फिल्म रिव्यू: एक थी डायन

  • 19 अप्रैल 2013
एक थी डायन

एकता कपूर और विशाल भारद्वाज की सह प्रस्तुति 'एक थी डायन' एक सुपरनेचुरल थ्रिलर है.

बिजॉय शरन माथुर उर्फ बोबो (इमरान हाशमी) एक जाना-माना जादूगर है लेकिन उसे लगता है कि कोई डायन उसे तंग कर रही है.

उसे बार-बार आभास होता है कि उसकी बहन उसके आसपास है, जिसकी बचपन में ही मौत हो गई थी.

बोबो की एक गर्लफ्रेंड है तमारा (हुमा क़ुरैशी) और दोनों ने एक बच्चे ज़ुबिन (मास्टर भावेश बालचंदानी) को गोद लिया है. तमारा, बोबो की उसके शोज़ में मदद करती है.

बोबो की पैतृक घर से कुछ डरावनी यादें जुड़ी हैं. जो उसे बार-बार परेशान करती हैं.

Image caption इमरान हाशमी और हुमा क़ुरैशी का अभिनय अच्छा है.

जब वो इसे और ज़्यादा सहन नहीं कर पाता तो डॉक्टर रंजन पलित (रोजोत्वा दत्ता) के पास जाता है जो बोबो को उसे हिप्नोटाइज़ यानी सम्मोहित करके बोबो को उसके अतीत में ले जाता है.

अब बोबो अपने बचपन के बारे में बताता है. उसके पिता शरन माथुर (पवन मल्होत्रा) अपने दोनों बच्चों की मर्ज़ी के खिलाफ उनकी आया डायना (कोंकणा सेन शर्मा) से शादी कर लेते हैं.

दोनों बच्चों को लगता है कि डायना, चुड़ैल है इसलिए वो उसे ज़रा भी पसंद नहीं करते. बोबो का डर तब सही साबित होता है जब डायना उसकी छोटी बहन मिशा (बेबी सारा अर्जुन) की हत्या कर देती है.

बोबो को यक़ीन है डायना ने इसलिए उसकी बहन की हत्या की ताकि वो शक्तिशाली बने और सारी शक्तियां हासिल कर ले. बोबो के पिता की भी तकरीबन उस वक़्त मौत हो जाती है.

डॉक्टर, बोबो की इस बात से सहमत नहीं होते लेकिन बोबो को पूरा यक़ीन है कि डायना चुड़ैल थी जो उसे फिर से तंग करने के लिए आ चुकी है.

तब बोबो की ज़िंदगी में लिसा दत्त (कल्कि कोचलिन) आती है. बोबो को लगता है कि लिसा, नई चुड़ैल है. बोबो का शक और भी गहरा हो जाता है जब लिसा, उसकी पैतृक संपत्ति खरीदने में दिलचस्पी दिखाती है.

क्या बोबो, लिसा को अपना घर बेचता है. क्या बोबो की ज़िंदगी में आई लिसा ही नई डायन है. क्या बोबो, डायन के प्रति अपने डर से निजात पाने में कामयाब हो पाता है.

दिलचस्प कहानी

लेखक विशाल भारद्वाज, मुकुल शर्मा और कानन अय्यर की लिखी कहानी दिलचस्प है. और स्क्रीनप्ले इंटरवल से पहले तक काफी कसा हुआ है और कई डराने वाले दृश्य पैदा करता है.

डायना की मौजूदगी की वजह से पहला भाग खासा डरावना बन पड़ा है. लेकिन पहले हिस्से में दर्शकों को लंबे वक्त तक इमरान हाशमी को देखने का मौका नहीं मिल पाता.

फिल्म की कहानी इंटरवल के बाद उलझ जाती है. कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए गढ़े गए कुछ दृश्य फिल्म में ज़बरदस्ती डाले गए लगते हैं. इन कमियों के बावजूद फिल्म में दर्शकों को डराने के लिए काफी कुछ मौजूद हैं.

बेहतरीन स्पेशल इफेक्ट

लिफ्ट में फिल्माया सीन और छिपकली वाले दृश्य बेहतरीन तरीके से फिल्माए गए हैं और दर्शकों को डरा पाने में सफल होते हैं.

डायनों का गेट-अप और डायना (कोंकणा सेन शर्मा) के धूल में मिल जाने वाले दृश्यों में कंप्यूटर ग्राफिक्स का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है.

विशाल भारद्वाज के लिखे डायलॉग बेहद सटीक हैं.

अभिनय

फिल्म में इमरान हाशमी का रोल उतना दमदार नहीं है जो उनके प्रशंसकों को निराश कर सकता है हालांकि उन्हें जो मौका मिला है उसे उन्होंने अच्छे से निभाया है.

फिल्म में कई अंतरंग और किसिंग सीन भी हैं जो दर्शकों को लुभाएंगे. डायना के रोल में कोंकणा सेन शर्मा बेहतरीन हैं. उनके चेहरे के हावभाव और संवाद अदायगी शुरू से लेकर आखिर तक ज़बरदस्त हैं.

हुमा क़ुरैशी ने भी अच्छा अभिनय किया है और वो खासी स्वाभाविक लगी हैं. कल्कि का रोल छोटा है लेकिन उनका काम भी अच्छा है.

रोजोत्वा दत्ता, डॉक्टर के रोल में असर नहीं छोड़ पाए हैं. इमरान हाशमी के बचपन के रोल में बाल कलाकार मास्टर विशेष तिवारी ने शानदार काम किया है.

Image caption कोंकणा सेन शर्मा ने ज़बरदस्तत अभिनय किया है.

कानन अय्यर का निर्देशन अच्छा है. वो दर्शकों को बांधे रखने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं.

विशाल का संगीत अच्छा है लेकिन सुपरहिट नहीं हो पाएगा. 'यारम' और 'ये काली काली आंखों का' गाने अच्छे बन पड़े हैं.

गीतों में गुलज़ार के बोल अच्छे और स्तरीय हैं. सौरभ गोस्वानी की सिनेमोटोग्राफी अच्छी है. कंप्यूटर ग्राफिक्स और विज़ुअल इफेक्ट्स बेहतरीन हैं.

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि 'एक थी डायन' एक बेहद मनोरंजक फिल्म हो सकती थी लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म खासी निराश करती है.

डिस्ट्रीब्यूटर शायद इस फिल्म के बॉक्स ऑफिस रिज़ल्ट से ज़्यादा खुश ना हों.

फिल्म के निर्माताओं की बात करें तो वो ज़रूर इससे मुनाफा कमा लेंगे क्योंकि वो सैटेलाइट, संगीत और ओवरसीज़ राइट्स बेचकर फिल्म की लागत का तकरीबन 90 फीसदी हिस्सा पहले ही वसूल चुके हैं.

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