बॉलीवुड की 5 बेहद ख़राब बातें

दबंग 2, हिंदी फिल्म
Image caption दिबाकर के मुताबिक 100 करोड़ का भूत बॉलीवुड को भ्रष्ट कर रहा है

भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने के मौके पर हिंदी सिनेमा के चार निर्देशकों ने मिलकर "बॉम्बे टॉकीज़' फ़िल्म बनाई है जिसमें चार अलग अलग कहानियों के ज़रिए हिंदी सिनेमा को सलाम किया गया है.

इन चार निर्देशकों में ज़ोया अख़्तर, अनुराग कश्यप, करण जौहर के साथ साथ दिबाकर बनर्जी भी है जिन्होंने बीबीसी से बातचीत में उन पांच बातों पर रोशनी डाली जिससे बॉलीवुड को दूर रहने की ज़रुरत है.

पढ़िए पूरी बात दिबाकर के शब्दों में -

सौ साल में भारतीय सिनेमा की वो चीज़ जो आज तक नहीं बदली - लोगों का सिनेमा के प्रति लगाव.

आप किसी दूसरे देश के व्यक्ति से बात करेंगे तो जानेंगे कि भारतीय लोगों का सिनेमा से जो जोड़ है वो किसी और देश का नहीं है.

भारतीयों की ज़िंदगी में सिनेमा की जो जगह है वो इस ग्रह के किसी औऱ निवासी के दिमाग में नहीं है.

मीडिया से दोस्ती

ऐसे में अगर बॉलीवुड की पांच बुरी चीज़ों की बात करुं जिससे दूर रहने में ही भलाई है तो सबसे पहले ये कि फ़िल्मों और मीडिया की ऐसी सांठ-गांठ हो गई है कि दर्शक को अपना दिमाग लगाने का मौका ही नहीं मिल रहा है.

फ़िल्म देखने से पहले ही बता दिया जा रहा है कि ये अच्छा है, ये बहुत छोटा है, ये बहुत ख़राब है, ऐसे में अगर आप उस बॉलीवुड या मीडिया के क्लब के सदस्य नहीं है तो आपकी फ़िल्म को दुकान में जगह नहीं मिलेगी.

100 करोड़ का भूत

दूसरी बात ये है कि आजकल फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही दर्शक को बता दिया जाता है कि ये फ़िल्म कितने करोड़ का धंधा करेगी.

ऐसे में दर्शक को ये संदेश जाता है कि चूंकि ये फ़िल्म सौ करोड़ का बिज़ेनस कर रही है इसलिए आपको देखनी चाहिए. इससे फ़िल्में और दर्शक दोनों ही भ्रष्ट हो रहे हैं.

हिंदी में सोचना बंद

Image caption 'बॉम्बे टॉकीज़' में दिबाकर के साथ तीन और निर्देशकों की फिल्में शामिल है.

तीसरी बात जो मैं महसूस कर रहा हूं कि बॉलीवुड में हिंदी भाषा में स्क्रिप्ट लिखना, निर्देशन करना, फ़िल्म बनाना धीरे धीरे कम होता जा रहा है.

निर्देशक ज़्यादातर अंग्रेज़ी में सोचकर हिंदी में फ़िल्म बना रहे हैं जो काफ़ी नकली लगता है. फ़िल्म देखकर समझ आता है कि निर्देशक को हिंदी नहीं आती.

अगर फ़िल्मकार अरबी में सोचकर अंग्रेज़ी में फ़िल्म बनाएगा तो वो कितनी कठिन बनेगी, इसी तरह हमारी बहुत सी फ़िल्मों में वो कठिनाई नज़र आती है जो कि नहीं होना चाहिए.

छोटे शहर का लेखक

चौथी बात हमारे ऐसे बहुत से लेखक है जो छोटे शहर या गांवों में है और उन्हें अपनी कहानी कहने का मौका सिर्फ इसलिए नहीं मिल रहा क्योंकि उन्हें 'कूल औऱ स्मार्ट' तरीके से अपनी कहानी को पेश करना नहीं आता.

कहानी तो कहानी होती है जो कोई भी कह सकता है और हमारे यहां अंग्रेज़ीयत का इतना दबदबा हो गया है कि सारी फ़िल्मों की कहानी एक जैसी ही लगने लगी है.

पढ़ना ज़रुरी है

पांचवी और सबसे ज़रुरी चीज़ ये है कि हम पढ़ना भूल चुके है इसलिए नई कहानियां नहीं कह पा रहे हैं. पहले ऐसा होता था कि हमारी फ़िल्में किसी प्रसिद्ध कहानी पर आधारित होती थी जिसका लेखक कभी-कभी फ़िल्मों में आकर लिख भी देता था.

अब वो लेखकों का ज़माना चला गया है और उसकी जगह एक 'स्क्रिप्ट राइटर' नाम का व्यक्ति आ गया है जिसको सबसे पहले एक हिट फ़िल्म बनानी है. कई दफे तो ऐसा होता है कि कुछ आइटम सीन को जोड़कर एक फ़िल्म बन जाती है.

कहानी कहना एक कला है जो लेखक या कहानीकार कहते हैं जो आजकल मिल नहीं रहे हैं और मुझे डर है कि इससे फ़िल्मों पर असर पड़ेगा.

(बीबीसी संवाददाता मधु पाल से बातचीत पर आधारित)

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