आइटम गर्ल्स: कुक्कू से करीना तक

दबंग 2

आज हम जिसे आइटम सॉन्ग, आइटम नंबर, आइटम डांस कहते हैं उसकी शुरुआत दशकों पहले ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के ज़माने में ही हो चुकी थी.

ऐसे आइटम नंबर अक्सर ‘बार’ में बार डांसर, खलनायकों की पार्टी में ‘खलनायिका’ और कई बार कॉमेडी कलाकारों के माध्यम से किए जाते थे.

ऐसा भी हुआ कि नायक-नायिका का दर्शकों से पहला परिचय भी आइटम गीत के साथ हुआ तो कई बार फ़िल्म के विषय के निचोड़ को भी आइटम नम्बर के रूप में पेश किया जाता था.

आइए नज़र डालते हैं हिंदी सिनेमा की कुछ यादगार आइटम डांसर्स पर.

कुक्कू

चालीस और पचास के दशक में कुक्कू आईं थी जिनकी लचीली अदाओं को देख कर इन्हें ‘रबर गर्ल’ भी कहा जाता था.

कुक्कू ने 1946 में पहली फ़िल्म ‘अरब का सितारा’ की थी लेकिन 1948 में महबूब ख़ान की फ़िल्म ‘अनोखी अदा’ से उन्हें शोहरत हासिल हुई.

Image caption नादिरा ने 50 के दशक में कई फिल्मों में आइटम सॉन्ग पेश किए.

राजकपूर, दिलीप कुमार और नर्गिस की फ़िल्म ‘अन्दाज़’ से उनकी अभिनय क्षमता भी उभर कर सामने आई.

‘मुझे जीने दो’ (1963) उनकी आख़िरी फ़िल्म थी. फ़िल्म ‘आवारा’ का गाना ‘एक दो तीन, आजा मौसम है रंगीन’ उनका यादगार आईटम नम्बर है.

नादिरा

‘श्री 420’ का गाना ‘मुड़ मुड़ के ना देख’ सबको याद होगा, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि इसके बोल अच्छे थे बल्कि इसलिए भी कि उसमें ‘माया’ (नादिरा) का मायावी नृत्य और अभिनय भी बहुत अच्छा था.

नदिरा को 1975 में ‘जूली’ के लिए ‘श्रेष्ठ सह अभिनेत्री’ का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला.

पचास और साठ के दशक में लगभग सभी फ़िल्मों में नादिरा ने खलनायिका की भूमिका और आइटम नम्बर किए.

हेलन :

ऐंग्लो बर्मीज़ हेलन को कुक्कू बॉलीवुड में ले कर आईं थीं. उस समय हेलन को ‘शबिस्तान’ और ‘आवारा’ (1951) में कोरस डांसर के रूप में काम मिला था.

इसके बाद और भी काम मिले लेकिन 1958 में शक्ति सामंत ने जब ‘हावड़ा ब्रिज’ बनाई तो हेलन को पहली बार अकेले आइटम नम्बर करने को मिला जिसका नाम था ‘मेरा नाम चिन चिन चू’.

इस समय हेलन की उम्र महज़ 17 साल थी. इसके बाद तो हेलेन के पास फ़िल्मों का अंबार लग गया.

Image caption हेलेन ने 60 और 70 के दशक में कई फिल्मों में आइटम सॉन्ग किए.

हेलन के लिए शुरु में गीता दत्त ने गाने गाए और बाद में आशा भोंसले ने.

1979 में फ़िल्म ‘लहू के दो रंग’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर का श्रेष्ठ सह अभिनेत्री का पुरस्कार मिला और 1999 में फिल्मफेयर ने उन्हें लाइफ टाइम एचीवमेंट अवॉर्ड से नवाज़ा गया.

अरुणा ईरानी :

हेलन के बाद, अभिनेत्री अरुणा ईरानी का नाम याद आता है. अरुणा ईरानी ने और भी बहुत सारी भूमिकाएँ की लेकिन आइटम नम्बर के तौर पर उन्हें ख़ासतौर पर याद किया जाता है.

उन्होंने तक़रीबन 300 फ़िल्में की. उन्हें दो बार सह अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला और 2012 में फिल्मफेयर ने उन्हें लाइफ टाइम एचीवमेंट अवॉर्ड दिया.

फ़िल्म ‘कारवाँ’ का गाना ‘दिलबर दिल से प्यारे’ उनके हिट गानों में से एक है.

बिंदू

सत्तर के दशक में बिंदू का आना हुआ जिन्होंने शक्ति सामंत की फिल्म ‘कटी पतंग’ में एक आइटम नम्बर किया “मेरा नाम शबनम’ जो काफ़ी मशहूर भी हुआ.

बिंदू ने भी हेलेन और अरुणा ईरानी की तरह कैबरे किया और वैंप की भूमिका भी निभाई.

‘ज़ंजीर’ का उनका गाना ‘दिल जलों का दिल जला के क्या मिलेगा’ एक महत्वपूर्ण आइटम नम्बर है.

उन्होंने ‘अभिमान’ (1973) जैसी फ़िल्मों में संवेदनशील भूमिकाएँ भी की हैं.

मलाइका अरोड़ा ख़ान :

Image caption बदलते समय के साथ मुख्य भूमिका निभानी वाली अभिनेत्रियां भी आइटम सॉन्ग करने लगीं.

आज के दौर में आइटम नंबर की जब बात होती है तो मलाइका अरोड़ा ख़ान का नाम सबसे ऊपर आता है.

दर्शकों ने इन्हें सबसे पहले मणि रत्नम की फ़िल्म ‘दिल से’ (1998) में ‘छैय्या छैय्या’ करते देखा.

2005 में उन्होंने एक और आइटम नम्बर किया फ़िल्म ‘काल’ में. उनका ‘मुन्नी बदनाम हुई’ सुपरहिट रहा.

इसके अलावा उन्होंने ‘हे बेबी’, ‘ओम शांति ओम’, ‘हाऊसफ़ुल 2’ आदि फ़िल्मों में भी आइटम नम्बर किया है.

नायिकाओं ने किए आइटम नम्बर

ऐसी भी कई अभिनेत्रियाँ हैं जिन्होंने आइटम नम्बर से शुरुआत की और बाद में फ़िल्म की नायिका बन गईं और कई नाम ऐसे भी हैं जिन्होंने नायिका होते हुए भी कई फ़िल्मों में आइटम नम्बर पेश किए.

वहीदा रहमान : वहीदा रहमान की पहली हिन्दी फ़िल्म थी ‘सी आई डी’ (1956) जिसमें उन्होंने खलनायक के सहयोगी की भूमिका निभाई थी. इसमें उन्होंने नायक देव आनंद के सामने एक गाना गाया था ‘कहीं पे निगाहें कहीं निशाना’.

रेखा : 1986 में फिरोज़ ख़ान की हिट फ़िल्म आई थी ‘जाँबाज़’ जिसमें एक आइटम नम्बर रेखा ने किया और गाने के बोल थे ‘प्यार दो प्यार लो’.

माधुरी दीक्षित : 1993 की सुभाष घई की फ़िल्म ‘खलनायक’ में माधुरी ने चोली के पीछे क्या है’ गाना किया था, जो काफ़ी विवादों में भी रहा और हिट भी.

ईशा कोप्पिकर : ईशा कोप्पिकर का तो नाम ही पड़ गया था ‘खल्लास गर्ल’. ईशा ने रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म ‘कंपनी’ (2002) में आइटम प्रस्तुत किया था.

कैटरीना कैफ़ : कैटरीना कैफ़ ने ‘तीस मार ख़ाँ’ (2010) में ‘शीला की जवानी’ आइटम नंबर करके जो शोहरत हासिल की उससे कहीं ज़्यादा ‘अग्निपथ’ (2012) की ‘चिकनी चमेली’ ने धमाल मचाया.

करीना कपूर : करीना भी एक ऐसी नायिका हैं जिन्होंने कई फ़िल्मों में आइटम नम्बर किया है जैसे ‘दबंग 2’ (2012) में ‘फेवीकोल से’, और ‘एजेंट विनोद’ (2012) में ‘दिल मेरा मुफ़्त का’ हिट रहा.

अभिनेताओं के आइटम नम्बर

अब कुछ ऐसे पुरुष कलाकारों का ज़िक्र भी होना चाहिए जिन्होंने आइटम नंबर भी किए और अन्य भूमिकाएँ भी निभाईं. ऐसे आइटम नंबर का मक़सद होता था फ़िल्म के विषय को एक गाने में प्रतीकात्मक ढंग से बता देना या हास्य पैदा करना.

मोतीलाल : मोतीलाल हिंदी सिनेमा के शुरुआती यथार्थवादी अभिनेताओं में बहुत अहम थे. जब राज कपूर ने शंभु मित्रा के निर्देशन में फ़िल्म बनाई थी ‘जागते रहो’ (1956) तो उसमें मोतीलाल पर एक गाना फ़िल्माया गया ‘ज़िन्दगी ख़्वाब है’.

यह गाना जीवन की क्षणभंगुरता पर बल देता है.

जॉनी वाकर : जॉनी वाकर वैसे तो हास्य कलाकार थे पर ‘सी आई डी’ (1956) का गाना ‘यह है बॉम्बे मेरी जान’ बड़े शहरों के मिज़ाज को दर्शाता एक ऐसा आइटम नम्बर है जिसे बहुत ही चुटीले अन्दाज़ में मोहम्मद रफ़ी ने गाया भी है और जॉनी वाकर ने अभिनय भी किया है.

महमूद : ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं’ किसे नहीं याद होगा. महमूद का यह आइटम फ़िल्म ‘गुमनाम’ (1965) का है जिसमें उन्होंने हेलन के साथ गाना गाया है.

आइटम गीत करने वालों की फेहरिस्त में आजकल नाम बढ़ते जा रहे हैं. पहले जहां आइटम गीत का होना वैकल्पिक बात थी, वहीं वर्तमान में आइटम गीत का होना एक अनकहा सा नियम हो गया है जिसके दबाव में कई बार निर्देशक आ जाते हैं.

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