फ़िल्म रिव्यू: शुद्ध देसी रोमांस

  • 6 सितंबर 2013
शुद्ध देसी रोमांस

रेटिंग: ***

बिज़नेस रेटिंग: ***1/2

यशऱाज बैनर की 'शुद्ध देसी रोमांस' आधुनिक भारत के उन युवाओं की कहानी है जो किसी भी तरह के 'कमिटमेंट' से डरते हैं.

रघुराम उर्फ़ रघु (सुशांत सिंह राजपूत) जयपुर में एक टूरिस्ट गाइड है. बारातों में केटरिंग की भूमिका निभाने वाले गोयल (ऋषि कपूर) से उसकी मित्रता है.

उसकी शादी तारा (वाणी कपूर) से तय होती है. वो बारात लेकर वाणी के शहर की ओर रवाना होता है. बारात में गोयल और गायत्री (परिणीति चोपड़ा) भी शामिल है.

वो यात्रा के दौरान ही गायत्री से घुल मिल जाता है और तारा के शहर पहुंचते पहुंचते गायत्री से प्यार करने लगता है और तारा को छोड़कर भाग खड़ा होता है.

जल्द ही रघु और गायत्री 'लिव इन पार्टनर' की तरह रहने लगते हैं. कुछ दिनों बाद रघु, गायत्री से शादी करने का फै़सला करता है. लेकिन इससे पहले ही उसे गायत्री छोड़कर भाग जाती है.

कुछ दिनों बाद रघु की मुलाक़ात अजीबोगरीब परिस्थिति में एक बार फिर से तारा से होती है. तारा उससे मिलती है और जल्द ही दोनों में प्यार हो जाता है. दोनों के बीच सब कुछ ठीक चल रहा होता है कि एक दिन अचानक फिर से गायत्री रघु की ज़िंदगी में दस्तक देने लगती है.

फिर क्या होता है ? क्या रघु और गायत्री एक हो जाते हैं ? तारा का क्या होता है ? क्या रघु तारा के साथ बाकी की ज़िंदगी बिताएगा ? गायत्री भला क्यों रघु की ज़िंदगी से भाग जाती है ?

अलग कहानी

जयदीप साहनी की लिखी कहानी बेहद अलग है. फ़िल्म में मुख्य तौर से दिखाया गया है कि आजकल का युवा वर्ग किसी भी तरह के 'कमिटमेंट' से डरता है.

स्क्रीनप्ले काफी सहज है और इसमें कई घटनाओं को संयोगवश दिखाया गया है.

जैसे रघु का दोबारा तारा से मिलना, ब्रेक अप के बाद दोबारा गायत्री से मिलना बिलकुल संयोग है. गायत्री और रघु का कमिटमेंट से डरना एक बार फिर से संयोग ही है.

इंटरवल से पहले फ़िल्म काफ़ी मनोरंजक है. रघु और गायत्री के किरदार बेहद प्यारे और ताज़ा तरीन लगते हैं जो दर्शकों को भा जाते हैं.

राजस्थानी शादियों का पूरा माहौल और पैसे देकर बाराती बुलाने वाला जो एंगल है उसे बखूबी दिखाया गया है. रघु और गायत्री के बीच नोंक झोंक और गोयल (ऋषि कपूर) का किरदार भी लोगों का ख़ासा मनोरंजन करते हैं.

इंटरवल के बाद दोहराव

इंटरवल के बाद तारा जब रघु के जीवन में दोबारा आती हैं तो कहानी अपने आपको दुहराती सी लगती है.

कहानी में ट्विट्स लाने की सहूलियत लेने के लिए लेखक जयदीप साहनी ने तारा और रघु को दोबारा मिला दिया.

लेकिन कहानी में ये नहीं बताया गया कि भला क्यों तारा, रघु को माफ़ कर देती है ?

कहानी तब और उलझ जाती है जब रघु और तारा के जीवन में फिर से गायत्री आ जाती है.

बोल्ड विषय

संभव है कि पुरानी पीढ़ी के लोगों को तारा और गायत्री के किरदारों पसंद ना आएँ. क्योंकि दोनों बिना किसी कमिटमेंट के रघु के साथ रहने को, उसके साथ सोने तक को तैयार हैं. उन्हें 'लिव इन रिलेशन' की इस अवधारणा को पचाने में दिक्कत पेश आएगी.

क्लाइमेक्स, फ़िल्म की थीम के हिसाब से बिलकुल ठीक है लेकिन दर्शकों के एक वर्ग को ये ठीक नहीं लगेगा. हां, युवा वर्ग को ज़रूर क्लाइमेक्स पसंद आ सकता है. वो क्लाइमेक्स की उदारवादी सोच को ख़ासा पसंद कर सकते हैं. जयदीप साहनी के लिखे संवादों में हास्य भी है और वो असरदार भी हैं.

अभिनय

सुशांत सिंह राजपूत बेहद स्वाभाविक लगे हैं और उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया है. युवा लड़कियों के बीच में वो बहुत लोकप्रिय हो सकते हैं.

परिणीति चोपड़ा भी अपने रोल में ज़बरदस्त रही हैं और वो भी ख़ासी स्वाभाविक लगी हैं. उन्होंने बहुत ख़ूबी से अपने भावों को व्यक्त किया है.

अपने कमज़ोर रोल के बावजूद वाणी कपूर ने बॉलीवुड में अच्छी शुरूआत की है. गोयल के किरदार में ऋषि कपूर अद्भुत रहे हैं. वो जब भी स्क्रीन पर आते हैं जादू जगा देते हैं.

राजेश शर्मा ने छोटे से रोल में प्रभाव छोड़ा है. तरुण व्यास, तृप्ति शर्मा, इम्तियाज़ अहमद, क्रेग और एलेक्स (विदेशी पर्यटकों के रोल में, भुवन अरोरा, अमित मोहंती, प्रतीक जायसवाल और अनुज पंडित (रघु के दोस्त) ने भी अच्छा काम किया है.

निर्देशन

मनीष शर्मा ने बतौर निर्देशक स्क्रिप्ट के साथ पूरा न्याय किया है. कहानी की तरह ही उनका निर्देशन युवा वर्ग को अपील करेगा.

सचिन-जिगर का संगीत अच्छा है. 'तेरे-मेरे बीच में', 'गुलाबी' और दूसरे गाने अच्छे बन पड़े हैं. जयदीप साहनी के बोल मधुर हैं.

बृंदा और गणेश आचार्य की कोरियोग्राफ़ी बिलकुल सटीक है. बैकग्राउंड संगीत (सचिन-जिगर) भी अच्छा है.

मनु आनंद की सिनेमोटोग्राफ़ी भी प्रभावशाली है. उन्होंने राजस्थानी माहौल को बेहतरीन तरीके से पकड़ा है. रश्मि सेठी के सेट और नम्रता राव की एडीटिंग भी माकूल है.

कुल-मिलाकर शुद्ध देसी रोमांस को मिली जुली प्रतिक्रिया मिलेगी. युवा और शहरी दर्शकों को फ़िल्म पसंद आएगी लेकिन छोटे शहर के दर्शकों को ये ख़ासी बोल्ड लग सकती है.

बॉक्स ऑफ़िस पर कम लागत में बनी ये फ़िल्म निर्माताओं के लिए मुनाफ़े का सौदा साबित होगी.

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