बॉलीवुड: क्यों है बुरे का बोलबाला

जॉन अब्राहम
Image caption आने वाली फिल्म 'शूटआउट एट वडाला' में जॉन अब्राहम 80 के दशक के चर्चित गैंगस्टर मन्या सुर्वे का किरदार निभा रहे हैं.

जॉन अब्राहम की आने वाली फिल्म है 'शूटआउट ऐट वडाला', जिसमें वो 80 के दशक के एक के एक गैंगस्टर मन्या सुर्वे का किरदार निभा रहे हैं.

फिल्म में एक गाना भी है, आला रे आला मन्या आला जिसमें जॉन अब्राहम यानी मन्या सुर्वे को बड़े ग्लैमराइज़ तरीके से एक शक्तिशाली व्यक्ति के तौर पर पेश किया गया है.

' शूटआउट ऐट वडाला' ऐसी पहली फिल्म नहीं है जिसमें किसी गैंगस्टर को ऐसे प्रभावी तरीके से पेश करने की तैयारी हो.

इससे पहले भी 'अग्निपथ' हो या 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' हो या 'शूटआउट ऐट लोखंडवाला' या फिर 70 के दशक में रिलीज़ हुई अमिताभ बच्चन की 'दीवार' या 'डॉन' जैसी फिल्में हो. इन सब में ऐसे 'बुरे' किरदारों को बड़े 'लार्जर दैन लाइफ' तरीके से पेश किया गया.

बॉलीवुड पर अमीषा की राय

सवाल उठता है क्यों. बॉलीवुड को इन बुरे लोगों से भला इतना प्यार क्यों. क्या समाज में इससे ग़लत संदेश नहीं जाएगा.

क्या ऐसी फिल्में देखकर दर्शक ऐसे किरदारों से प्रभावित नहीं होने लगेंगे.

'असलियत से दूर किरदार'

फिल्म समीक्षक और लंबे समय से फिल्मों के जानकार रहे जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि किसी अंडरवर्ल्ड डॉन या डाकू की ज़िंदगी वैसी बिलकुल नहीं होती जैसी फिल्मों में दिखाई जाती है.

फिल्मों में उसे चमक-धमक के साथ दिखाया जाता है. फाइव स्टार होटल में वो बेरोक टोक आता-जाता है. ऐश करता है, वैसा बिलकुल नहीं होता.

चौकसे के मुताबिक, "हमारी फिल्मों में तो डाकू घोड़े पर बेधड़क आता है. और लड़की को उठाकर चलता बनता है. ऐसा असल ज़िंदगी में थोड़े ना होता है."

जयप्रकाश मानते हैं कि बॉलीवुड के फिल्मकार ऐसे खल-पात्रों के महिमामंडन के आरोप से नहीं बच सकते.

फिल्म क्रिटिक नम्रता जोशी की राय है कि 70 और 80 के दशक में जो बॉलीवुड फिल्में बनती थीं उनमें ऐसे गैंगस्टर या अंडरवर्ल्ड डॉन का चित्रण सोशल कॉन्टेक्स यानी उस दौर के समाज के संदर्भ में किया जाता था. लेकिन मौजूदा दौर की फिल्मों में उनका बड़ा रेट्रो चित्रण किया जा रहा है.

उन्हें बड़ा स्टाइलिश दिखाया जा रहा है. ये सच है कि ऐसे पात्रों को बड़े ग्लैमरस अंदाज़ में पेश किया जा रहा है. जिसे शायद सही नहीं ठहराया जा सकता.

'अकेला बॉलीवुड दोषी नहीं'

वैसे जयप्रकाश चौकसे इस मामले में अकेले बॉलीवुड को दोषी ठहराने से साफ इनकार करते हैं.

वो कहते हैं कि हॉलीवुड में 'गॉडफादर' सिरीज़ की फिल्म के साथ ऐसा हुआ.

गॉडफादर का पहला भाग जब रिलीज़ हुआ तो इसके मेकर्स ने भी माना कि ना चाहते हुए भी इसके मुख्य पात्र जो माफिया होता है, का 'ग्लोरीफिकेशन' यानी महिमा मंडन हो गया.

निर्माताओं ने कहा कि वो चाहेंगे कि फिल्म का दूसरा भाग जब रिलीज़ हो तो उसमें इससे बचा जाए. लेकिन 'गॉडफादर-2' में भी फिर से ऐसा ही हुआ.

दर्शक ज़िम्मेदार

क्या कहीं ना कहीं इसके लिए दर्शक भी ज़िम्मेदार हैं. क्या उनकी रुचि फिल्मकारों को बार-बार ऐसे चरित्रों का महिमामंडन करने के लिए बाध्य करती है.

Image caption समीक्षकों के मुताबिक, 'गॉडफादर' जैसी हॉ़लीवुड फिल्मों में भी खल-पात्रों का महिमामंडन होता रहा है.

नम्रता जोशी का कहना है, हां. वो कहती हैं, "दर्शक ग्लैमर देखना चाहते हैं. वो हर बात को बड़े सिंपल तरीके से ही समझना चाहते हैं. अगर आप किसी अंडरवर्ल्ड डॉन या गैंगस्टर की ज़िंदगी वास्तविक यानी जटिल तरीके से पेश करोगे तो दर्शक उसे नकार देंगे."

जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "फिल्मों के नियम बॉक्स ऑफिस तय करता है. जो माल चलता है वही बिकता है. दर्शकों को ऐसे किरदारों में मज़ा आता है. दर्शकों को हमेशा से राम के साथ-साथ रावण भी लुभाता रहा है."

नम्रता जोशी ये भी कहती हैं कि 'एंटी हीरो' की अवधारणा 70 के दशक की है. लेकिन अब ऐसे चरित्रों को हमारी फिल्मों में वापस लाकर इस नोस्टेलजिया को भुनाया जा रहा है.

जहां तक बॉलीवुड की राय है वो अपने बचाव में वही एक पुराना तर्क देता है जो वो सालों से देता आ रहा है और वो ये कि, "फिल्में समाज का आईना होती हैं. हम वही दिखाते हैं जो समाज में होता है. और जो लोगों को पसंद आता है."

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