क्या बच्चों का खेल है रिएलटी शो ?

ड्रामेबाज़, रिएलटी शो
Image caption टैलेंट हंट शो में भाग लेने के लिए छोटे-बड़े शहरों के बच्चे बिल्कुल पीछे नहीं है

मेरे 4 साल के भतीजे को राउडी राठौड़ के डायलॉग रटे हुए हैं. पिछले दिनों एक परिचित ने कहा, "टीवी पर वो बच्चों की ड्रामेबाज़ी वाला शो आता है ना, इसे वहां क्यों नहीं भेजते?"

भारत में टैलेंट से जुड़े रिएलटी शो की दिवानगी किसी से छुपी नहीं है. लगभग हर टीवी चैनल पर एक ऐसा शो दिखाई पड़ ही जाता है जिसे देखकर माता-पिता को लगे कि उनका बच्चा भी इसमें जा सकता है.

आजकल ऐसे ही एक प्रसिद्ध म्यूज़िक शो इंडियन आयडल जूनियर के ऑडिशन का विज्ञापन टीवी पर छाया हुआ है.

अपनी प्रतिभा को करोड़ों लोगों के बीच पहुंचाने का ये तरीका बड़ों के साथ साथ बच्चों के बीच भी काफी लोकप्रिय है जिसका सबूत है ऑडिशन की लंबी लाइनें जहां सुबह 8 बजे से लगे बच्चे का नंबर रात को 10 बजे आता है.

ऐसे में जज के सामने जाकर अपनी प्रतिभा दिखाना और बदले में हां या ना का जवाब पाना, एक बच्चे के लिए ये क्या ये सफर वाकई में आसान है ?

तनुजा शंकर ने रिएलटी शो पर आधारित फीचर फिल्म 'म्यूज़िक मेरी जान' का निर्देशन किया है और उन्होंने बच्चों के कई ऑडिशन को करीब से देखा है.

तनुजा के अनुसार "मैंने ऐसे बच्चे देखे हैं जो एक नहीं कम से कम पचास बार ट्राय करते हैं और तब तक करते हैं जब तक उनका किसी ना किसी स्तर पर चयन नहीं हो जाता है.

अपना अनुभव बताते हुए तनुजा ने कहा "दो तरीके के बच्चे ऐसे ऑडिशन में आते हैं एक वो जिनके माता-पिता अपना सपना अपने बच्चे के ज़रिए पूरा करने की सोचते हैं और एक वो जो अपने माता-पिता से छुपकर आते हैं."

महत्वाकांक्षी सपने

इन रिएलटी शो में आने वाले बच्चों के सपनों की बात करते हुए तनुजा कहती हैं "ये महत्वाकांक्षा का एक कीड़ा है जो बच्चों को लगा हुआ है. जिस तरह से शो को दिखाया जाता है, एडिटिंग करके ड्रामा पेश किया जाता है, ये बच्चों को बहुत लुभाता है और उन सबको लगता है कि वो प्रसिद्ध हो जाएंगे."

वहीं कई टैलेंट शो में जज की भूमिका निभा चुके संगीत निर्देशक विशाल के अनुसार ऐसे बड़े सपने बच्चों के नहीं उनके मां-बाप दिमाग में लेकर चलते हैं. बच्चे शो में प्रसिद्ध होने नहीं आते वो तो इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें संगीत से या कला से प्यार है.

ना चुने जाने का दुख

Image caption टीवी चैनल पर इंडियन आइडल जूनियर के ऑडिशन के विज्ञापन छाए हुए हैं

टेलैंट शो में आई हज़ारों की भीड़ में जहां बच्चे का चयनित होना खुशी की बात होती हैं, वहीं ना चुने जाने पर बच्चे के मनोबल पर क्या असर पड़ता है ? तनुजा कहती हैं "रिजेक्शन सहने की शक्ति कई बार बच्चों में नज़र नहीं आती. कई बार तो वो मानने को ही तैयार नहीं होते की उनमें वो टैलेंट नहीं है जिसे ढूंढा जा रहा है."

वहीं सारेगामा लिटिल चैंप्स जैसे लोकप्रिय शो के निर्देशक गजेंद्र सिंह ने बीबीसी से बातचीत में ऐसी ही एक कड़ी को याद किया जिसमें एक प्रतिभागी की मां अपनी बेटी के बाहर हो जाने से इतनी निराश हुई की जज से लड़ पड़ी. इसके बाद खुद गजेंद्र को कैमरे के सामने आकर प्रतिभागी की मां को समझाना पड़ा.

गजेंद्र कहते हैं "मां बाप जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं उससे मुझे बहुत निराशा होती है कि क्यों वो इस मंच को हार-जीत की तरह लेते हैं. इसे बस अपने बच्चे की प्रतिभा को दिखाने का एक मौका समझिए ना."

परिपक्व सोच

हालांकि बच्चों के इन रिएलटी शो के पीछे की सच्चाई में सिर्फ निराशा ही नहीं छुपी है.

मीडिया समीक्षक विनीत कुमार के मुताबिक ये शो बच्चों को काफी परिपक्व कर देते हैं. सोचने वाली बात ये भी है कि इतने बड़े शो से बाहर होने के बावजूद भी वो उतना निराश नहीं होते जितना कि कम ग्रेड लाने वाला बच्चा होता है.

विनीत मानते हैं कि ऐसे शो में भाग लेने वाले बच्चे बहुत जल्द गला-काट प्रतियोगिता को और ज़िंदगी की हक़ीकत को समझ करके मानसिक रुप से काफी मज़बूत होते हैं.

वहीं पिछले पंद्रह सालों से रिएलटी शो बना रहे गजेंद्र के मुताबिक अब बच्चों में काफी जागरुकता आ गई है. अब पढ़ाई लिखाई के साथ साथ ऐसे हुनर को संभालने का तरीका आ गया है. पहले हम उनके पास चलकर जाते थे, अब बच्चे हमारे पास चलकर आते हैं.

करोड़ों लोगों द्वारा देखे जाने वाले इन टैलेंट शो के ज़रिए बच्चे अपने हुनर को समझ पाए या नहीं लेकिन ज़िंदगी का पाठ तो पल्ले पड़ ही जाता होगा, आखिर इन्हें रिएलटी शो ऐसे ही तो नहीं कहते ना.

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