हीमैन धर्मेंद्र: तब भी, अब भी

  • 7 जून 2013
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Image caption यमला पगला दीवाना-2 के म्यूज़िक लॉन्च पर सितारों के साथ धर्मेंद्र

धर्मेंद्र को फिल्म इंडस्ट्री में एक बेहतरीन अदाकार होने के साथ साथ बड़े दिल वाला इंसान भी माना जाता है. उनके जैसे सहज इंसान बॉलीवुड में में बिरले ही हैं.

(सनी ने पापा को क्या तोहफा दिया)

एक वक़्त ये बात मशहूर थी कि धर्मेंद्र के घर के दरवाज़े पंजाब के गांव से आने वाले हर शख़्स के लिए खुले हैं.

Image caption धर्मेंद्र ने 1960 में 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' फिल्म से अपना करियर शुरू किया.

धर्मेंद्र को फिल्मों में आए 50 साल से ज़्यादा हो चुके हैं. लेकिन पर्दे पर वो अब भी 'बूढ़े' नहीं हुए. और अपने समकालीन दूसरे अभिनेताओं की तरह बालों में सफेदी लगाकार वो दादा या परदादा के रोल भी नहीं कर रहे हैं.

(आमिर, शाहरुख संग धरम की मस्ती)

आम लोगों की नज़रों में वो अब भी 'हीमैन' हैं और सदाबहार जवान भी. एक और बात दिलचस्प है कि उन्होंने फिल्मों में मज़बूत जगह बिना किसी प्लानिंग के, बिना रणनीति के, बिना किसी तरह की राजनीति के और बिना किसी कैंप में शामिल हुए बनाई.

शुरुआत

वो बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे. वो बेहद खूबसूरत दिखते थे. लेकिन इसका एक बुरा पहलू भी है. और वो ये कि उनके 'लुक्स' की बात इतनी ज़्यादा होती थी कि कभी भी उनकी अभिनय क्षमता की बातें ज़्यादा हुई नहीं.

एक अभिनेता के तौर पर उन्हें वो मुक़ाम कभी मिला नहीं जिसके वो हक़दार थे.

पंजाब के एक गांव के स्कूलमास्टर का बेटा, जो अनाज भरे एक ट्रक में बैठकर मुंबई आया और फिर फिल्मफेयर टैलेंट हंट में चुना गया. धर्मेंद्र ने मुंबई में अपने शुरुआती दिन वर्सोवा के एक छोटे से किराए के घर में बिताए.

अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से अपना करियर शुरू किया, लेकिन कामयाबी पाने में वक़्त लगा.

शुरू की फिल्में या तो रोमांटिक थीं या सोशल ड्रामा. जिसमें हीरो को कुछ 'कमाल' दिखाने का मौका नहीं मिलता.

'हीमैन' की छवि

ओ पी रल्हन की फिल्म 'फूल और पत्थर' से उनके करियर में महत्तवपूर्ण मोड़ आया.

(हीमैन धर्मेंद्र)

फिल्म में उन्होंने एक दरियादिल गुंडे की भूमिका निभाई जिसे एक विधवा से प्यार हो जाता है. फिल्म के एक सीन में उन्होंने शर्ट उतारी जिससे उन्हें 'सेक्सी हीरो' की इमेज मिली.

इस फिल्म के साथ ही उनके और मीना कुमारी के रोमांस के किस्से भी खूब उड़े और इससे उनके करियर को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा.

Image caption 70 के दशक में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की जोड़ी जो जमी तो कामयाबी का सिलसिला आज भी कायम है.

'फूल और पत्थर' से पहले वो ऋषिकेश मुखर्जी की तीन फिल्मों, 'अनुपमा', 'सत्यकाम' और 'मंझली दीदी' में शरीफ़ किरदार निभा चुके थे, लेकिन फिर 'आंखें', 'यक़ीन' और 'मेरा गांव मेरा देश' से उनकी छवि बदलनी शुरु हुई.

हेमा-धरम की जोड़ी

इसी दौरान उनकी जोड़ी हेमा मालिनी के साथ जमनी शुरू हुई. और उनके बाद उनकी जोड़ी के हिट देने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक क़ायम है. (हालांकि दोनों की शादी और उससे जुड़े विवाद उस वक़्त मीडिया की काफी सुर्खियां भी बने)

'राजा जानी', 'दो चोर', 'ललकार', 'यादों की बारात', 'कीमत', 'लोफर', 'जुगनू', 'चरस' और 'प्रतिज्ञा' जैसी कामयाब फिल्मों से उनकी 'एक्शन स्टार' वाली छवि और मज़बूत हुई.

राजेश खन्ना और ऋषि कपूर जैसे रोमांटिक हीरो के आने के बाद और अमिताभ बच्चन की सुपरस्टारडम के बाद भी धर्मेंद्र की लोकप्रियता में कोई असर नहीं पड़ा.

कॉमेडी में भी दमदार

'सीता और गीता' में उन्होंने अपने कॉमिक टैलेंट के भरपूर नज़ारे पेश किए.

उसके बाद आई ऋषिकेश मुखर्जी की 'चुपके चुपके' में उन्होंने साबित कर दिया कि कॉमेडी में उनका जवाब नहीं.

'शोले' में कॉमेडी और एक्शन से मिले जुले उनके रोल ने उनकी लोकप्रियता को बिलकुल चरम पर पहुंचा दिया. पानी की टंकी पर खड़े होकर उनका 'सुसाइड वाला सीन' आज भी लोगों को याद है.

Image caption 50 सालों से भी ज़्यादा समय से धर्मेंद्र के आकर्षण में ज़रा भी कमी नहीं आई है.

80 का दशक आते आते हिंसा प्रधान फिल्मों की भरमार हो गई. धर्मेंद्र की इमेज ऐसी फिल्मों में भरपूर फिट बैठी और उन्होंने कई कामयाब फिल्में दीं.

संवाद अदायगी

इस दौरान एक ख़ास अंदाज़ में कही गई उनकी संवाद अदायगी ख़ासी मशहूर हुई और 'कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा' जैसे संवाद बेहतरीन हिट हुए.

इस दौर में उनकी फिल्मों के टाइटल उनकी फिल्मों की विषय वस्तु को परिभाषित करते थे. 'क़ातिलों का क़ातिल', 'ख़ुदा कसम', 'क्रोधी', 'मैं इंतक़ाम लूंगा', 'बग़ावत', 'बदले की आग', 'ज़ख़्मी दिल', 'जीने नहीं दूंगा', ये फिल्में ऐतिहासिक भले ही नहीं थीं लेकिन इनमें से कई कामयाब ज़रूर थीं.

1983 में उनके बेटे सनी देओल ने फिल्मों में प्रवेश किया.

1985 में धर्मेंद्र 50 साल के हो गए. धीरे धीरे उन्होंने परंपरागत हीरो की जगह ऐसे रोल निभाने शुरू कर दिए जो थोड़ा ज़्यादा परिपक्व और गरिमामय थे हालांकि उन्होंने कोई 'ओल्ड कैरेक्टर' नहीं निभाया .

इस दौर में 'ग़ुलामी', 'सल्तनत' और 'हुकूमत' जैसी फिल्में आईं. हालांकि इसके बाद उन्होंने 'पाप को जलाकर राख कर दूंगा', 'नफरत की आंधी', 'वीरू दादा' जैसी बी ग्रेड की फिल्में कीं, जिसमें वो 'लीडिंग मैन' ही बने थे. किसी निर्माता ने भी उन्हें 'चरित्र रोल' देने की हिम्मत नहीं की.

सदाबहार

साल 2000 के बाद वो फिल्मों में यदा-कदा ही नज़र आते थे. लेकिन अब भी वो सिल्वर स्क्रीन के 'हीमैन' थे.

उन्होंने 'लाइफ इन अ मेट्रो' और 'जॉनी गद्दार' जैसी फिल्मों से दर्शकों को चकित भी किया. 'यमला पगला दीवाना' और अब उसके सीक्वेल में भी वो मस्तमौला, रंगीन किस्म का किरदार निभा रहे हैं.

300 से ज़्यादा फिल्में कर चुके धर्मेंद्र ने अपनी शर्तों पर अपना जीवन जिया, चाहे वो निजी हो या फिल्मी हो.

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