क्या न्याय दिला पाएगा 'जॉली एलएलबी'?

जॉली एलएलबी, हिंदी फिल्म

जॉली एलएलबी, भारत की न्याय व्यवस्था पर एक व्यंग्य हैं. जगदीश त्यागी उर्फ जॉली (अरशद वारसी) एक संघर्षरत वकील है जो अपने क्षेत्र में एक बड़ा नाम बनना चाहता है.

जॉली मेरठ से दिल्ली आता है और एक ऐसे केस का हिस्सा बन जाता है जिसे भारत का एक प्रसिद्ध और मंहगा वकील तेजिंदर राजपाल (बमन ईरानी) लड़ रहा है.

राजपाल का मुवक्किल राहुल दीवान (राजीव सिद्धांत) एक हिट एंड रन केस में फंसा है जिसमें उसकी गाड़ी ने फुटपाथ पर सोए कुछ लोगों को कुचल दिया था.

राजपाल ने अपने क्लाइंट को बचाने के लिए पुलिस के साथ मिलकर सबूतों के साथ छेड़खानी की और साबित कर दिया कि राहुल निर्दोष है.

राजपाल के बहस करने की अदा से जॉली काफी प्रभावित होता है लेकिन उसे समझ आ जाता है कि अन्याय हुआ है. जॉली केस फिर से खुलवाने के लिए जज सुंदरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) के कोर्ट में जनहित याचिका दायर करता है.

क्या जॉली, राहुल दीवान के गुनाह का पर्दाफाश कर पाता है? क्या वो पीड़ितों को न्याय दिला पाता है? इस केस में जज सुंदरलाल त्रिपाठी का कितना अहम रोल होता है?

पहला हिस्सा कमज़ोर

Image caption अमृता राव और अऱशद वारसी के बीच का रोमांस काफी ढीला लगा

लेखक सुभाष कपूर का भारत की न्याय व्यवस्था पर ताना काफी रोचक है लेकिन कुछ बारीकियों के कारण थोड़ा सीमित हो जाता है.

बमन ईरानी द्वारा बोले गए अंग्रेज़ी संवाद फिल्म को छोटे कस्बों के दर्शकों के लिए थोड़ा मुश्किल बना सकते हैं.

पहला हिस्सा बेहद धीमा चलता है बिल्कुल भारत के कोर्ट की तरह, ऊपर से गाने बोरियत को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

जॉली और संध्या (अमृता राव) का रोमांटिक ट्रैक आधा अधूरा सा लगता है. वहीं इंटरवेल के बाद फिल्म में कोर्ट रुम के कई भावुक और तालियां बजाने वाले सीन आते हैं, जैसे त्रिपाठी का आपा खोने वाला और जॉली का आखिरी तर्क वाला सीन.

सौरभ शुक्ला के लिए तालियां

Image caption जज के रुप में सौरभ शुक्ला ने बेहतरीन अभिनय किया है

अरशद वारसी ने अच्छा काम किया है हालांकि वो थोड़े से थके हुए लग रहे थे. अमृता राव भी ठीक थी. बमन इरानी ने राजपाल का किरदार बखूबी निभाया है.

सौरभ शुक्ला के कमाल का अभिनय दर्शकों से ज़रुर तारीफ बटोरेगा. ये देखना काफी आनंददायक होता है कि किस तरह सौरभ का किरदार ड्रामे के साथ साथ बदलता जाता है.

सुभाष कपूर का निर्देशन अच्छा है. उनकी कहानी न्याय व्यवस्था पर लेक्चर कम औऱ मनोरंजक ज़्यादा लगी जो कि अच्छी बात रही. कृष्णा के संगीत ने निराश किया.

संजय चौधरी का बैकग्रांउंड संगीत औसत था. संपादन और बेहतर हो सकता था.

कुल मिलाकर जॉली एलएलबी मनोरंजक है, ख़ासतौर से इंटरवल के बाद लेकिन उसके लिए फिल्म का कमज़ोर पहला भाग झेलना होगा.

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