मद्रास कैफ़े, कामसूत्र, फ़ायर...एक विरोधकथा

मद्रास कैफ़े फिल्म का खासा विरोध हो रहा है

शूजित सरकार की फ़िल्म ‘मद्रास कैफ़े’ में तमिल आंदोलन के प्रस्तुतिकरण को लेकर तमिलनाडु और उत्तराखंड में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. कमल हासन की फ़िल्म ‘विश्वरूपम’ पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने विरोध जताया था और फ़िल्म के बहिष्कार की धमकी दी थी.

विरोध किसी भी मुद्दे पर हो सकता है. चाहे सवाल संवेदनशीलता को ठेस पहुंचाने का हो, चाहे ‘वेकअप सिड’ में मुंबई को बॉम्बे कहने जैसी मामूली बात, जिसे लेकर करण जौहर को माफ़ी मांगनी पड़ी थी.

जब उनकी फ़िल्म ‘माय नेम इज़ ख़ान’ के नायक शाहरुख़ ख़ान ने आईपीएल मैचों में पाकिस्तानी क्रिकेटरों की तरफ़दारी की तो फ़िल्म को शिवसेना के विरोध का सामना करना पड़ा था.

यह भी संदेह है कि कुछ फ़िल्मकार ऐसे विरोध का इस्तेमाल अपनी फ़िल्मों के प्रमोशन के लिए करते हैं. ज़रूरी नहीं कि यह हमेशा सच हो लेकिन तथ्य यह है कि हममें धीरे-धीरे कला, किताबों, नाटकों को लेकर असहनशीलता बढ़ रही है और स्वनियुक्त सेंसर के ज़रिए 15 मिनट की प्रसिद्धि पाने की कोशिशें बढ़ रही हैं.

फ़िल्मों को लेकर ऐसे विरोध का अब एक लंबा इतिहास बन चुका है.

'नैतिकता पर आघात'

पूर्व दस्यु फूलन देवी पर निर्देशक शेखर कपूर की अपनी फ़िल्म को कई मोर्चों पर विरोध का सामना करना पड़ा-नग्न सीन, ठाकुर समुदाय का प्रस्तुतिकरण और इसके बाद फूलन की तरफ़ से अरुंधति रॉय का आना और उनके सम्मान का मुद्दा.

जब मीरा नायर की ‘कामसूत्र’ आई तो ‘नग्नता’ को लेकर नए किस्म का विरोध हुआ और कहा गया कि इसने जनमानस की नैतिकता पर आघात किया है!

Image caption शूजित सरकार की ‘मद्रास कैफ़े’ में तमिल आंदोलन के प्रस्तुतिकरण को लेकर नाराजगी है

मेरे अंगने में (लावारिस), तंबू में बंबू (मर्द), सात सहेलियां (विधाता), चोली के पीछे क्या है (खलनायक), सेक्सी-सेक्सी मुझे लोग बोलें (खुद्दार), सरकाय लो खटिया (राजा बाबू), मैं मालगाड़ी तू धक्का लगा (अंदाज़), इन सभी गानों को लेकर खुलेआम अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे. इनमें से ‘सेक्सी-सेक्सी मुझे..’ के शब्द बदलकर बाद में ‘बेबी-बेबी’ किए गए.

अदालत के आदेश पर राज सिप्पी की फ़िल्म ‘कुदरत’ के गाने ‘बहन दी टक्की’ के शब्द बदलकर ‘चिड़ी दी दुग्गी’ किए गए. फ़िल्म ‘आजा नच ले’ के एक गाने को लेकर मोची समुदाय के लिए अपमानजनक होने का आरोप लगा. ‘भूलभुलैया’ के गीत 'हरे राम हरे कृष्ण' के ख़िलाफ़ भी मामूली विरोध हुआ.

फ़ायर/गर्लफ्रैंड

जब समलैंगिक संबंधों को लेकर दीपा मेहता की फ़िल्म ‘फ़ायर’ रिलीज़ हुई तो इसका प्रदर्शन करने वाले थियेटरों पर हमले हुए, पोस्टरों पर कालिख पोती गई और राजनीतिक और महिला संगठनों ने भारतीय संस्कृति की दुहाई दीं.

बाद में जब इसी विषय पर ‘गर्लफ्रैंड’ आई तो विरोध इतना मुखर नहीं था. जब मेहता वाराणसी में ‘वाटर’ की शूटिंग कर रही थीं तो हिंदू संगठनों ने उसमें बाधा डाली और उन्हें मजबूरन फ़िल्म को श्रीलंका में शूट करना पड़ा.

हालांकि फ़िल्म की रिलीज़ पर कोई हंगामा नहीं हुआ. ताज्जुब ये कि ‘कल हो न हो’ के कांताबेन को छोड़कर पुरुष समलैंगिकों को लेकर किसी ने विरोध नहीं किया.

धार्मिक भावनाओं पर चोट

फ़िल्म ‘मुस्तफ़ा’ का टाइटिल बदलकर ‘ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा’ किया गया क्योंकि कुछ मुस्लिम संगठनों की आपत्ति थी कि एक गुंडे को धार्मिक नेता का नाम दिया गया है. 'मीनाक्षी' के लिए लिखे एमएफ़ हुसैन के गाने ‘नूरुन-अला-नूर’ पर उलेमाओं ने आरोप लगाया कि इसमें धर्मग्रंथ से शब्द लिए गए थे.

Image caption शाहरुख अभिनीत 'माय नेम इज़ ख़ान' को शिवसेना का विरोध झेलना पड़ा था

‘ग़दर’ को लेकर आरोप यह था कि यह कथित तौर पर मुस्लिम विरोधी थी. ‘जो बोले सो निहाल’ के ख़िलाफ़ सिख नेता अदालत चले गए जिसमें धार्मिक नारे का इस्तेमाल किया गया था. ‘कुछ-कुछ होता है’ में सिख लड़के को लेकर, फिर ‘सिंह इज़ किंग’ और ‘दिल बोले हडिप्पा’ में सिखों के प्रस्तुतिकरण को लेकर आपत्तियां उठीं.

कैथलिकों ने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में चर्च के सीन पर आपत्ति उठाई और आरोप लगाया कि चर्च का प्रयोग गंदे ढंग से करते हुए दिखाया गया था. इससे पहले फ़िल्म ‘जूली’ को लेकर एंग्लो-इंडियन समुदाय ने आरोप लगाया था कि एक बिन ब्याही मां की थीम उनके समुदाय के लिए अपमानजनक थी.

‘लज्जा’ को लेकर कुछ हिंदू संगठनों ने सवाल उठाया और कहा कि इसमें सीता का अपमान किया गया था और कई नायिकाओं के नाम देवियों के नामों पर रखे गए थे. फिलहाल विपुल शाह की ‘लंडन ड्रीम्स’ एक गाने में हनुमान चालीसा के इस्तेमाल की वजह से विवादों में है.

..और राजनीति

जब अमिताभ बच्चन बोफ़ोर्स मामले में फंसे, तभी उनकी फ़िल्म ‘शहंशाह’ रिलीज़ हुई थी. प्रदर्शनकारियों ने उनके घर पर धरना दिया था.

आमिर ख़ान की ‘फ़ना’ को गुजरात में रिलीज़ नहीं होने दिया गया क्योंकि उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन का समर्थन किया था.

राहुल ढोलकिया की ‘परज़ानिया’ को भी गुजरात में रिलीज़ करने की इजाज़त नहीं मिली. आरोप था कि फ़िल्म में मुस्लिमों का नरसंहार पूर्वनियोजित दिखाया गया था.

हृतिक रोशन को नेपालियों के ख़िलाफ़ टिप्पणी के आरोप में लगभग प्रतिबंध का सामना करना पड़ा था. माधुरी दीक्षित ने भी नेपाल को कभी भारत का हिस्सा बताकर मुसीबत मोल ले ली थी. इसके बाद उन्हें कई बार माफ़ी मांगनी पड़ी, तब जाकर मामला शांत हुआ.

अभिनेत्री खुशबू को शादी से पूर्व सेक्स को लेकर दिए बयान के कारण जनता और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा था.

Image caption ‘ओम शांति ओम’ को लेकर मनोज कुमार ने नाराज़गी जताई थी

गांधीवादियों ने ‘गांधी माय फ़ादर’ पर गहरी आपत्ति की, लेकिन जब उसमें गांधी के खिलाफ़ कुछ नहीं मिला तो विरोध थम गया.

कहा जाता है कि मणिरत्नम की ‘बॉम्बे’ और रामगोपाल वर्मा की ‘सरकार’ को रिलीज़ से पहले शिवसेना नेता बालासाहेब ठाकरे को दिखाया गया था और उनकी हामी ली गई थी ताकि फ़िल्मों को बाद में मुश्किलों का सामना न करना पड़े. अभी भी हिंदू लड़के के मुस्लिम लड़की से प्रेम के प्रस्तुतिकरण पर विरोध के स्वर उठते रहते हैं.

सालों पहले शिवसेना ने दिलीप कुमार के घर के सामने प्रदर्शन किया था क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान का नागरिक सम्मान क़ुबूल किया था.

अजीबोग़रीब विरोध

जब ‘ओम शांति ओम’ में मनोज कुमार के हमशक्ल को दिखाया गया तो मनोज कुमार इससे बेहद नाराज़ हो गए थे.

जब एक दर्शक ने ‘मोहब्बतें’ में अमिताभ बच्चन पर जूते पहनकर गायत्री मंत्र बोलने और हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया तो अमिताभ बच्चन को सफ़ाई देनी पड़ी और माफ़ी मांगनी पड़ी थी. ‘निशब्द’ में भी उन्हें बूढ़े होकर एक नौजवान लड़की से प्रेम करने पर विरोध झेलना पड़ा.

हिमेश रेशमिया को बुरक़ा पहनकर और कटरीना कैफ़ को स्कर्ट पहनकर अजमेर दरगाह जाने पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. दोनों ‘सिंह इज़ किंग’ की शूटिंग के दौरान दरगाह पर गए थे.

Image caption करन जौहर को मुंबई की जगह बॉम्बे शब्द के लिए माफी मांगनी पड़ी

‘रंग दे बसंती’ की रिलीज़ में देरी हुई क्योंकि घोड़े के साथ शूटिंग से पहले मेनका गांधी और 'एनीमल वेल्फ़ेयर बोर्ड' की इजाज़त नहीं ली गई थी.

‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ में सेक्स सीन के लिए मनीषा कोइराला का बॉडी डबल इस्तेमाल करने से वह नाराज़ हो गईं.

बाल ठाकरे से उनकी शिकायत का नतीजा यह हुआ कि शिवसैनिकों ने फ़िल्म की स्क्रीनिंग करने वाले थियेटरों पर हमला बोल दिया.

'प्रदर्शनों की वैधता'

प्रकाश झा की ‘अपहरण’ को लेकर बिहार में समस्याएं पैदा हुईं क्योंकि इसमें एक विलेन का नाम साधु यादव था जो राबड़ी देवी के भाई का भी नाम है.

इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि विरोध प्रदर्शनों का खेल लगातार विद्रूप होता जा रहा है. जैसे ही एक फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से सर्टिफ़िकेट मिलता है, इन विरोध प्रदर्शनों की वैधता नहीं रह जाती.

कुछ राजनीतिक नेता फ़िल्म की लोकप्रियता के ज़रिए फ़ायदा उठाना चाहते हैं. मगर आमतौर पर फ़िल्म की रिलीज़ के साथ ही यह विरोध ठंडा पड़ जाता है. मिसाल के लिए ‘माय नेम इज़ ख़ान’ को पुलिस के संरक्षण के साथ सिनेमाघरों में रिलीज़ किया गया और जब प्रदर्शनकारियों को मीडिया में जगह मिल गई तो उनकी विरोध में रुचि ही खत्म हो गई.

कुछ मामलों में इस विरोध से फ़िल्म को वास्तव में फ़ायदा मिल सकता है पर एक फ़िल्म पर अगर बड़े इलाक़े में जारी करने पर रोक लगती है तो इसका नुकसान निर्माता और वितरक को होता है. कमल हासन को कहना पड़ा था कि अगर ‘विश्वरूपम’ की रिलीज़ पर रोक लगी तो वो दीवालिया हो जाएंगे.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार