टीवी लेखन: कला या मज़दूरी ज़्यादा ?

सपने सुहाने लड़कपन के

जब भारत में सिर्फ एक ही राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन हुआ करता था, तब धारावाहिकों या टीवी कार्यक्रमों का विषय तो दूरदर्शन तय करता था लेकिन उसके बाद लिखना क्या है, यह लेखक ही तय करता था.

फिर 90 का दशक आया जब भारत में डेली सोप की अवधारणा आई और दर्शक काफ़ी उत्साह में थे कि अब उन्हें रोज़ नए-नए एपीसोड देखने को मिलेंगे.

(टीवी के पीछे की 'असलियत')

Image caption 'महाराणा प्रताप' के लेखक अभय तिवारी कहते हैं कि टीवी लेखकों को बेइंतहा मेहनत करनी होती है.

डेली सोप के साथ ‘सोप’ शब्द जुड़े होने पर मनोहर श्याम जोशी अपनी पुस्तक ‘पटकथा’ में लिखते हैं कि “चूंकि अमरीका में जब टीवी धारावाहिक शुरू हुआ तो प्रायोजक साबुन बनाने वाली कंपनियाँ थी, इसलिए व्यंग्य में लोगों ने इसे ‘सोप ओपेरा’ कहना शुरू कर दिया.”

भारत में वही सोप ओपेरा ‘डेली सोप’ बन गया है... लेकिन एक विचार यह भी है कि जैसे साबुन के झाग में अनगिनत बुलबुले होते हैं वैसे ही एक धारावाहिक में भी अनगिनत एपीसोड होते हैं.... इसलिए इन “साबुन के बुलबुलों” को डेली सोप कहा गया है.

बेइंतहा मेहनत

इन “साबुन के बुलबुलों” की रचना में सबसे अधिक योगदान लेखकों का होता है जो दिन रात लगभग 15-16 घंटे रोज़ काम करते हैं.

(धारावाहिकों में 'उम्र की उड़ान')

'महाराणा प्रताप' नामक सीरियल के संवाद लेखक अभय तिवारी कहते हैं, “टीवी में आपको कम समय में अधिक उत्पादन करना होता है. बहुत ज़्यादा. एक डेली सोप का लेखक हर दिन 12-14 घंटे लिखने का आदी हो जाता है. शायद इसीलिए अभय इसको 'गधा मजूरी' भी कहते हैं."

इसी बात को दूसरे शब्दों में 'राम मिलाए जोड़ी'और 'तुम देना साथ मेरा' की लेखिका रजिता शर्मा कहती हैं कि “टीवी की लेखनी में हर एपीसोड के अंत में कहानी को या तो अनसुलझी छोड़ देते है या वहां से नई कहानी शुरू कर देते हैं.”

(फिल्म उद्योग पर मंदी का खतरा)

अभय तिवारी इसे मज़ाक में कहते हैं कि “टीवी की कथा शैली दर्शक को थोड़ा खिलाती है और थोड़ा ललचाती है, कि देखो कल के लिए ये बचा है.”

लेखकों के मुताबिक़ दोनों ही स्थिति में उन्हें कलम तोड़ मेहनत करनी होती है. ताकि दर्शकों की जिज्ञासा हमेशा बनी रहे कि आगे क्या होगा.

जल्दी करने का तनाव

Image caption टीवी लेखकों पर चैनल का ज़बरदस्त दबाव होता है.

‘कॉमेडी सर्कस’ और ‘मास्टर शेफ़’ जैसे नॉन फ़िक्शन शो के लेखक गुंजन जोशी कहते हैं कि “फिल्मों में एक बड़ी सी कहानी को छोटे में कहते हैं वैसे ही टीवी में एक छोटी सी कहानी को बहुत बड़ी बना कर कहते हैं”.

कुल मिला कर यह समझाना भले ही मुश्किल हो लेकिन सच यही है कि डेली सोप बनाने का काम किसी कारख़ाने के काम से कम नहीं है.

इसीलिए नॉन फ़िक्शन लेखक हेमंत खेर ('ड्रामेबाज़' के लेखक) कहते हैं, “टेलीविजन की लेखनी यानी जल्दी सोचो जल्दी समझो और ऐसे लिखो कि हर किसी की समझ में आये.”

इसीलिए आज के दौर में टीवी धारावाहिक बनाना कारख़ाने में कोई उत्पाद तैयार करने के बराबर है.

(सीरियल में अमिताभ)

अब अगर हर रोज़ किसी लेखक को 14 घंटे काम करना हो तो लेखक के लिए तो बहुत मुश्किल होता होगा. इस पर गुंजन कहते हैं “सबसे बड़ी चुनौती यही है कि एक ही बात को बार बार लिखा जाए और आदमी बोर न हो”.

इसलिए गुंजन, टीवी सीरियल को राईटर्स मीडियम या लेखक का माध्यम मानते हैं क्योंकि असली कलात्मकता तो यही है कि आप कहानी को चाहे जितना भी खींच लें दर्शक फिर भी बोर न हो.

जबकि रजिता शर्मा कहती हैं कि “इसे दर्शकों का माध्यम कहना चाहिए क्योंकि हमें दर्शकों से साप्ताहिक फ़ीडबैक टीआरपी के रूप में मिलता है जिसके अनुसार हम लोग तय करते हैं कि कौन सा स्टोरी ट्रैक रखना है और कौन सा हटाना है."

मज़दूरी ?

यानी टीवी लेखन एक 'अथक परिश्रम' से भरा काम है. वो आगे कहती हैं, "टी आर पी होड़ में कई बार कहानी से काफ़ी छेड़ छाड़ भी होती है."

इसीलिए तो अभय तिवारी कहते हैं “टीवी चैनल में बैठे लोग ही सब कुछ तय करते हैं. बाकी सारे लोग मजदूरी करते हैं. निर्माता भी एक ठेकेदार से अधिक कुछ भी नहीं.”

Image caption लोकप्रियता कम होने की दशा में कई बार सीरियल की कहानी से छेड़छाड़ भी की जाती है.

शायद इसीलिए अभय तिवारी टीवी के लेखन को कला कम, क्राफ्ट (शिल्प) ज़्यादा मानते हैं. यानी जिस का उस क्राफ्ट पर अधिकार हो उसके लिए टीवी लेखन बहुत आसान हो जाता है.

जबकि हेमंत खेर कहते हैं, “क्या बेचना है अगर यह न पता हो तो काम बहुत मुश्किल हो जाता है.”

ज़ाहिर सी बात है चैनल और निर्माताओं पर जितना बाज़ार का दबाव है उतना ही लेखकों पर भी है.

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए रजिता कहती हैं, "जो कहानी या प्रसंग आपको अच्छा लग रहा हो वह दर्शकों को भी पसंद आए यह ज़रूरी नहीं है. इसलिए मैंने दर्शको को समझना और उसके अनुसार लिखना सीखा है."

साहित्य लेखन से अलग

डेली सोप बनने की वजह से लेखकों की एक अच्छी खासी फ़ौज टीवी इंडस्ट्री में है, लेकिन टीवी लेखन को साहित्य लेखन से बिलकुल अलग मानना चाहिए. जिसके पास भी टीवी लेखन का क्राफ्ट होगा वह यहाँ लेखक होगा.

इसे अभय इन शब्दों में कहते हैं , “जैसे बढ़ई किताबों की अलमारी बनाने से विद्वान नहीं होता वैसे ही सीरियल लिखने से कोई कलाकार नहीं होता.”

Image caption टीवी ने कई लेखकों को रोज़गार के अवसर भी दिए हैं.

फिल्म और टीवी के लेखन में कोई मौलिक अंतर नहीं है फिर भी अभय के शब्दों में “टीवी की राइटिंग में सूक्ष्मताओं के लिए जगह नहीं होती है”. टीवी लेखन में भावनाओं की अतिरंजना होती है."

टीवी के विपरीत फिल्मों में लिखने के अवसर काफ़ी कम हैं और नए लोगों के लिए संघर्ष बहुत ज़्यादा है.

जबकि डेली सोप की वजह से संघर्ष करते लेखक को अब भूखों नहीं मरना पड़ता है.

बहरहाल टीवी ने नए लिखने वालों को काफ़ी नए नए अवसर प्रदान किए हैं.

हालांकि कुछ लोग लेखकों की बढ़ती भीड़ से काफ़ी चिंतित हैं कि टीवी लेखन की क्वालिटी में निरंतर गिरावट आएगी लेकिन इसके विपरीत रजिता शर्मा बहुत आशावान हैं कि टीवी लेखन पहले से और बेहतर होता जाएगा.

(इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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