ऋतु दा, सेक्शुएलिटी और सिनेमा

ऋतुपर्णो घोष

49 साल की उम्र में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले फिल्मकार कम ही होते हैं. ऋतुपर्णो घोष ऐसा ही एक नाम थे जिनकी अकस्मात मृत्यु से सिर्फ बंगाली नहीं भारतीय सिनेमा सदमे में है.

ऋतुपर्णो की पहली फिल्म 'हीरेर आंग्टी' (हीरे की अंगूठी) 1994 में आई थी. निर्देशक कल्पना लाजमी ने बीबीसी को बताया कि जया बच्चन, शबाना आज़मी औऱ भूपेन हज़ारिका ने इस फिल्म को बनाने में आर्थिक मदद की थी.

कल्पना बताती हैं "जब ऋतु बहुत प्रसिद्ध नहीं हुआ था, भूपेन और मैं तब से उनकी फिल्में देख रहे हैं. उसमें इतनी एनर्जी थी कि वो एक साल में 2-3 फिल्में बना लेता था. सत्यजीत रे के बाद उसी की फिल्में भारतीय सिनेमा का अच्छा प्रतिनिधित्व करती थीं."

'हीरेर आंग्टी' की अभिनेत्री मुनमुन सेन ने बीबीसी को बताया "ऋतु ने मुझे अपनी पहली फिल्म हीरेर की स्क्रिप्ट पढ़कर सुनाई थी. मेरा छोटा सा ही रोल था लेकिन फिल्म बहुत अच्छी थी. उसने मुझसे वायदा किया था कि रायमा को अपनी हर फिल्म में लेगा."

ऋतु ने एक हद तक अपना वायदा निभाया भी क्योंकि 'चोखेर बाली' से लेकर 'नौकाडूबी' और 'खेला' उनकी लगभग हर फिल्म में रायमा सेन ने अभिनय किया है.

मुनमुन सेन कहती हैं "रायमा और रिया को वो अपनी बेटी समझता था. रायमा का सबसे अच्छा अभिनय नौकाडूबी में ही था."

सिर्फ रायमा ही नहीं हिंदी सिनेमा का जाना-माना नाम एश्वर्या राय बच्चन ने भी अपने करियर की श्रेष्ठतम फिल्में ऋतुपर्णो के साथ ही की हैं. एश्वर्या की खूबसूरती के बाद उनकी अभिनय क्षमता की बात 'चोखेर बाली' के बाद ही की गई थी.

ऋतुपर्णो खुद को समलैंगिक मानते थे और अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर वो काफी सहज भी थे. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'मेमरीज़ ऑफ मार्च' में उन्होंने एक समलैंगिक की भूमिका भी निभाई थी.

फैशन शो हो या फिर पुरस्कार समारोह, ऋतु महिलाओं की पोशाक में नज़र आते थे जिसके लिए वो कई बार मीडिया में चर्चा का पात्र भी बन जाते थे. बावजूद इसके वो बिना किसी झिझक या शर्म के महिलाओं के कपड़े पहनते थे और समलैंगिकता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते थे.

इस फिल्म में उनकी सहकलाकार रही दीप्ति नवल ने बीबीसी को बताया "अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा. उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी."

दीप्ति के अनुसार "ऋतु सिर्फ पुरुषों और महिलाओं के ही नहीं हर मुद्दे को इतनी गंभीरता और संजीदगी से प्रस्तुत करते थे कि मैं क्या कहूं. उनकी अकस्मात मृत्यु से मैं बहुत सदमे में हूं."

संगीत समीक्षक पवन झा बताते हैं कि ऋतु की फिल्मों में संगीत बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता था. समाज द्वारा अनदेखे मुद्दों को अपनी फिल्मों में एक अच्छी और साधारण भाषा में दिखाना, यही ऋतुपर्णो की फिल्मों को औरों से हटकर बनाती है.