बॉलीवुड को बुरा मानना चाहिए क्योंकि...

रेस 2

होली में अक्सर दूसरों पर रंग, गुलाल डालते वक़्त कहा जाता है, "बुरा ना मानो होली है." लेकिन बात हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की करें तो वो कौन सी बातें हैं जिनका बॉलीवुड को बुरा मानना चाहिए और उन बातों से हमेशा के लिए तौबा करनी चाहिए:

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी के मुताबिक निम्नलिखित आदतों से हिंदी फिल्म उद्योग को छुटकारा पा लेना चाहिए.

1. बंद करो रीमेक:

सबसे पहले रीमेक बनाना बंद होना चाहिए. चश्मे बद्दूर जैसी क्लासिक फिल्म का रीमेक हो या रंगरेज़ जो एक महान तमिल फिल्म का रीमेक है. इन पर फौरन रोक लगनी चाहिए. बॉलीवुड को रीमेक बनाने की सलीक़ा ही नहीं है. यदि नहीं, तो फिर क्लासिक फिल्मों को बेहतर तरीके से समझ कर नए रूप में बनाना चाहिए.

2. बोरिंग कॉमेडी से निजात:

ऐसी कॉमेडी बनने लगी है कि हंसने के बजाय रोना आ जाता है. गोलमाल सीरीज़ हो या हाउसफुल सीरीज़, ये बिलकुल भी नहीं हंसा पा रही हैं. बॉलीवुड को कॉमेडी से ब्रेक लेना चाहिए. फिर थोड़ा तरोताज़ा होकर वापस आओ और फिर लोगों को हंसाओ. नई ताज़ा कॉमेडी के साथ.

3. डीवीडी चोरी से तौबा:

विदेशी फिल्मों की डीवीडी देखकर चोरी करने की आदत से छुटकारा पाओ. अपने आसपास के माहौल को देखना चाहिए और असल जिंदगी के किरदारों को देखकर फिल्में बनानी चाहिए.

4. 100 करोड़ की होड़ पर लगाओ रोक:

Image caption बेहूदा कॉमेडी से दर्शक बोर हो गए हैं.

अब हर कोई 100 करोड़ रुपए कमाना चाहता है. अब ये 100-200 करोड़ की होड़ में आप ऐसी फिल्में बना रहे हो जो हर कोई पहले दिन ही देखकर भुला देता है.

या तो शोले दो जो 30-35 सालों बाद भी अपना आकर्षण बनाए हुए है. उसका हर एक पात्र असली लगता है.

अब के दौर की फिल्में देखो तो एक था टाइगर हो या रेडी. आप इन्हें देखते ही भुला दोगे. जबकि इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज़्यादा कमाए हैं.

5. पिटे फॉर्मूले बंद करो:

बॉलीवुड में कोई एक कोई फॉर्मूला हिट होता है तो उस पर 10 फिल्में बन जाती हैं. लोगों को समझना चाहिए कि च्यूइंगम को चबाते रहने से वो कड़वी लगने लगती है और उसे थूकना पड़ता है. नई, मौलिक फिल्में बनाने की ज़रूरत है.

6. हॉलीवुड के पीछे मत भागो:

हॉलीवुड ने हमें ये कहा, वो कहा. हमारी फिल्मों ने ओवरसीज में इतने कमाए. बॉलीवुड में ये बातें आम हैं. लेकिन इन्हें बंद होना चाहिए.

भारतीय फिल्मों के अपने दर्शक हैं. देश में हैं. मध्य-पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में हमारे दर्शक हैं. हम ऐसे भागते हैं कि अरे स्टीवन स्पीलबर्ग आ गए. भला क्यों. बॉलीवुड को अपने पर पर्याप्त आत्मविश्वास होना चाहिए.

8. बहुत हुआ परिवारवाद:

Image caption नम्रता के मुताबिक आज हर फिल्मकार 100 करोड़ की होड़ में लगा है. इससे फिल्मों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है.

बॉलीवुड में अब भी परिवारवाद बहुत चलता है. पापा वासु भगनानी ने अपने प्यारे पुत्तर जैकी भगनानी की फिल्म रंगरेज़ के लिए करोड़ों रुपए खर्च करके 'गंगनम' गाने के अधिकार खरीदे.

क्या किसी ऐसे कलाकार को ये सुविधा मिल सकती थी जो फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक ना रखता हो.

कई साल पहले शाहरुख़ ख़ान गैर फिल्मी परिवार से आए थे और छा गए. अब भी उम्मीद है कि कोई और इसी तरीके से बाहर से आए.

9. दुखिया नारी, अब और नहीं:

हाल फिलहाल में जितनी भी तथाकथित 'महिला केंद्रित' फिल्में बनी हैं उनमें मुख्य किरदार काफी संघर्ष करता है और दुख झेलता है.

सामान्य मौज मस्ती करने वाले मुख्य महिला किरदार इन फिल्मों में नहीं होते. भला क्यों. पुरुष मित्रता पर हमारे यहां दिल चाहता है, ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा और काय पो छे जैसी फिल्में बनती रहती हैं. महिला मित्रता यानी फीमेल बॉन्डिंग पर ऐसी हल्की फुल्की मज़ेदार फिल्में क्यों नहीं बनती. ज़रूरत है फीमेल बॉन्डिंग वाली फिल्में बनाने की.

10. समलैंगिकता का सतही प्रस्तुतिकरण:

अक्सर हिंदी फिल्मों में समलैंगिकता को बेहद सतही और सस्ते तरीके से दिखाया जाता रहा है. ओनीर जैसे कुछ फिल्मकारों को छोड़ दिया जाय तो बाकी लोग बड़े अपरिपक्व तरीके से गे किरदार दिखाते हैं.

दुनिया बदल रही है. समलैंगिकता को स्वीकार्यता मिल रही है तो ऐसे में वक़्त आ गया है कि बॉलीवुड भी इस मामले में थोड़ी परिपक्वता दिखाए.

11. बेहूदा डांस बंद करो:

आजकल की फिल्मों में बड़े अजीब तरीके से डांस होने लगा है. डांस से आकर्षण चला गया है. ऐसे लगने लगा है मानो कलाकार एरोबिक्स कर रहे हों. पहले की फिल्मों में आंखों से नाचा जाता था. चेहरे के हाव भाव इस्तेमाल किए जाते थे. अब वो सब चला गया है.

गोविंदा और माधुरी दीक्षित जैसे नृत्य कला कौशल वाले कलाकारों की सख्त ज़रूरत है.

(नम्रता जोशी से बातचीत पर आधारित)

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