बॉलीवुड से आगे सिनेमा और भी...

  • 10 जुलाई 2013
बांधोन
Image caption बांधोन पहली असमिया फ़िल्म है जिसे देश भर में रिलीज़ किया गया है

आजकल अगर आप सिनेमा घर के बाहर हिंदी फ़िल्मों के साथ-साथ तमिल, तेलुगू, पंजाबी या फिर बांग्ला फिल्मों का पोस्टर भी देखते हैं तो ये इस बात का प्रमाण है कि प्रादेशिक फ़िल्मों का दायरा धीरे-धीरे ही सही लेकिन बढ़ रहा है.

हर शुक्रवार हिंदी फ़िल्में भारत के हर शहर में दस्तक देती हैं. लेकिन पिछले कुछ समय में एक बदलाव नज़र आया है. अब प्रादेशिक भाषा में बनने वाली फ़िल्मों की आहट भी जगह-जगह सुनाई देने लगी है.

पिछले हफ्ते की ही बात करें तो जानू बरुआ निर्देशित असमिया फ़िल्म 'बांधोन' देश भर में रिलीज़ की गई. फ़िल्म को सब-टाइटल्स के साथ दिल्ली, मुंबई, बंगलौर और पुणे के सिनेमा घरों में दिखाया जा रहा है.

'बांधोन' एक अच्छी शुरुआत

ग्यारह बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके जानू बरुआ कहते हैं कि हालांकि वो कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं लेकिन विडंबना ये है कि उनकी फ़िल्में लोगों ने देखी ही नहीं हैं.

लेकिन क्यों नहीं देखी किसी ने उनकी फ़िल्में? बीबीसी को इस सवाल का जवाब देते हुए जानू कहते हैं, ''भई लोगों को मेरी फ़िल्में देखने का मौका ही नहीं मिला लेकिन 'बांधोन' के साथ एक अच्छी शुरुआत हुई है. भले ही आज हमारी फ़िल्मों को कम सिनेमा घर मिलें लेकिन कल इनकी संख्या बढ़ेगी. लोग हमारी फ़िल्मों के बारे में भी जानने लगेंगे.''

जानू ने 'मैंने गांधी को नहीं मारा', 'हर पल' और 'मुंबई कटिंग' जैसी हिंदी फ़िल्में बनाई हैं लेकिन बावजूद इसके वो मानते हैं कि हिंदी सिनेमा के मुक़ाबले प्रादेशिक भाषाओं में ज़्यादा अच्छी फ़िल्में बनती हैं.

Image caption फ़िल्म सब-टाइटल्स के साथ दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे में दिखाई जा रही है

जानू कहते हैं, ''अब दर्शक ज़्यादा परिपक्व हो गए हैं. वो अच्छे और बुरे सिनेमा में फ़र्क महसूस कर सकते हैं.''

हर तरह के सिनेमा की मांग

प्रादेशिक फ़िल्मों को देश भर में रिलीज़ करने का ज़िम्मा उठाया है पीवीआर ने.

अपनी इस मुहिम के बारे में पीवीआर के शिलादित्य बोरा कहते हैं, ''आज की तारीख़ में भारत में हर तरह के सिनेमा के लिए दर्शक मौजूद हैं. पहले प्रादेशिक या विदेशी फ़िल्में देखने का मौका किसी फ़िल्म महोत्सव के दौरान ही मिला करता था जो साल में एक बार होता था. हमने सोचा कि क्यों न अपने दर्शकों को हर हफ्ते ये मौका दिया जाए.''

प्रादेशिक सिनेमा को मिल रहे इस महत्व से सिर्फ जानू बरुआ ही नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय, मराठी और पंजाबी फ़िल्मकार भी खुश हैं.

Image caption पहले साल मे 15 मराठी फ़िल्में बनती थीं अब 100 फ़िल्में बनती हैं

'बांधोन' के साथ-साथ 5 जुलाई को रिलीज़ हुई तमिल फ़िल्म 'सिंघम 2' ने तो रिलीज़ के साथ ही रिकॉर्ड कमाई भी कर ली. भारत समेत दुनिया भर के 2400 सिनेमाघरों में ये फ़िल्म तमिल और तेलुगु भाषा में रिलीज़ की गई. अब इस हफ्ते ये फ़िल्म हिंदी में डब करके रिलीज़ की जा रही है.

बराबरी के सिनेमाघर

इससे पहले 28 जून को पंजाबी फ़िल्म 'जट और जूलिएट' भी हिंदी फ़िल्म 'घनचक्कर' के साथ रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म की अगर बात करें तो इसे भी उतने ही सिनेमाघरों में दिखाया गया जितने सिनेमाघरों में 'घनचक्कर' दिखाई गई. इस बात से पता चलता है कि पंजाबी फ़िल्में दर्शकों के बीच कितनी लोकप्रिय हैं.

'जट और जूलिएट' के निर्देशक अनुराग सिंह बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, ''पिछले तीन-चार सालों में पंजाबी सिनेमा में एक नया उछाल आया है. अब तो फ़िल्म निर्माता मुफ़्त में भी फ़िल्म के प्रिंट दे देते हैं ताकि पंजाबी फ़िल्मों को बढ़ावा मिले.''

Image caption सिघंम 2 ने पहले ही हफ्ते में रिकॉर्ड कमाई की

भारत के साथ-साथ इस फ़िल्म को जर्मनी और इटली में भी रिलीज़ किया गया.

मराठी फ़िल्मों ने भी पिछले दस सालों में कई बदलाव देखे हैं. सुपरहिट मराठी फ़िल्म 'अनुमति' के निर्देशक गजेन्द्र अहिरे ने बीबीसी को बताया कि जहाँ कुछ समय पहले तक साल में सिर्फ़ 14 या 15 मराठी फ़िल्में बना करती थी वहीं अब इनकी संख्या बढ़ कर 100 हो गई है.

अहिरे कहते हैं कि इन फ़िल्मों को हिंदी फ़िल्मों के साथ सिनेमा घरों में दिखाया जाता है और जनता इन फिल्मों को पसंद भी करती है.

वैसे भी जहाँ तक फ़िल्मों का सवाल है जनता फ़िल्में सिर्फ एंटरटेन (मनोरंजन) होने के लिए देखती है. एंटरटेनमेंट फिर उन्हें हिंदी फ़िल्मों से मिले या फिर प्रादेशिक फ़िल्मों से उनके लिए बात बराबर ही है.

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