पचास साल बाद पाकिस्तानी फ़िल्म ऑस्कर में

  • 19 सितंबर 2013
'ज़िंदा भाग'
'ज़िंदा भाग', पाकिस्तान की तरफ़ से 50 साल बाद ऑस्कर में भेजी जाने वाली पहली फ़िल्म है.

'ज़िंदा भाग', ये वो पाकिस्तानी फ़िल्म है जिसने इतिहास बनाया. 50 साल बाद ये पाकिस्तान की ओर से ऑस्कर में भेजी जाने वाली पहली आधिकारिक फ़िल्म है.

फ़िल्म के निर्माता हैं मज़हर अली ज़ैदी और इसके निर्देशक हैं फ़रज़ाद नबी और उनकी पत्नी मीनू गौर जो एक भारतीय हैं.

बीबीसी से ख़ास बात करते हुए मज़हर ने अपनी इस फ़िल्म के अलावा पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग और बॉलीवुड के बारे में भी कई बातें कीं. पेश है इस बातचीत के चुनिंदा अंश.

'इतिहास बनाने पर गर्व'

'ज़िंदा भाग' एक कॉमेडी फ़िल्म है जो तीन लड़कों की कहानी है. फ़िल्म के निर्माता मज़हर ज़ैदी हैं.

बड़ी ख़ुशी की बात है कि हमारी फ़िल्म ऑस्कर में जा रही है. हमारी फ़िल्म कोई गंभीर क़िस्म की फ़िल्म नहीं है. ये एक कॉमेडी फ़िल्म है जिसमें गाने भी हैं.

राहत फ़तेह अली ख़ान, आरिफ़ लोहार और शफ़क़त अमानत अली जैसे लोगों ने इसमें गाना गाया है. फ़िल्म 20 सितंबर को रिलीज़ हो रही है.

कहानी है लाहौर में रहने वाले तीन लड़कों की जो अपने करियर की बेहतरी और पैसा कमाने के लिए मुल्क छोड़कर कहीं बाहर जाने की फ़िराक़ में हैं.

हालांकि पाकिस्तान में बहुत कम सिनेमाघर हैं लेकिन हमें उम्मीद है कि फ़िल्म अच्छा व्यापार करेगी. इसे हम भारत में भी रिलीज़ करना चाहते हैं और हमारी कुछ वितरकों से बात चल रही है.

'नसीर ने की ख़ासी मदद'

फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह ने भी अहम भूमिका निभाई है.

हम ख़ासे ख़ुशक़िस्मत हैं कि नसीरुद्दीन शाह जैसे बड़े सितारे ने हमारी फ़िल्म में काम किया.

वो इतने बेहतरीन इंसान हैं कि उन्होंने अपनी सामान्य फ़ीस से काफ़ी कम में हमारे लिए काम किया. वर्ना तो हम उन्हें अपनी फ़िल्म में ले भी नहीं पाते.

हमारी फ़िल्म में कई नए सितारे हैं. नसीर साहब ने पाकिस्तान आकर उन सभी लड़कों को अभिनय की ट्रेनिंग भी दी. हम इसके लिए उनके बड़े शुक्रगुज़ार हैं.

'बहादुर हैं फ़िल्ममेकर'

'ज़िंदा भाग' के निर्माता मज़हर ज़ैदी कहते हैं कि पाकिस्तान के फ़िल्मकार ख़ासे बहादुर हैं.

मैं दाद देता हूं पाकिस्तान के फ़िल्मकारों को, जो तमाम ख़तरों, फ़ंडामेंटलिज़्म और उग्रवाद के बावजूद काफ़ी बोल्ड फ़िल्में बनाते हैं. वो इश्यूज़ उठाते हैं जो समाज के लिए ज़रूरी हैं.

ऐसी फ़िल्में लगातार बन रही हैं. जैसे शोएब मंसूर की 'ख़ुदा के लिए' फिर 'बोल' और हाल ही में आई 'मैं हूं शाहिद अफ़रीदी' भी इसी श्रेणी में आती है.

हमारी फ़िल्मों में सिर्फ़ मसाला नहीं होता बल्कि एक संदेश भी होता है जो पाकिस्तानी समाज की बेहतरी के लिए ज़रूरी है.

बॉलीवुड से प्रेरणा

फ़िल्म 20 सितंबर को पाकिस्तान में रिलीज़ हो रही है. निर्माता मज़हर इसे भारत में भी रिलीज़ करना चाहते हैं.

बॉलीवुड फ़िल्में पाकिस्तान में बहुत मशहूर हैं. लेकिन हमें उनसे किसी तरह का डर महसूस नहीं होता. बल्कि हम उनसे प्रेरणा लेते हैं.

उन फ़िल्मों को देखकर हम भी सीखेंगे कि फ़िल्मों को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है. मैं भविष्य में बॉलीवुड के किसी फ़िल्मकार के साथ मिलकर फ़िल्म बनाना चाहता हूं.

मैं दिबाकर बनर्जी की फ़िल्ममेकिंग का प्रशंसक हूं. साथ ही कलाकारों में मुझे नसीरुद्दीन शाह के अलावा नई पीढ़ी के ऋतिक रोशन बहुत पसंद है.

'बैन है बेकार'

पहले बॉलीवुड की कई फ़िल्मों पर पाकिस्तान में बैन लग जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब हमारा सेंसर बोर्ड ख़ासा उदार हो गया है. हालांकि और सुधार की ज़रूरत है, लेकिन फिर भी हालात पहले से काफ़ी बेहतर हुए हैं.

अब सेंसर बोर्ड में ज़्यादा से ज़्यादा फ़िल्मों से जुड़े लोग आ रहे हैं. ये अच्छा है. लेकिन मैं ये भी कहूंगा कि फ़िल्मकारों को भी किसी भी मामले को डील करते वक़्त सभी लोगों की संवेदनाओं का ध्यान रखना चाहिए.

पहले भारत की कई फ़िल्मों में पाकिस्तान को बेहद ख़राब तरीक़े से पेश किया गया. यही हाल कई पाकिस्तानी फ़िल्मों का भी था. जिनमें भारत की छवि ठीक तरह से पेश नहीं की गई.

लेकिन अब दोनों मुल्कों के फ़िल्मकार परिपक्व हो गए हैं. मेरी फ़िल्म में कैमरा क्रू और साउंड डिपार्टमेंट भारत से आई टीम ने संभाला है. तो हालात अब बेहतर हो रहे हैं.

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