फ़िल्म रिव्यू: दर्शकों को रिझा पाएगी 'रांझणा'?

रांझना

इरोस इंटरनेशनल की फिल्म 'रांझणा' एक प्रेम कहानी है. कुंदन (धनुष) एक दक्षिण भारतीय हिंदू है जो वाराणसी में अपने मां-बाप के साथ रहता है. उसके पिता (विपिन शर्मा) एक मंदिर में पुजारी हैं.

(रजनीकांत से तुलना पर धनुष)

कुंदन, बचपन से ही पड़ोस में ही रहने वाली एक मुस्लिम लड़की ज़ोया (सोनम कपूर) को चाहता है. जब वो स्कूल में होता है तभी अपने प्यार का इज़हार ज़ोया से कर देता है लेकिन ज़ोया उसे गंभीरता से नहीं लेती.

(सोनम को एक हिट की तलाश)

लेकिन एक दिन जब कुंदन अपने प्यार का सबूत देने के लिए अपनी कलाई काट लेता है तो ज़ोया सबके सामने उसे गले लगा लेती है.

Image caption मध्यांतर से पहले फिल्म काफी कसी हुई है और दर्शकों को बांधे रखती है.

इस बात से उसके घर में हंगामा मच जाता है और उसे आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ भेज दिया जाता है जिसके बाद वो कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ जाती है.

यहां उसकी मुलाक़ात एक तेज तर्रार छात्र नेता (अभय देओल) से होती है और वो दोनों एक दूसरे को चाहने लगते हैं. इस बीच बिंदिया (स्वरा भास्कर) बचपन से ही कुंदन को चाहती है और उससे शादी करना चाहती है.

आठ साल बाद ज़ोया अपने घर पहुंचती है. कुंदन एक बार फिर उससे मिलता है. ज़ोया अपने घरवालों को अपने प्यार के बारे में बताती है.

(कैसी है 'फुकरे')

फिर आगे क्या होता है? क्या ज़ोया यानी सोनम कपूर की अपने प्रेमी (अभय देओल) से शादी हो पाती है? कुंदन का क्या होता है? बिंदिया की किस्मत उसे कहां ले जाती है? यही फिल्म की कहानी है.

स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले

हिमांशु शर्मा की कहानी ताज़ा तरीन है और वाराणसी की झलक साफ़ नज़र आती है.

स्क्रीनप्ले में अच्छा खासा हास्य है और भावनाओं को भी बेहतरीन तरीके से व्यक्त किया गया है.

Image caption धनुष और सोनम कपूर ने शादनार अभिनय किया है.

मध्यांतर से पहले तक फिल्म शानदार तरीके से आगे बढ़ती है. कुंदन, ज़ोया, बिंदिया और कुंदन के दोस्त मुरारी (मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब) का चित्रण बेहतरीन तरीके से किया गया है.

हिमांशु शर्मा के लिखे संवाद भी शानदार हैं. सच तो ये है कि इंटरवल से पहले का हिस्सा इतना मनोरंजक है कि पता ही नहीं चलता कि कब इंटरवल हो गया.

('यमला पगला दीवाना' का रिव्यू)

कुंदन और ज़ोया के बीच के कुछ दृश्य अच्छे हैं लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ा झोल खाने लगती है. इसके बाद कहानी में राजनीतिक गतिविधियों पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है. हां, कुंदन के दोस्त मुरारी के दृश्य दर्शकों का मनोरंजन करते हैं.

क्लाइमेक्स

लेकिन एक अच्छी बात ये है कि स्क्रीनप्ले में कई ट्विस्ट हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं.

('ये जवानी है दीवानी' का रिव्यू)

फिल्म का अंत काफी अप्रत्याशित है जो दर्शकों को चौंका देता है. हो सकता है दर्शकों का एक वर्ग हो जो फिल्म के अंत से इत्तेफाक़ ना रखे, लेकिन ये अंत काफी तर्कसंगत है.

कुल मिलाकर फिल्म की कहानी काफी हटकर और दिलचस्प है. कहानी में ड्रामा, सस्पेंस, रोमांस, हास्य, इमोशन सब कुछ हैं.

फिल्म के संवाद इसकी हाइलाइट यानी सबसे प्रमुख बात है. बल्कि ये कहना ग़लत ना होगा कि फिल्म के डायलॉग ही मुख्य हीरो हैं.

अभिनय

धनुष, परंपरागत हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह नहीं दिखते लेकिन उन्होंने जिस सहजता से अपने किरदार को निभाया है वो क़ाबिल-ए-तारीफ है.

(कैसी है 'औरंगज़ेब')

अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म में वो ज़बरदस्त अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए हैं. उन्होंने शानदार स्वाभाविक अभिनय किया है.

सोनम कपूर बहुत ख़ूबसूरत लगी हैं और उन्होंने अपने किरदार को भी उसी ख़ूबसूरती से निभाया है.

अभय देओल ने छात्र नेता जसजीत के किरदार को काफी प्रभावी ढंग से निभाया है. बाकी सभी कलाकार भी बेहतरीन रहे हैं.

निर्देशन

आनंद एल राय का निर्देशन ज़बरदस्त है. उन्होंने बेहतरीन स्क्रिप्ट के साथ पूरा न्याय किया है और किरदारों को बखूबी पारिभाषित किया है. उन्हें इसके लिए पूरे नंबर देने होंगे.

( फिल्म रिव्यू: गो गोआ गॉन)

ए आर रहमान का संगीत कर्णप्रिय है. फिल्म के गाने भले ही सुपर हिट ना हों लेकिन बनारसिया, तुम तक, टाइटल ट्रैक और तू मन शुद्धि गाने गुनगुनाने लायक हैं. फिल्म के गाने धीरे-धीरे और लोकप्रिय होंगे.

इरशाद क़ामिल के बोल बहुत अच्छे हैं. बॉस्को-सीज़र की कोरियोग्राफी ज़बरदस्त है. रहमान का बैकग्राउंड संगीत भी जानदार है.

कुल मिलाकर रांझणा एक दिलचस्प, मनोरंजक और काफी हटकर फिल्म है. और टिकट खिड़की पर अच्छा प्रदर्शन करेगी. इसका नशा शराब की तरह धीरे-धीरे लोगों के सिर चढ़ेगा.

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