फ़िल्म रिव्यू: वॉर छोड़ो ना यार

  • 11 अक्तूबर 2013
'वॉर छोड़ो ना यार'

रेटिंग: *

'वॉर छोड़ो ना यार' भारत की पहली 'वॉर कॉमेडी' है. ये फ़िल्म कहानी है भारत और पाकिस्तान सीमा पर तैनात सैनिकों की, जो अपने अपने देश की रक्षा के लिए तैनात हैं लेकिन आपस में वो हंसी-मज़ाक करते हैं. गप्पें मारते हैं.

कैप्टन राजवीर सिंह राना (शरमन जोशी) बॉर्ड पर भारतीय फ़ौज की तरफ़ से तैनात हैं और कैप्टन क़ुरैशी (जावेद जाफ़री) और कैप्टन ख़ान (संजय मिश्रा) पाकिस्तानी फ़ौज से हैं.

कैप्टन राना और कैप्टन क़ुरैशी के बीच ख़ासा दोस्ताना है.

(रिव्यू: 'बेशरम')

भारत के रक्षा मंत्री (दिलीप ताहिल) दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका के बीच सीमा पर भारतीय सैनिकों से मिलने और फ़ोटो खिंचवाने के लिए चले आते हैं.

Image caption फ़िल्म में शरमन जोशी और सोहा अली ख़ान मुख्य भूमिका में हैं.

इस ऐतिहासिक घटना के टीवी पर कवरेज के लिए वो मशहूर टीवी पत्रकार रुत दत्ता (सोहा अली ख़ान) को न्यौता देते हैं.

टीवी चैनल किस तरह से टीआरपी और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं इस बात की जानकारी उन्हें होती है और वो युद्ध के सारे प्लान इस पत्रकार को बता देते हैं.

रुत, रक्षा मंत्री के साथ सीमा पर जाती है. लेकिन वो ये देखकर हैरान रह जाती है कि कैसे दोनों देशों के सैनिक एक दूसरे के साथ दोस्ताना तरीके से बरताव करते हैं और हंसी मज़ाक करते रहे हैं.

(रिव्यू: 'प्राग')

इस बीच युद्ध तय समय से पहले ही शुरू हो जाता है. रुत के टीवी चैनल मालिक ये जानकर ख़ुश हो जाते हैं कि उनके चैनल पर युद्ध की एक्सक्लूसिव जानकारी और फ़ुटेज होगी.

लेकिन रुत चाहती है कि दोनों देशों के बीच लड़ाई ना हो. वो कैप्टन राना को समझाती है और यहां तक कि दोनों मिलकर सीमा पार जाकर कैप्टन क़ुरैशी को लड़ाई से होने वाले नुकसान की बातें समझाते हैं. ताकि लड़ाई बंद हो जाए.

आगे क्या होता है ? क्या कैप्टन राना और रुत को अपने मक़सद में कामयाबी मिलती है ? यही फ़िल्मकी कहानी है.

कहानी

फ़राज़ हैदर की कहानी में नयापन तो है लेकिन फ़िल्म की कॉमेडी और मनोरंजन इसकी नवीनता को मैच नहीं कर पाए हैं.

Image caption (कहानी में नवीनता है लेकिन निर्देशन दमदार नहीं है)

फ़िल्म में कुछ दृश्य ज़रूर मनोरंजक है लेकिन कुल मिलाकर पूरी फ़िल्म आपको गुदगुदा नहीं पाएगी. कभी तो फ़िल्म कॉमेडी लगती है तो कभी ये सैटायर (व्यंग्य) लगने लगती है.

स्क्रीनप्ले में भी सहूलियत के हिसाब से कुछ छूट ली गई है. जैसे रक्षा मंत्री को इतना बेवकूफ़ बताया गया है कि वो भारत के वॉर प्लान की पूरी जानकारी टीवी रिपोर्टर को दे देते हैं. और बाद में वो इसका इस्तेमाल करती है जो फ़िल्म में अहम मोड़ साबित होता है.

(रिव्यू: 'लंचबॉक्स')

फ़िल्म के संवाद अच्छे हैं लेकिन उन्हें और दमदार होना चाहिए था.

अभिनय

शऱमन जोशी ने सीमित मौके मिलने के बावजूद अच्छा काम किया है. जावेद जाफ़री भी अपने रोल में जंचे हैं. सोहा अली ख़ान ने भी अच्छा काम किया है. दिलीप ताहिल और संजय मिश्रा ने भी बढ़िया काम किया है.

फ़राज़ हैदर की कहानी अच्छी है लेकिन वो निर्देशन में अपनी छाप नहीं छोड़ पाए हैं.

कुल मिलाकर वॉर छोड़ो ना यार को जितना मनोरंजक होना चाहिए था वो उसके आसपास भी नहीं पहुंच पाई है. फ़िल्म में बड़ी स्टारकास्ट भी नहीं है. इस वजह से इसका भविष्य डांवाडोल ही नज़र आता है.

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