'फ़्रंटियर गाँधी' के लिए राष्ट्रपति का न्यौता

  • 17 सितंबर 2013
Image caption ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार खान की ज़िंदगी पर बनी इस डॉक्यूमेंट्री को लद्दाख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में काफी पसंद किया गया.

ऐसा कम ही होता है जब भारत के राष्ट्रपति आधिकारिक तौर पर किसी ख़ास फ़िल्म या डॉक्यूमेंट्री को देखने की फ़रमाइश करें. वो भी कैबिनेट मंत्रियों के साथ.

ऐसी ही एक डॉक्यूमेंट्री है जिसका नाम है फ़्रंटियर गांधी जो ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान की ज़िंदगी पर बनी है.

कनाडा की रहने वाली निर्देशक टेरी मैकुलाहन ने इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में अपने जीवन के 22 साल लगा दिए. 17 सितंबर को राष्ट्रपति के ये फ़िल्म देखने के अनुरोध की बात ख़ुद निर्देशक टेरी ने हमें बताई.

राष्ट्रपति भवन में ये फ़िल्म दिखाई जाएगी.

लद्दाख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सबसे ज़्यादा यही डॉक्यूमेंट्री पसंद की गई और निर्देशक टेरी का पूरे हॉल में लोगों ने खड़े होकर अभिनंदन किया था.

इसी डॉक्यूमेंट्री के बहाने भारत के लोग एक बार फिर याद कर रहे हैं उस व्यक्ति को जिसे लोग बादशाह ख़ान या फ़्रंटियर गांधी भी बुलाते हैं. इसमें इंदर कुमार गुजराल, हामिद करज़ई से लेकर परवेज़ मुशर्रफ़ तक के इंटरव्यू हैं. इसे आवाज़ ओम पुरी ने दी है.

भारत रत्न पाने वाले पहले ग़ैर भारतीय

ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान अविभाजित भारत की वो हस्ती हैं जिनका ज़िक्र अब गाहे बगाहे ही होता है लेकिन बहुत से लोग इतिहास में उनको बड़ी शिद्दत और अदब से याद करते हैं.

वे पहले ग़ैर भारतीय थे जिन्हें भारत सरकार ने साल 1987 में भारत रत्न से नवाज़ा था.

अगर आप दिल्ली के बहुचर्चित ख़ान मार्केट से परिचित हों तो 1950 के दशक में ये मार्केट ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के नाम पर ही बनाया गया था. आज ये दुनिया की सबसे महंगी हाई स्ट्रीट में से है.

ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान का जन्म आज के ख़ैबर पख़्तूनख्वाह में हुआ था और उनकी गिनती अविभाजित भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में होती थी. वे पख्तूनों के बड़े नेता थे और महात्मा गांधी के वे बेहद क़रीबी थे.

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गांधी के साथ नज़दीकियां

Image caption फिल्म की निर्देशक टेरी मैकुलाहन ने बताया कि इस फिल्म के लिए काफी मुश्किलों के बाद फुटेज मिला.

फ़िल्म में ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान और गांधीजी का असल और बेहद दुर्लभ फ़ुटेज दिखाया गया है. निर्देशक टेरी ने बताया कि ये फ़ुटेज मिलना आसान नहीं था और कई देशों से ये अन्य तरीक़ों से बाहर निकाला गया.

डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे खा़न अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान ने ब्रितानी राज को हटाने के लिए अविभाजित भारत के नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया. लेकिन जब आज़ादी मिली तो वे भारत के बंटवारे के सख़्त ख़िलाफ़ थे. गांधी और ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के रिश्तों की नज़दीकी को दर्शाते हुए डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे चश्मा नहीं होने पर बादशाह ख़ान गांधीजी का चश्मा लेकर क़ुरान पढ़ लेते यानी दोनों का दिल और नज़रिया एक ही था.

अहिंसा में उनके यक़ीन को डॉक्यूमेंट्री में दर्शाया गया है. हालांकि बंटवारे को लेकर कांग्रेस और खा़न अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के मतभेदों को भी उजागर किया गया है.

नहीं चाहते थे बंटवारा

भारत में आमतौर पर उन्हें काफ़ी चाव से याद किया जाता है हालांकि पाकिस्तान में उन्हें लेकर मत बंटा हुआ है. डॉक्यूमेंट्री में लिए इंटरव्यू में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ कहते हैं, ''उन्होंने आज़ादी के लिए लड़ाई की ये सही है लेकिन वे पाकिस्तान यानी अपने देश के बनने के ही ख़िलाफ़ थे.''

जबकि लद्दाख़ में बीबीसी से बातचीत के दौरान भारत में अफ़गानिस्तान के राजदूत शाइदा मोहम्मद अब्दाली ने ख़ान अब्दुल गफ़्फार ख़ान को पूरे दक्षिण एशिया का करिश्माई नेता बताया जिनके आदर्शों की पूरे इलाक़े को ज़रूरत है.

ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान न सिर्फ़ अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़े बल्कि वे पख्तून समुदाय के लिए समाज सुधारक बनकर भी उभरे.

डॉक्यूमेंट्री में ख़ुदाई ख़िदमतगार का भी ज़िक्र है. बादशाह ख़ान ने 1929 में ख़ुदाई ख़िदमतगार नाम का आंदोलन चलाया था जिसके कार्यकर्ताओं को सुर्ख़ पोश भी कहा जाता था.

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जिनके जनाज़े के लिए युद्ध रुका

दो बार ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुए.

अपने जीवन के कई साल उन्हें जेल में बिताने पड़े या निर्वासन में रहे. साल 1988 में 98 साल की उम्र में उनकी मौत हुई.

डॉक्यूमेंट्री में वो फ़ुटेज भी दिखाया है जब उनकी मौत के बाद पाकिस्तान से होकर अफ़ग़ानिस्तान तक उनका जनाज़ा निकला था.

उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था कि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद के पास दफ़नाया जाए. उस समय अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध चल रहा था. कहा जाता है कि उन्हें सुपुर्दे ख़ाक करने के लिए कुछ समय के लिए युद्ध को विराम दे दिया गया था.

इस वृत्तचित्र को बनाने में निर्देशक टेरी को 22 साल लग गए और उनका कहना है कि उन्हें कभी नहीं लगा कि वे इस प्रयास को छोड़ दें. लेकिन इसे रिलीज़ करने का संघर्ष जारी है.

टेरी कहती हैं कि दुनिया में इस समय इस्लाम को लेकर डर का माहौल है और उसे हिंसा से जोड़ कर देखा जाता है जबकि डॉक्यूमेंट्री में कुछ और ही दिखाया गया है. इसी वजह से पश्चिम में ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान पर बनी इस डॉक्यूमेंट्री को रिलीज़ करने में दिक्क़तें हैं.

एक दर्शक के तौर पर ये डॉक्यूमेंट्री आपको इतिहास से फिर रूबरू कराती है और इस बनाने में लगी कड़ी मेहनत, लगन और संघर्ष के 22 साल के सफ़र को सलाम करने पर मजबूर करती है.

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