मेघा श्रीरामः नगपुरिया लोकगीतों को लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ

मेघा श्रीराम डॉल्टन
Image caption बीबीसी स्टूडियो में मेघा श्रीराम डाल्टन.

झारखंड की लोकगायिका मेघा श्रीराम डॉल्टन अनुराग कश्यप निर्मित 'दैट गर्ल इन यलो बूट' और मनीष झा की 'अनवर' जैसी फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेर चुकी हैं.

मेघा ने कोक स्टूडियो के भारतीय संस्करण में भी झारखंडी लोकगीतों का समां बांधा था. पेश है मेघा श्रीराम से रंगनाथ सिंह की बातचीत.

आपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएँ.

मैं अपने बारे में यही बताना चाहूँगी मैं आज जो भी हूँ उसका श्रेय मेरे माता-पिता को जाता है.

मुझे लगता है कि मेरी माँ अपने जीवन में गायिका बनना चाहती होंगी. वो अपनी इच्छा नहीं पूरा कर पाईं तो उन्होंने हम बहनों के माध्यम से अपनी भड़ास निकाली.

आपके नाम में लगे डॉल्टन का क्या अर्थ है.

मेरा जन्मस्थान झारखण्ड का डाल्टनगंज है इसलिए बस प्रेमवश मैंने अपना नाम मेघा श्रीराम डॉल्टन रखा.

आपने संगीत की शिक्षा कहाँ से ली.

बच्चों में जो शुरुआती बीज डाला जाता है उसका श्रेय मेरी माँ को ही जाता है. उसके बाद मैंने संगीत की शिक्षा डॉल्टनगंज में रहने वाले उस्ताद अमजद अली जी से ली है.

लोक संगीत को क्यों चुना.

मैंने इंडियन क्लासिकल सीखा था. बचपन में हमारे यहाँ उस्ताद आते थे और वो हमें क्लासिकल संगीत सिखाते थे.

लेकिन मैंने लोक संगीत को हमेशा ही अपने करीब पाया है. इसका भी कारण मेरी माँ है.

मैं शास्त्रीय संगीत सुनती थी तो वो मुझे बहुत टेक्निकल लगता था. लोक संगीत को मैं दिल से गाती थी, और गाना तो दिल की चीज है.

मेघा श्रीराम का पूरा इंटरव्यू और उनकी आवाज में झारखंड के लोकगीतों को सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए.

लोक संगीत खासकर झारखंड के लोक संगीत के बारे में आप की टिप्पणी चाहेंगे.

इसे अभी तक एक्सपोजर ही नहीं मिला है. भोजपुरी ने पूरी दुनिया में जगह बनाई है.

मगही ने भी थोड़ी जगह बनाई है लेकिन नगपुरिया लोकगीत तो ना के बराबर है.

मेरी कोशिश है कि मैं इस पर फोकस हो कर इसे इकठ्ठा करूँ और सभी तक पहुँचाऊँ.

आप शादी-शुदा हैं. आपके बच्चे भी हैं. शादी-शुदा जीवन और प्रोफेशनल करियर के बीच कैसे तालमेल बिठाती हैं.

कई बार लगता है कि स्वतंत्र जीवन अच्छा होता है लेकिन घर-परिवार और बच्चों के साथ इतना सब करने के बाद जो खुशी मिलती है उसका वर्णन करना मुश्किल है.

आपके पसंदीदा लोकगायक कौन हैं

झारखंड के राम दयाल मुंडा, मधु मंसूरी, मुकुंद नायक हैं. आसाम के खोगेन दा हैं. भोजपुरी की शारदा जी भी हैं.

बंगाल के नचिकेता और बाउल गीतों पर काम रहे सौरभ मुनि हैं और भी बहुत से लोग हैं.

कोक स्टूडियो तक कैसी पहुँची

मुझे इसके लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी. मैंने वहाँ जाने से दो-तीन महीने पहले ही जाना कि कोक स्टूडियो क्या है.

डायरेक्टर ने मुझे गुलाब बाई पर आधारित एक नौटंकी पर आधारित नाटक 'अफसाने बाई से बायस्कोप तक' में सुना था.

मुझे लगता है कि वही सुनकर मुझे गाने के लिए एप्रोच किया गया था.

संगीत के क्षेत्र में आपकी योजना क्या है.

मैं नगपुरिया मूल धुनों पर काम करना चाहती हूँ.

लोक संगीत को इकट्ठा करके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ.

हमने सुना है कि आप कजरी पर भी कुछ काम करना चाहती हैं.

कजरी अपने आप में बहुत ही समृद्ध धुन है. आमतौर पर कजरी की दो-चार धुनें ही लोकप्रिय हैं.

जबकि इसकी सौ से ज्यादा धुनें हैं. मैं चाहती हूँ कि इन सभी धुनों की नोटेशन तैयार करूँ. उन्हें सीखूँ.

मेघा श्रीराम डॉल्टन के इंटरव्यू का एक अंश का वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए.

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