फिल्म रिव्यू: हिम्मतवाला

  • 29 मार्च 2013
हिम्मतवाला

यूटीवी मोशन पिक्चर्स और पूजा एंटरटेनमेंट एंड फिल्म्स की हिम्मतवाला 1983 में रिलीज़ हुई हिम्मतवाला का रीमेक है.

रवि (अजय देवगन) अपने पिता धरम मूर्ति (अनिल धवन) की बेइज़्ज़ती का बदला लेने रामनगर आता है. इसके पीछे गांव के सरपंच शेर सिंह (महेश मांजरेकर) का हाथ होता है और इस अपमान की वजह से रवि के पिता आत्महत्या कर लेते हैं.

रवि उस वक्त छोटा बच्चा होता है और उसे लगता है कि उसकी मां सावित्री (ज़रीना वहाब) और बहन भी इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन सच्चाई ये होती है कि वो दोनों ग़रीबी में जीवन बिता रहे होते हैं.

खैर बड़े होकर रवि, अपनी मां और बहन को रामनगर ले आता है. लेकिन उससे पहले वो शेर सिंह और उसके साले नारायणदास (परेश रावल) को सीबीआई अफसर बनकर डराता है.

इस बीच धीरे धीरे रवि को शेर सिंह की बेटी रेखा (तमन्ना भाटिया) से प्यार हो जाता है. रवि की बहन पद्मा नारायणदास के बेटे शक्ति (अध्ययन सुमन) से प्यार करती है.

कैसे रवि की बहन को ज़रिया बनाकर शेर सिंह और नारायणदास उसकी ज़िंदगी में मुश्किलें पैदा करना चाहते हैं. रवि, कैसे शेर सिंह के अत्याचार से गांव वालों को मुक्ति दिलाता है. कैसे वो अपने पिता की बेइज़्ज़ती का बदला लेता है. लेकिन इस बीच रवि की एक असलियत भी सामने आ जाती है. यही सब फिल्म में दिखाया गया है.

फिल्म में एक शेर की भी अहम भूमिका है जो हीरो का साथ देता है और खलनायक से लड़ाई में उसकी मदद करता है.

पुराना स्क्रीनप्ले

फिल्म की कहानी बिलकुल पुरानी 'हिम्मतवाला' जैसी है. फिल्म का स्क्रीनप्ले फरहाद-साजिद और साजिद खान ने मिलकर लिखा है. जो इस दौर के दर्शकों के हिसाब से बेहद पुराना है.

इसमें 80 के दशक का मेलोड्रामा दिखाया गया है. जो बड़ा पुराना लगता है. रवि की बहन को शक्ति (अध्ययन सुमन) और उसके पिता नारायणदास (परेश रावल) द्वारा सताया जाना बड़ा अजीब सा लगता है.

Image caption अजय देवगन के अभिनय में दम नहीं है. वो नाचने वाले दृश्यों में अजीब लगे हैं

उसी तरह से शेर सिंह का गांववालों के सामने रवि की पोल खोलने की कोशिश करने वाला सीन भी बड़ा बेतुका लगता है.

स्क्रीनप्ले राइटर ने फिल्म में ज़बरदस्ती का हास्य भरने की कोशिश की लेकिन आज के दौर के दर्शकों को और खास तौर से युवाओं को ये हास्य बेतुका लगेगा और वो फिल्म की कॉमेडी के साथ नहीं बल्कि कॉमेडी पर हंसेगे.

नारायणदास के संवादों में बार-बार शहरों का नाम आना जैसे (डलहौज़ी, राजकोट), दर्शकों को भरपूर बोर करेंगे.

फूहड़ कॉमेडी

दर्शकों को तीन दशक पहले बनी हिम्मतवाला में कॉमेड़ी का ये ट्रैक पसंद आया होगा, लेकिन इस नई हिम्मतवाला में तो बात नहीं बनेगी.

फिल्म में अजय देवगन और शेर के बीच फिल्माए गए कुछ दृश्य सिंगल स्क्रीन थिएटर के दर्शकों को ज़रूर आकर्षित कर सकते हैं लेकिन हो सकते हैं शहरी, मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ये दृश्य बेहद हल्के और फूहड़ लगेंगे.

फिल्म के किरदार बेहद लाउड हैं. किरदारों के बीच के भावनात्मक दृश्य दर्शकों को बिलकुल अपील नहीं करते. रोमांस में बिलकुल भी दम नहीं है.

हां एक्शन दृश्य ज़रूर कुछ विशेष दर्शक वर्ग को पसंद आ सकते हैं. कॉमेड़ी के कुछ दृश्य और क्लाइमेक्स भी सिंगल स्क्रीन थिएटर के दर्शकों को पसंद आ सकते हैं. फिल्म के संवाद बेहद पुराने और घिसे-पिटे हैं.

साधारण अभिनय

अजय देवगन में वो बात नज़र नहीं आई जिसके लिए वो जाने जाते हैं. फिल्म के कई दृश्यों में तो अजय इस ज़बरदस्त मेलोड्रामा का हिस्सा बनने पर आई हिचकिचाहट को छिपाते हुए से प्रतीत होते हैं.

एक्शन दृश्यों में वो ठीक लगे हैं लेकिन गानों में उन्होंने बड़ा अजीब सा डांस किया है. नैनो में सपना वाले गाने में तो वो बहुत बेतुके लगे हैं.

तमन्ना भाटिया की बॉलीवुड में शुरुआत बड़ी ढीली रही. वो साधारण लगी हैं. फिल्म की शुरुआत में भड़कीले कपड़े पहने हैं और बहुत सामान्य अभिनय किया है.

परेश रावल ने अपने रोल को निभाने के लिए खासी मेहनत की है और कुछ हद तक सफल भी रहे हैं. छोटे से रोल में असरानी प्रभावित नहीं कर सके.

सोनाक्षी सिन्हा 'थैंक गॉड इट्स फ्राइडे' में ठीक ठाक लगी हैं.

साजिद खान 80 के दशक का 'जादू' पैदा करने के चक्कर में आज के दर्शकों को बिलकुल ही भूल गए.

साजिद-वाजिद का संगीत साधारण है. नैनो में सपना और ताकी ओ ताकी रे गीत पुरानी हिम्मतवाला से लिए गए हैं लेकिन पुराना जादू नहीं चला पाए. 'धोखा-धोखा' गाना अच्छा है.

कुल मिलाकर हिम्मतवाला का टिकट खिड़की पर कामयाब होना काफी मुश्किल है. हो सकता है कि सिंगल स्क्रीन थिएटर्स पर इसकी शुरुआत थोड़ी कमज़ोर हो. लेकिन मल्टीप्लेक्स दर्शकों का प्यार तो इसे नहीं मिल पाएगा.

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