क्या चल पाएगी 'दि अटैक्स ऑफ 26/11' ?

  • 1 मार्च 2013
द अटैक्स ऑफ 26/11, हिंदी फिल्म

'दि अटैक्स ऑफ 26/11' मुंबई के संयुक्त कमिश्नर राकेश मारिया (नाना पाटेकर) की नज़र से मुंबई हमले की घटना दिखाती है.

एक समिति के सामने संयुक्त कमिश्नर 26 नवंबर की रात को हुई वारदात को याद करते हैं जिसका नतीजा अजमल कसाब (संजीव जायसवाल) की फांसी पर जाकर खत्म होता है.

मुंबई के लियोपॉल्ड कैफे, ताज महल होटल, सीएसटी स्टेशन और कामा अस्पताल समेत कई जगहों पर हुए हमलों को फिल्म में ग्राफिक्स की मदद से दिखाया गया है.

सत्य घटना पर आधारित कहानी और पटकथा को रौमेल रॉडरिग्स ने लिखा है जो काफी तेज़ गति से आगे बढ़ती है. कुछ सीन अवाक् कर देने वाले हैं वहीं कई पर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ती है जैसे तुकाराम ओम्ब्ले (सुनील जाधव) अपनी जान गवां देता है लेकिन कसाब को जाने नहीं देता.

क्योंकि ये फिल्म एक ऐसे हमले के बारे में है जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था और इसमें ड्रामा भी काफी मानवीय तरीके से दिखाया गया है इसलिए ये दिल को काफी छूती है और झंझोड़ भी देती है. वहीं कमज़ोर दिल वाले बहुत ज़्यादा ख़ून ख़राबा और हिंसा देखकर परेशान हो सकते हैं.

एक ट्रैक पर चलने के कारण ड्रामा उनके लिए ऊबाऊ हो सकता है जो एक भरपूर मनोरंजन के उद्देश्य से थिएटर में आएंगे. फिल्म में एक डॉक्यूड्रामा वाला एहसास है जिसकी आदत फिलहाल भारतीय दर्शकों को नहीं है.

बढ़िया अभिनय

Image caption नाना पाटेकर ने संयुक्त कमिश्नर का रोल बहुत अच्छे से निभाया है

फिल्म में संवाद बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन जितने है बेहतरीन है. रौमेल रॉडरिग्स, राशिद इक़बाल और प्रशांत पांडे ने अच्छे डायलॉग्स लिखे हैं.

नाना पाटेकर ने संयुक्त कमिश्नर का रोल बखूबी निभाया है. वो हर सीन में कमाल थे. संजीव जायसवाल ने अजमल कसाब की भूमिका अच्छे से पकड़ी. अतुल कुलकर्णी (शशांक शिंदे), साद ओरहान (अबु इसमाईल खान) सहित कास्ट ने फिल्म को आगे बढ़ाने में अच्छा सहयोग दिया है.

राम गोपाल वर्मा का निर्देशन काफी भाव विभोर कर देने वाला है. वो अपनी स्क्रिप्ट के साथ ईमानदार रहे और उन हमलों पर एक दिल दहला देने वाली फिल्म बनाई जिसने कईयों की जानें ली और लोगों के दिल और दिमाग पर गहरा निशान छोड़ दिया.

हालांकि ये बात भी है कि फिल्म का विषय ऐसा है जिसे कई दर्शक शायद ही थिएटर में देखना पसंद करेंगे. फिल्म का बजट कम होता थो रामू की ये कोशिश शायद उचित सिद्ध होता लेकिन फिल्म का बजट ज़्यादा है.जावेद एजाज़ के एक्शन सीन काफी तगड़े हैं. अमर मोहिले को बैकग्राउंड स्कोर के लिए शाबाशी मिलनी चाहिए.

कुल मिलाकर दि अटैक्स ऑफ 26/11 एक अच्छी तरह से बनाई गई फिल्म है जो बुद्धिजीवियों को पसंद आ सकती है. 25 करोड़ के बजट में बनी ये फिल्म शुरुआत में ना सही लेकिन देखे जाने के बाद चर्चा का विषय बनकर ध्यान ज़रुर बटोर सकती है.

संबंधित समाचार