' और कल्ट फ़िल्म 'जाने भी दो यारों'.

आज के दौर में जहां फ़िल्में 100 करोड़ के सपने देखती हैं, ऐसे में इन फ़िल्मों के पुन:रिलीज़ होने से इनका कितना भला हो पाता है ?

पैसा कमाना मकसद नहीं

'जाने भी दो यारों' की निर्माता कपंनी एनएफडीसी के जनरल मैनेजर विक्रमादित्य रॉय कहते हैं "देखिए पहली बात तो ये कि जो फ़िल्में रिलीज़ होती हैं उनकी रिकॉल वैल्यू होती है, उनसे कुछ यादें जुड़ी होती है, इसलिए उन्हें री-रिलीज़ किया जाता है और जैसे ही वो थिएटर में आती हैं लोगों को उनकी वो ख़ास बात फ़िर से याद आ जाती है."

विक्रमादित्य के अनुसार "हम इन फ़िल्मों को सिर्फ पैसे कमाने के नज़रिए से नहीं देखते, ये फ़िल्म के ब्रांड वैल्यू को और मज़बूत करने की कोशिश है. जब ये फ़िल्में पहले रिलीज़ हुई थी तब उनके पास टीवी चैनल, डीवीडी, डीटीएच जैसे मंच नहीं थे लेकिन अब जब ये रिलीज़ होती हैं तो पुराने और नए दर्शकों के साथ साथ एक बार फ़िर व्यवसाय करने का मौका मिलता है."

दूसरे शब्दों में इन क्लासिक फ़िल्मों के प्रशंसकों की लिस्ट में नए नामों को जोड़ने की कोशिश.

री-रिलीज़ ज़्यादा क्यों नहीं ?

90 के दशक में फ़िल्मों के पुन: रिलीज़ होने का फैशन चल पड़ा था जो ज़्यादा दिन नहीं टिका. विक्रमादित्य के मुताबिक हर साधारण फ़िल्म को री-रिलीज़ नहीं किया जा सकता. फ़िल्म के साथ कुछ प्रतिष्ठा जुड़ी होनी चाहिए, कुछ बात होनी चाहिए और ऐसी फ़िल्मों को दोबारा रिलीज़ किया जाने का सिलसिला ज़्यादा होना चाहिए.

विक्रमादित्य कहते हैं आज का युवा दर्शक बहुत समझदार हो गया है, उसको कुछ भी साधारण नहीं दिखाया जा सकता. थिएटर में जाकर हज़ार रुपए खर्च करने के पीछे कुछ वजह तो होनी चाहिए.

वैसे भी आज के दौर में जहां टिकट और पॉपकॉर्न दोनों ही मंहगे हो गए हैं, फ़िल्म का पैसा वसूल होना ज़रुरी है, फ़िर वो नई हो या पुरानी.

मीरा नायर की ऑस्कर में नामांकित फ़िल्म 'सलाम बॉम्बे' 22 मार्च को रिलीज़ होगी, वहीं फारुख़ शेख़-दीप्ति नवल की 'चश्मे बद्दूर' 5 अप्रैल को पीवीआर में दिखाई जाएगी.

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