फिर लौटेगा ग़ज़लों का दौर: ग़ुलाम अली

  • 29 मार्च 2013
Image caption अपनी जीवनी रिलीज़ के वक़्त ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली

"आंधी-तूफान के बाद एक बार फिर शांति आती है. सुकून आता है. उसी तरह से आज के शोर शराबे वाले संगीत का दौर जब थमेगा तो एक बार फिर से ग़ज़लों और क्लासिकल सिगिंग का दौर आएगा. इस बात को कोई नहीं झुठला सकता."

ये कहना है मशहूर ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली का. जल्द ही ग़ुलाम की ज़िंदगी के अलग-अलग पहलू एक किताब के रूप में उनके प्रशंसकों के सामने होंगे.

इस किताब का नाम है ग़ज़ल विज़ार्ड-ग़ुलाम अली. इसी किताब के सिलसिले में ग़ुलाम अली ने ख़ास बातें कीं बीबीसी से.

सुनिए ग़ुलाम अली के खास बातचीत

वो कहते हैं, "अब इस किताब के ज़रिए में अपने चाहने वालों के लिए और ज़्यादा ज़िंदा रहूंगा. क्योंकि इस किताब से वो मुझे हमेशा याद रखेंगे. याद है तो आबाद है, भूला है तो बरबाद है."

बचपन के दिन

इस बातचीत में ग़ुलाम अली ने अपने बचपन के दिन, अपने पिता और अपने उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां का भी ज़िक्र किया.

पाकिस्तान के सियालकोट ज़िले के एक छोटे गांव में जन्मे ग़ुलाम अली ने बताया कि उनके पिता, बड़े ग़ुलाम अली के ज़बरदस्त मुरीद थे और उन्हीं से प्रभावित होकर उन्होंने उनका नाम ग़ुलाम अली रखा.

उन्होंने बताया, "शुरूआत के 10-12 सालों तक गाने के बाद कहीं जाकर मुझे थोड़ी जान पहचान मिली. साल 1964-65 में मेरी ग़ज़लें थोड़ी हिट हो गईं. फिर 70 के दशक में मेरी कुछ फिल्मी ग़ज़लें हिट हुईं. तब मेरे पिता ने कहा कि फिल्मी गाने तो कोई भी गा सकता है तुम वो गाओ जिसमें एक्सपर्ट हो. मैं खुश हूं कि मैंने ज़्यादा फिल्मी गीत नहीं गाए क्योंकि उसमें फिर कुछ भी गाना पड़ता."

दोनों देशों में मिला प्यार

ग़ुलाम अली कहते हैं कि उन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों से बराबर का प्यार मिला और दोनों ही जगह हर उम्र के लोग उन्हें चाहते हैं.

वो कहते हैं कि आज लोगों के पास वक़्त बहुत कम है शायद इसलिए लोग ग़ज़लें नहीं सुनते. लेकिन वो सुनहरा दौर एक बार फिर ज़रूर लौटेगा.

ग़ुलाम अली ने बताया कि वो मशहूर सितार वादक पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रक्खा खान, किशोरी अमोनकर, मेहंदी हसन और अपने अजीज दोस्त दिवंगत जगजीत सिंह की गायकी के बड़े कायल हैं.

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