'बच्चे पैदा करने के लिए शादी की क्या ज़रूरत है?'

  • 8 जून 2013

दृश्य 1.

नायक - तुन्हें क्या पता कि अलग-अलग देश में रहने का नशा क्या होता है?

नायिका - और तुम्हें क्या पता कि अपनों के साथ रहना क्या होता है?

नायक - कैलिफ़ोर्निया की धूप

नायिका - बंबई की बारिश

नायक - हू बेरी चीज़ केक

नायिका - गाजर का हलवा

नायक - ब्रॉडवे पे फैंटम ऑफ़ दी ओपरा

नायिका - मराठा मंदिर में डीडीएलजे

दृश्य 2.

नायक – शादी के बेसिक कॉन्सेप्ट में ही झोल है. इसे पांच-छह बार करने से अच्छा है कि शादी करो ही मत.

नायिका – और अगर बच्चे चाहिए तो!

नायक – उसका शादी से क्या लेना-देना. वो तो हम अभी बना सकते हैं. चलो मंदिर के पीछे. मैं ट्विन्स भी बना सकता हूं.

ये कोई सभ्यताओं का संघर्ष नहीं. हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में नायक और नायिका के बीच का संवाद है. जहां दोनों अपने विचार, संस्कार और जीवन शैली में नदी की दो विपरीत धारा की तरह हैं, लेकिन प्रेम को पाने के लिए कहीं न कहीं मिल जाना चाहते हैं. मगर ये संभव हो तो कैसे? एक हफ्ते में सौ करोड़ से ज्यादा का कारोबार करनेवाली और इस साल अब तक की सबसे क़ामयाब फिल्म मानी जा रही ‘ये जवानी...’ का ताना-बाना कुछ ऐसे ही बुना गया है.

'सेक्सी पैर'

फिल्म शुरू होती है सहनायिका के ऐसे संवाद के साथ कि ‘मेरे सेक्सी पैरों को क्यूं घूर रहे हो’. ये डायलॉग हो रहा है एक मल्टी स्पेशियालिटी डिपार्टमेंटल स्टोर में सामान खरीदने पहुंची सहनायिका और एक स्कूल जाते से लग रहे बच्चे के बीच.

खैर मामला जवानी के दीवानी होने का है तो ‘प्रथम ग्रासे सेक्सी पग संवाद’ तो बनता ही है. सिनेमा हॉल में बैठे स्वच्छंदतावादी और अति आधुनिकता के अतिरेक से लबरेज हर भावक के मन में तरंगें उठने लगीं कि दीवानी जवानी का आगाज़ ऐसा है तो अंजाम कितना रतिकाम सराबोर भरा होगा.

बहरहाल श्रीलाल शुक्ल से शब्द उधार लेकर कहें तो सहृदय दर्शक की बांछें शरीर में जहां कहीं भी होती हैं खिल गई थीं.

ज्यादा बड़ी भूमिका न बांधते हुए और कहानी के विस्तार में न जाते हुए भी ये जान लेना ज़रूरी है कि फिल्म का नायक आज के दौर के युवकों और युवक होते किशोरों का प्रोटोटाइप रोल मॉडल है जो अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहता है.

लंबी उड़ान भरना चाहता है. देश और काल की सीमाओं में बंधना नहीं चाहता. यायावरी करना चाहता है. बहती नदी बनना चाहता है. जीवन में ठहराव उसे थमे हुए पानी के सड़ेपन का अहसास देता है. उसे शादी ब्याह में यक़ीन नहीं. भला कोई एक व्यक्ति के साथ सालों साल एक ही चाहरदीवारी के बीच कैसे गुज़ार सकता है. रणबीर-दीपिका की ये जवानी है दीवानी

वही रुटीन लाइफ़, वही चेहरे. उसे वेराइटी चाहिए. स्थान में, कपड़ों में, जीवन में, जीवन साथी में. बहुत सामान्य घर का नज़र आता है, आर्थिक स्थिति भी सामान्य है लेकिन ऊंची उड़ान भरने की तमन्ना है, दुनिया देखने का ख्वाब है.

उसे प्रकृति के पल-पल बदलते सौंदर्य को देख कर जीवन में किक मिलती है. और पिता भी ऐसे हैं जो अपने मन की सुनने का साहस रखनेवाले इस नायक में अपने व्यक्तित्व की कमियों को पूरा होता देखते हैं और किसी न किसी रूप में उसकी सहायता करते हैं.

विपरीत धाराओं का मिलन

ऐसे ही अबाधित नदी से उफान भरते कथा नायक की मुलाकात एक ठहरी हुई नदी सी नायिका से हो जाती है जिसके जीवन को माता-पिता ने तालाब के पानी सा बांध रखा है. मेडिसीन की पढ़ाई करती है. शुरुआत से क्लास में टॉपर है. सब कुछ जैसे क़ामयाबी के नुस्खे वाले सांचे में डालकर प्लैन किया गया है. जीवन में असफल होने की कोई गुंजाइश नहीं.

लेकिन नायिका को भी मन ही मन ऐसा जीवन पसंद नहीं. वो भी उड़ान भरना चाहती है. दोस्तों के साथ घूमना-फिरना चाहती है. दुनिया देखना चाहती है. लेकिन माता-पिता ऐसे हैं कि उसके जीवन का सबकुछ जैसे प्रोग्राम कर रखा है.

बहरहाल नायिका इस तथाकथित घुटन भरी ज़िंदगी से विद्रोह कर देती है और सेक्सी पग धारी अपनी दोस्त सहनायिका के साथ मनाली घूमने के लिए निकल पड़ती है. सफर की शुरुआत में ही मुलाक़ात हो जाती है ‘अपनी धुन में रहता हूं मैं तो मेरे जैसा हूं’ का दर्शन जीनेवाले नायक से.

बस फिर क्या प्रेम तो होना ही था. लेकिन कहते हैं ना कि विचार भले बदल जाएं संस्कार आसानी से नहीं बदलते. नायिका मनाली में ट्रेकिंग के दौरान नायक को मन ही मन अपना सब कुछ मान लेती है लेकिन उसके संस्कारों का तथाकथित भारतीयपन उसे बार-बार ये सोचने पर मजबूर करता है कि वो नायक की सोच, उसकी जीवन शैली से अलग है.

प्रेम की कोंपलें फूट चुकी हैं, अब प्रेम बेल बढ़ रही है उसे एक आलंबन चाहिए. तभी ट्रेकिंग के अंजाम पर पहुंचने पर पता चलता है कि आजीवन कक्षा में पिछली बेंच पर बैठने वाला नायक अमरीका की शिकागो यूनिवर्सिटी में पूरा वज़ीफ़ा पाकर पत्रकारिता की पढ़ाई करने जा रहा है. नायिका को वो आलंबन क्या देगा वो तो अब नई उड़ान पर निकल रहा है. पटाक्षेप.

चार्वाक के अनुगामी

मनाली की यात्रा में नायक-नायिका, सह नायक और सहनायिका चार्वाक के दर्शन के अनुरूप यानी ‘यावत जीवेत सुखम जीवेत ऋणम् कृत्वा घृतं पीवेत’ आचरण करते हैं. शराब के दौर चलते रहते हैं, उन्हीं की सोच वाली तमाम सुंदरियों के साथ मज़ा-मस्ती, खेल चुहल, छेड़छाड़ – समझ लीजिए कि स्वच्छंद जीवन की विचारधारा के जितने तथाकथित सकारात्मक आयाम हो सकते हैं उसकी गंगा बह निकलती है.

माता-पिता के दबाव और कथित पारंपरिक भारतीयता का अंश ओढ़े नायिका को छोड़ ट्रेक में शामिल और सफर में मिले सभी लोग भोगवादी संस्कृति में आकंठ डूबे नज़र आ रहे हैं. नायिका बस इनमें खुद को तलाशती और उन जैसा होने के लिए मन को समझाती नज़र आती है.

मनाली में जिस प्रेम कहानी का पटाक्षेप हो गया था और अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने वाला जो कथानायक नायिका को छोड़ और भूल कर आगे निकल गया था वो एक बार फिर सहनायिका की सहनायक से इतर एक अन्य शक्स से शादी में शामिल होने भारत आता है.

लेकिन इस बीच आठ साल गुज़र चुके होते हैं. इन आठ सालों में खुद को नायक से पूरी तरह अलग मानने वाली नायिका अब भी उसके सपने देखती है, उसे भुला नहीं पाती लेकिन धरती के एक-एक कोने को देखने के सपने संजोने वाला और आज की उपभोक्तावादी संस्कृति का अगुवा नायक तो काफी आगे निकल चुका है.

उसके जीवन में प्रेम जैसी चीज़ के क्या मायने हो सकते हैं. उसके लिए तो प्रेम और भोग में ज्यादा का अंतर नहीं.

पुनर्संयोग

खैर, एक बार फिर सहनायिका की शादी के बहाने उदयपुर के रमणीय लोकेशन में नायक-नायिका फिर से मिलते हैं. इस बीच बेटे को अपने सपनों की उड़ान को अर्थ देनेवाला मानते रहे पिता गुज़र जाते हैं, नायक को ये बात कई दिन बाद पता चलती है.

जब जन्म देनेवाले और जीवन में शुरुआती ऐशोआराम के सामान जुटानेवाले पिता के जीने या मरने से नायक को कोई फर्क नहीं पड़ता तो ट्रेक पर मिली नायिका उसे अपने आंसूओं से किस हद तक बांध सकती थी. बहरहाल शादी में मुलाकात हुई तो नायक को खंड-खंड में एहसास होता है वो शायद नायिका को प्यार करता है.

सहनायिका सहनायक से इसलिए शादी नहीं करती क्योंकि वो पैसों की कद्र नहीं करता, शराब में सब कुछ लुटा देनेवाली शख्सियत है. फ्लर्ट मटीरियल तो है लेकिन शादी मटीरियल नहीं. शादी के लिए तो एक सीधा साधा पैसे वाला, बीएमडब्ल्यू चलानेवाला सहनायक चाहिए, जो उसे मिल गया है. सहनायक सहनायिका की शादी को पचा नहीं पा रहा इसलिए शराब में डूब जाता है.

कथित पारंपरिक शादी के इसी ताने-बाने के बीच नायक को ये एहसास होता है कि वो दिल के किसी कोने में नायिका को पसंद करता है. उसके साथ जीवन बिताना चाहता है. थोड़ा बंधना चाहता है. शायद पिता के घर जाकर, अपने लोगों से मिलकर उसके भीतर का यायावर थोड़ा ठहरकर सोचने लगता है.

बदल गया नायक

नायिका का किसी अन्य पुरुष से बातें करना और शराब पीना उसे पसंद नहीं. वो जेलस हो उठता है. नायिका से कह उठता है कि वो उससे प्यार करता है और शादी करना चाहता है. नायिका समझाती है कि शादी का मतलब वो समझता भी है, उसे पता भी है कि शादी निभाना क्या होता है.

अब तक जीवन की अलग तरह की सच्चाई को समझ चुका नायक दिल से नायिका के साथ जुड़ जाना चाहता है. यहीं आकर कहानी वही पुरानी भारतीय प्रेम कहानियों सी हो जाती है जहां नायक कितनी भी पश्चिमी उड़ान भर ले अंत में उसे भारतीय परिभाषा के अनुरुप प्रेम का निर्वाह करना पड़ता है. जहां अलग-अलग सी जीवन शैली और सोच-विचारवाले प्रेमी-प्रेमिका एक हो जाते हैं. कहानी का एक सुखद अंत हो जाता है.

परंपरानुराग क्यों?

लेकिन मेरी समस्या यहीं शुरू होती है. ‘दिल चाहता है’, ‘जिंदगी मिलेगी ना दोबारा’ जैसी फिल्मों में अपने सपनों के हिसाब से सब कुछ पा लेने की जद्दोजहद की जंग दीवानी जवानी के नायक की भी है.

प्रेम के स्वच्छंद रूप को हासिल करने की चाहत ‘लव आजकल’ और ‘रॉकस्टार’ जैसी फिल्मों की तरह ही यहां भी नज़र आती है. नायक को समझ ही नहीं आता कि आकर्षण, सेक्स और प्यार की सीमा कहां है. बस जो अच्छा लगे उसे पा लेने की उद्दाम कामना ही जीवन का उद्देश्य है.

इसके लिए पिता को बार बार ‘सगा बाप’ कहना पड़े तो कोई चिंता नहीं, सौतेली मां को साधारण संवाद में भी ‘आप मेरी सगी मां नहीं हैं’ कहना पड़े तो कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि नायक तो मनमौजी है, सिर्फ मन की सुनता है और मन की ही करता है.

अंत में भारतीय परंपरानुसार उसकी सोच में बदलाव आ जाता है और वो तथाकथित अच्छा बच्चा बन जाता है. कई फिल्मों की एक ही कहानी को घुमा-फिराकर बनाई गई चाशनी के सौ करोड़ के कारोबार वाली पैकिंग का मेरा अनुभव बेहद निराशापूर्ण ही रहा.

सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आज के फिल्म निर्माता आखिर फिल्मों की कहानी कहां की ज़मीन से जुटा रहे हैं जिनका हमारे-आपके जीवन से कहीं कोई मेल ही नहीं. कल्पना के एक अलग लोक में अपनी तरह से कही-बुनी कहानी अतार्किक परिणति तक पहुंच जाती है और हमारे-आपके जैसे दर्शक उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने को बाध्य से हो जाते हैं. आखिर कौन सा जीवन दर्शन समझाना चाहते हैं ये चलचित्र चितेरे.

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