फिल्म रिव्यू: बजाते रहो

  • 26 जुलाई 2013
बजाते रहो

इरोस इंटरनेशनल और एमएसएम मोशन पिक्चर्स की 'बजाते रहो' एक कॉमेडी थ्रिलर है. मम्मी जी (डॉली अहलूवालिया) के सामने चुनौती है अपने परिवार के सम्मान और जायदाद को बचाने की.

(कैसी है 'डी-डे')

उन्हें कोर्ट में अपनी प्रॉपर्टी कुर्क होने से बचाने के लिए बहुत ही कम समय में 15 करोड़ रुपए जमा कराने हैं.

सभरवाल (रवि किशन) एक बैंक का मालिक है, जिसके लिए मम्मी जी के पति बावेजा (योगेंद्र टिक्कू) काम करते हैं.

सभरवाल लोगों को बहुत ज़्यादा ब्याज का लालच देकर उनके पैसे अपने बैंक में जमा कर लेता है. सिगनेटरी के तौर पर बावेजा के साइन होते हैं इसलिए सभरवाल लोगों का सारा पैसा हड़पकर सारा दोष बावेजा पर डाल देता है.

Image caption डॉली अहलूवालिया का अभिनय ठीक-ठाक है लेकिन फिल्म में उनका रोल दमदार नहीं है.

बावेजा को धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है और उनकी इस सदमे से मौत हो जाती है.

सायरा (विदुशी मेहरा) सभरवाल की उस बैंक में जूनियर होती हैं और उन्हें भी इस धोखाधड़ी के आरोप में हिरासत में ले लिया जाता है.

अब उसकी रिहाई तभी संभव है जब मम्मी जी 15 करोड़ रुपए बैंक में जमा कर देंगी.

मम्मी जी, उनका बेटा सुखी (तुषार कपूर), सायरा का पति मिंटू (विनय पाठक) और सुखी का दोस्त बल्लू (रणवीर शौरी) पैसा इकट्ठा करने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं.

क्या उन्हें इस प्रयास में कामयाबी मिल पाती है ? क्या वो सभरवाल से लोगों को पैसा दिलाने में कामयाब हो पाते हैं, क्या सभरवाल को उसके किए का फल मिलता है? क्या सायरा और बावेजा को बेदाग करार दिया जाएगा? यही फिल्म की कहानी है.

स्क्रीनप्ले

Image caption तुषार कपूर, विनय पाठक और रणवीर शौरी का अभिनय अच्छा है लेकिन फिल्म में उनका इस्तेमाल बिलकुल अच्छे से नहीं किया गया है.

ज़फ़र ए ख़ान की कहानी में बिलकुल भी मौलिकता नहीं है. फिल्म का स्क्रीनप्ले भी बेहद साधारण है और उसमें ना तो कॉमेडी है ना ही कोई थ्रिल है.

फिल्म की गति भी धीमी है. ईमानदारी से कहा जाए तो स्क्रीनप्ले टेलीविज़न सीरियल की तरह लिखा गया है.

लोगों को एहसास ही नहीं होता कि वे फिल्म देख रहे हैं.

अभिनय

डॉली अहलूवालिया का रोल बहुत दमदार नहीं है. उन्होंने ठीक-ठाक अभिनय ही किया है लेकिन हाँ, फ़िल्म के आख़िरी हिस्से में वह प्रभावित करती हैं.

तुषार कपूर ने अच्छा अभिनय किया है. विनय पाठक जैसे कलाकार का फ़िल्म में इस्तेमाल बिलकुल ठीक तरीके से नहीं किया गया है.

रणवीर शौरी फिल्म में ठीक रहे हैं लेकिन उनका रोल भी दमदार नहीं है.

निर्देशन

सुशांत ए शाह का निर्देशन ठीक है लेकिन कहानी कहने का ढंग दर्शकों को फिल्म से जोड़ नहीं पाता.

फिल्म का संगीत भी साधारण है.

कुल मिलाकर 'बजाते रहो' में मनोरंजन का पुट बिलकुल नहीं है. कॉमेडी थ्रिलर जॉनर किस्म की इस फिल्म में ना तो कॉमेडी है ना ही थ्रिल.

बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म के चलने के चांस बहुत कम हैं.

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