मुसलमान नायक कैसे बन गया 'खलनायक'

क़बूल है
Image caption टीवी पर आना वाला धारावाहिक 'क़बूल है' मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित है.

'मुस्कुराती सुबह की और गुनगुनाती शाम की, यह कहानी गुल की है गुलशन की है गुलफ़ाम की...'

इस टाइटिल गीत के शुरू होते ही लोग अपना अपना काम निपटा कर टीवी के सामने बैठ जाया करते थे. संतूर की लय और ताल पर झीलों में कश्मीरी शिकारों के नर्तन में एक अद्भुत दृश्य आनंद था. इसके माध्यम से पहाड़ी शीतलता पूरे मुल्क में प्रसारित हो रही थी.

ये आज से 22 साल पहले 1991 की बात है. दूरदर्शन पर आने वाले कई लोकप्रिय धारावाहिकों में से एक था 'गुल गुलशन गुलफ़ाम'. वेद राही के निर्देशन में बने इस सीरियल की कहानी एक ख़ुशहाल मुस्लिम परिवार की थी. जिसमें हमें संभवतः पहली बार कश्मीर में 'आतंकवादी' गतिविधि की आहट सुनाई दी.

मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्में सफल

फ़िल्मों में मुस्लिम पृष्ठभूमि की कहानी न तो कोई नई बात थी न ही अनूठी. ‘पाकीज़ा’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘मेरे हुज़ूर’, ‘निकाह’, ‘शमा’ जैसी फ़िल्में लोकप्रिय भी रहीं और बॉक्स ऑफ़िस पर हिट भी. मुख्य धारा की दूसरी फ़िल्मों में भी मुस्लिम किरदार न केवल अहम भूमिका में रहते थे बल्कि पॉज़िटिव रोल में भी रहते थे.

Image caption फ़िल्म 'उमराव जान' में मुस्लिम संस्कृति की झलक देखने को मिली

मनमोहन देसाई की फ़िल्म तो बिना मुस्लिम किरदार के पूरी भी नहीं होती थी. ‘अमर अकबर एंथनी’ में एक तरफ़ अगर तीन में से एक किरदार मुस्लिम था तो दूसरी तरफ़ ‘क़ुली’ का मुख्य नायक ही मुसलमान था. इस फ़िल्म की सफलता किसी से छिपी नहीं है.

पटकथा लेखक और निर्देशक अभय तिवारी कहते हैं, “80 के दशक तक मुस्लिम सोशल बनती रही हैं. ‘मर्द’ जैसी फ़िल्मों में भी मुस्लिम समाज दिखाई पड़ता है. उस समय तक हिन्दी फ़िल्मों का मुख्य दर्शक निम्न मध्यम वर्ग से आता था जिनमें मुस्लिम दर्शकों की तादाद बड़ी मात्रा में थी.”

लेकिन 80 के ही दशक तक मुस्लिम सोशल क्यों बने? उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि फ़िल्म इंडस्ट्री ने ऐसे विषयों को छूना ही बंद कर दिया? अभय कहते हैं, “90 के दशक में हमारे समाज में कुछ बड़े बदलाव आए. तीन बदलाव ऐसे थे जिन्होंने मुस्लिम सोशल को ग़ैरमौज़ूं बना दिया. एक तो सैटेलाइट टीवी आया दूसरा हमारी फ़िल्मों के लिए ओवरसीज़ का बाज़ार खुल गया. तीसरा बाबरी मस्जिद ढहाई गई.”

बदला नज़रिया

Image caption बॉम्बे एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें हिंदू-मुस्लिम ताना बाना देखने को मिलता है.

नब्बे का ही वह दशक था, जब हालिया इतिहास में सांप्रदायिक राजनीति शुरू हुई और मुस्लिमों के प्रति नज़रिए में बदलाव देखा गया. इसका सीधा असर फ़िल्मों और धारावाहिकों पर पड़ा. इसके बाद मुस्लिम पृष्ठभूमि की कहानी तो दूर मुस्लिम चरित्रों का रोल भी बदल गया. मुख्यधारा का सिनेमा मुस्लिम खलनायक पेश करने लगा और समानान्तर धारा का सिनेमा मुस्लिम चरित्रों को दयनीय बनाकर पेश करने लगा.

‘सारी दुनिया का बोझ उठाने वाला (क़ुली 1983) इक़बाल’, दोस्ती के लिए जान न्यौछावर करने वाले ‘अकबर’ (अमर अकबर एंथनी) का किरदार एक 'आतंकवादी' का किरदार बन गया. अगर कभी 'आतंकवादी' किरदार नहीं भी बना तो उसका विषय आतंकवाद के आस-पास ही मंडराता रहा किसी भूत की तरह, जैसे ‘आमिर’ (2008).

Image caption फ़िजा में एक मुस्लिम युवक का विरोधाभास सामने आया

इसकी व्याख्या अभय इन शब्दों में करते हैं, “बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हिंदू-मुसलमानों के बीच एक ऐसा तनाव पैदा हुआ कि बिना किसी इरादे के मुस्लिम चरित्र फ़िल्मों के सामाजिक ताने-बाने के बाहर हो गए और जब वापस आए तो आतंकवादी के रूप में.”

हालाकिं इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि अमरीका में हुए 911 हमलों के बाद हॉलीवुड की फ़िल्मों में मुसलमानों को एक ख़ास तरह से पेश किया जाने लगा.

वैश्वीकरण और उदारीकरण के इस दौर में भारतीय फ़िल्में हॉलीवुड का नक़ल करने लगीं और बॉलीवुड की फ़िल्मों में भी मुसलमानों को 'आतंकवाद' से जोड़कर दिखाया जाने लगा या कम से कम मुस्लिम किरदार को चरमपंथी के रूप में पेश किया जाने लगा.

इसीलिए ‘ए वेडनेस डे’ एक ‘फ़ाइनल सॉल्यूशन’ लेकर आता है दर्शकों के समक्ष.

अस्सी के दशक तक हिंदी सिनेमा का बाज़ार केवल भारत था इसलिए देश की कहानी कहने वाली फ़िल्म इंडस्ट्री ने न सिर्फ़ मुस्लिम सोशल बनाए बल्कि ईसाई पृष्ठभूमि पर भी फ़िल्में बनी. ‘बातों बातों में’ (1979), ‘सागर’ (1985), ‘अलबर्ट पिंटो को ग़ुस्सा क्यों आता है' (1980), ‘जोश’ (2000) आदि ऐसी ही फ़िल्में हैं.

खुली ओवरसीज़ मार्केट

लेकिन उदारीकरण की लहर ने जब फ़िल्मों का ओवरसीज़ मार्केट खोला तो हिन्दी फ़िल्मों की टार्गेट ऑडियंस निम्न मध्यम वर्ग से बदल कर उच्च मध्यम वर्ग और प्रवासी भारतीय हो गए. ऐसा लगने लगा कि इन्हें देश की कहानी नहीं चाहिए. इन्हें ऐसी कहानी चाहिए थी जिसके नायक की कोई सांस्कृतिक पृष्ठभूमि न हो, वे केवल अमीर हो. वे भारत की कहानी कहने वाली फ़िल्मों को या तो पिछड़ा मानने लगे या देश को बदनाम करने वाली फ़िल्म कहने लगे.

Image caption लगता है एनआरआई दर्शकों को 'स्टूडेंट ऑफ़ दी इयर' जैसी हल्की फुल्की फ़िल्में ही भाती हैं.

सैटेलाईट टीवी की वजह से निम्न मध्यम वर्ग ने सिनेमा हॉल में आना बंद कर दिया, यह भी एक बड़ा कारण रहा है मुस्लिम सोशल के नहीं बनने का. लेकिन टीवी पर भी ऐसा नहीं है कि मुस्लिम सोशल की तादाद बहुत है. बल्कि नगण्य है. दूरदर्शन पर ‘गुल गुलशन गुलफ़ाम’ (1991), सोनी पर ‘हिना’ (1998 से 2003) और ज़ी टीवी पर आजकल ‘क़ुबूल है’ चल रहा है.

इसके बाद ऐसा कोई सीरियल तो याद नहीं आता जो लोकप्रिय भी हो. पिछले साल स्टार प्लस पर बहुत कम दिनों के लिए ‘सजदा तेरे प्यार में’ प्रसारित हुआ लेकिन टीआरपी की जंग में वह हार गया और उसे बंद करना पड़ गया.

‘क़ुबूल है’ के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि जिन वजहों से ‘मुस्लिम सोशल’ को पहचाना जाता है, वह तहज़ीब अब हालांकि पृष्ठभूमि में है लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अब मुस्लिम पृष्ठभूमि की कहानी भी किसी मुख्य धारा के सीरियल की कहानी जैसी ही है. यानी सामान्य पात्रों की तरह, वे न तो आतंकवादी हैं और न ही दया के पात्र.

‘क़ुबूल है’ की निर्माता-निर्देशक गुल खान बताती हैं, “मुझे बहुत पहले से ख्वाहिश थी कि मुस्लिम कल्चर को नेशनल प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाऊं. कई बरसों से इस कांसेप्ट को लेकर कई चैनलों में गई लेकिन ज़ी टीवी ने मौक़ा दिया. मुस्लिम सोसायटी को लेकर जो आम धारणा है वह बहुत इकहरा है. जबकि मैं यह दिखाना चाहती थी कि हर कम्युनिटी में हर तरह के लोग होते हैं.''

बात को पूरा करते हुए वो कहती है, ''मैं यह भी बताना चाहती थी कि मुस्लिम कम्युनिटी किसी भी दूसरी कम्युनिटी की तरह ही है. इसलिए वह जिसे हम ‘मुस्लिम कल्चर’ के नाम से जानते हैं वह हमेशा बैकग्राउंड में होता है, जैसे हर सीरियल की कहानी में होता है.”

इस सिलसिले में हम फ़िल्म ‘इक़बाल’ (2006) को भी नहीं भूल सकते. नागेश कुकनूर ने एक ऐसे मुस्लिम परिवार की कहानी बनाई है जिसका मुद्दा किसी भी सामान्य भारतीय का मुद्दा होता है, वह है क्रिकेट.

देश और संस्कृति की कहानी कहने वाले ऐसे फ़िल्म मेकर और सीरियल मेकर बधाई के पात्र हैं और उम्मीद जगाते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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