'बॉलीवुड को चाहिए असली कहानियाँ'

बॉम्बे टाकीज़

कान समारोह में भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने का जश्न मनाया गया. कई मायने में भारतीय सिनेमा का एक अपना ही अंदाज़ है.

लेकिन अब कुछ भारतीय फ़िल्मकार इस परंपरागत स्टाइल से आगे निकलना चाहते हैं.

कुछ का कहना है कि अब बॉलीवुड को फ़ंतांसी के चगुंल से निकलकर वास्तविक सिनेमा की ओर ध्यान देना चाहिए.

अक्षत वर्मा ने दो साल पहले 'डेल्ही बैली ' नाम की फ़िल्म लिखी थी जो ख़ूब चली. इसमें ऐसे किरदार थे जो वास्तविक से लगते थे. अक्षत वर्मा की कोशिश ऐसा स्क्रीनप्ले लिखने की थी जो बॉलीवुड के बनावटीपन के ख़िलाफ़ हो.

असल ज़िंदगी की कहानियां

Image caption डेल्ही बैली के अक्षत वर्मा कहते हैं कि हिंदी फ़िल्मों के किरदार असल ज़िंदगी में नहीं दिखते.

अक्षत वर्मा कहते हैं, "मैं बचपन में जो फ़िल्में देखता था उनसे कोई रिश्ता कायम नहीं कर पाता था. मेरी इच्छा ऐसे किरदार गढ़ने की थी जिन्हें मैं जानता था. ऐसे किरदार जिनमें थोड़ी उद्दंडता या थोड़ा लापरवाही हो. हमारी कहानियों में सबकुछ कितना सौम्य होता है.

अब फ़िल्मकार वास्तविकता नहीं स्क्रीन पर प्यार-मोहब्ब के सीन पर आज़ादी से दिखाना चाहते हैं.

बॉलीवुड में तो मर्द और औरत के बीच चुबंन के सीन भी दुर्लभ होते हैं. ऐसे में भारतीय सिनेमा के सौ साल को समर्पित फ़िल्म बॉलीवुड टाकीज़ में समलैंगिक जोड़े को चुंबन करते दिखाया गया है.

भारतीय रंगकर्मी और निर्देशक फ़िरोज़ अब्बास ख़ान कहते हैं, " ऐसे सिनेमा की ज़रुरत है जो समाज की हक़ीक़त बयान करे. देश में कुछ गंभीर मुद्दे हैं लेकिन इनपर फ़िल्मों के शक्ल में बहस नहीं हो रही है. मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा धार्मिक असहनशीलता या यौन प्रताड़ना को नज़रअंदाज़ करता आ रहा है. "

लेकिन अक्षत वर्मा कहते हैं कि सेंसर बोर्ड एक बाधा है क्योंकि ये समझ पाना मुश्किल है कि सरकार को फ़िल्मों से किस प्रकार का डर रहता है.

हिम्मत

Image caption दीपा मेहता कहती हैं कि सत्यजीत रे के देश में अब कुछ फ़िल्मकार वास्तविक सिनेमा बनाने की हिम्मत जुटा रहे हैं.

भारतीय निर्देशक दीपा मेहता को लगता है कि सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक और बिमल रॉय जैसी संवेदना लौट रही है.

दीपा मेहता ने बताया, "हम सत्यजीत रे के देश से हैं, जिन्होंने हमारे सिनेमा को नई ऊंचाई दी. शुक्र है अब कुछ युवा निर्देशक हिम्मत वाला काम कर रहे हैं. "

लेकिन क्या इस नए सिनेमा के लिए बाज़ार है?

हाल के सालों में भारत में एक नया मध्यम वर्ग आया है जो मल्टीप्लेक्सों में ऐसी फ़िल्में देख रहा है. निर्देशक देवाशीष मखीजा कहते हैं कि अगर बॉलीवुड दिलचस्प फ़िल्में बनाएगा तो लोगों का पसंद भी बदलेगी.

अब तक बॉलीवुड ने अमरीकी फ़िल्मों का अंदाज़ नहीं अपनाया है लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि नए पटकथा लेखक इस भंवर में फंस सकते हैं.

फ़िरोज़ अब्बास ख़ान कहते हैं, " हॉलीवुड की फ़िल्मों से कहानी चुराना आसान है. लेकिन इससे क़िस्सा सुनाने का स्थानीय अंदाज़ प्रभावित होता है. "

द लंचबॉक्स नए भारतीय सिनेमा का अच्छा उदाहरण है. इसे कान समारोह मे दिखाया गया. इस फ़िल्म में कोई नाच-गाना नहीं है और ना ही बनावटी भावुकता.

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