'क्यों अमिताभ बच्चन को रिहर्सल पंसद नहीं'

भारत में सिनेमा और फ़िल्मी सितारे लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं. दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक और शाहरुख़ खान से लेकर रणबीर कपूर तक.. फ़िल्मी कलाकारों को लेकर लोगों के मन में तरह तरह की जिज्ञासाएँ और सवाल होते हैं.

लेकिन आख़िर एक कलाकार के मन में क्या चलता है जब वो सेट पर शॉट दे रहा होता है या कोई निर्देशक कैमरे के पीछे किसी सितारे को कै़द कर रहा होता है? वरिष्ठ फिल्म पत्रकार भावना सोमाया ने ऐसे ही पहलूओं को छुआ है अपनी किताब में जिसका नाम है टॉकिंग सिनेमा.

ये किताब इंररव्यू फ़ॉर्मेट में है.चार भागों में बंटी ये किताब आपको कई दिग्गज निर्देशकों, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के मन में चलने वाली उन आशंकाओं, आंकाक्षओं से रूबरू कराती है जो बतौर कलाकार होने के नाते उनके ज़हन में रहती हैं.

पहले सेक्शन में कलाकार बताते हैं कि उनकी अभिनय की प्रक्रीया कैसी रहती है. मसलन अमिताभ बचच्न बताते हैं , "एक्टर होने के नाते हम रिहर्सल करते हैं, कभी कभी अपने कमरे और बाथरुम में भी. लेकिन सेट पर आते ही एक नई दुनिया मानो आपके सामने खड़ी हो जाती है. उस वक़्त आप जो करते हैं वो उस चीज़ से बिल्कुल अलग होता है जिसकी आपने कल्पना या रिहर्सल की होती है. इसलिए मैं ज़्यादा रिहर्सल नहीं करना चाहता क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसा करने से 'वो पल' चला जाएगा."

जब शॉट शुरु होता है तो ज़हन में क्या चलता है....

इसी तरह अपनी फिल्में देखने के बारे में शाहरुख़ खान किताब के बारे में कहते हैं, "मैं जब भी पहली बार अपनी फ़िल्म देखता हूँ तो मुझे उसकी हर चीज़ ख़राब लगती है. फिर जितनी बार मैं फिल्म को दोबारा देखता हूँ तो कुछ बेहतर लगती है. फिर धीरे धीरे आप उस विशेष किरदार से बाहर आ जाने लगते हैं. समय के साथ ये डिचैटमेंट या दूरी जल्दी आने लगी है."

किताब में इस बारे में भी बात की गई है कि कैसे कोई एक्टर किसी ख़ास किरदार में ढल जाता है या ढाल दिया जाता है जिसमें इसकी बोली, कॉस्ट्यूम, हाव भाव सब शामिल है.

लेखिका भावना सोमाया मिसाल देते हुए बताती हैं, "जैसे रेखा जी को लज्जा में अवधी बोलती हैं, उन्होंने राम दुलारी नाम की महिला का रोल किया था. तो उन्हें इस किरदार में ढलने के लिए अलग तरह से मेहनत करनी पड़ी. इसी तरह सरकार में रोल के लिए अमिताभ बच्चन ने बताया कि उन्हें कॉस्टूयम डिज़ाइनर ने लूँगी दी, मेकअप आर्टिस्ट ने बड़ा सा लाल तिलक लगा दिया और विग डाल दी. अमिताभ बच्चन ने बताया कि उस समय तक उन्होंने सोचा नहीं था कि सरकार की भूमिका वो कैसे करेंगे. लेकिन जैसी ही तैयार होने के बाद वो अपनी वैन से निकले, कुर्ते के स्लीव ऊपर किए तो सब लोग डर कर हट गए वहाँ से."

तो इस तरह की किताब लिखने के बारे में कैसे सोचा ? इस पर भावना सोमाया कहती हैं, "लंबे अरसे से सिनेमा से जुड़े मुद्दों और लोगों पर लिखती आई हूं. कई कलाकारों और फ़िल्मकारों के संपर्क में हूँ, उनको काम करते हुए देखा है. मैने सोचा कि एक ऐसी किताब होनी चाहिए जहाँ ये लोग सिर्फ अपने काम के बारे में बात कर सकें.जब ये अपने काम के बारे में सोचते हैं, जब स्टूडियो में जाते हैं, जब शॉट शुरु होता है तब उनके ज़हन में क्या क्या चलता है, शॉट के बाद क्या सोचते हैं...यही सोचकर मैने किताब लिखी है."

इसी तरह डाइरेक्टर्स कट में निर्देशकों का नज़रिया भी पेश करने की कोशिश की गई है जिसमें ऋषिकेश मुखर्जी से लेकर गुलज़ार, यश चोपड़ा, गोविंग निहलानी और करण जौहर शामिल हैं.

'हीरो-हीरोइन की साइकिल टकराना अश्लील था'

भावना सोमाया मिसाल देते हुए बताती हैं, "सबका अलग अलग नज़रिया रहता है. जैसे गोविंद निहलानी ने समझाया कि उनका अपना कितना भी टेंशन क्यों न रहता हो लेकिन उनकी ज़िम्मेदारी ये है कि उनके कलाकार सहज और ख़ुश हैं या नहीं. वहीं श्याल बेनेगल ने मुझे बताया कि वे अपनी फ़िल्म में विषय के अनुसार एक्टर और जगह को चुनते हैं और सिनेमा का रुख़ निर्देशक के हिसाब से चलता है इसलिए कलाकारों को भी निर्देशक की पर्सनेलिटी को अपनाना ज़रूरी है."

किताब के आख़िर में एक सेक्शन रखा गया है 'द स्पेशलिस्ट' जिसमें उन ख़ास मुद्दों या किरदारों की बात की गई हैं जो किसी कलाकार विशेष से जुड़कर रह गए. जैसे रोमांस को यश चोपड़ा से जोड़कर देखा जाता है, तवायफ़ के रोल को रेखा से, अमिताभ बच्चन और पुलिस की वर्दी का ख़ासा रिश्ता रहा है तो श्याम बेनेगल ने महिलाओं पर काफ़ी फिल्में बनाई हैं.

किताब में यश चोपड़ा से हुई इंटरव्यू में उनकी कई जानी-अनजानी बातें सामने आती हैं. जैसे वो बताते हैं कि फिल्म धूल का फूल में एक सीन था जहाँ हीरो और हीरोइन का साइकिल एक दूसरे से टकराता है लेकिन सेंसर ने ये सीन हटाने के लिए कहा था क्योंकि उन्हें ये दृश्य अश्लील लगा था. इसमें यश चोपड़ा अपना आंकलन करते हुए कहते हैं कि फासले जैसी उनकी फ़िल्मों की विफलता इसलिए हुई क्योंकि वे अपनी जिद्द पर अड़ गए थे.किताब में यश चोपड़ा ये भी बताते हैं कि डर में शाहरुख़ खान उनकी पहली नहीं बल्कि चौथी पसंद थे.

लेखिका भावना सोमाया कहती हैं कि विदेशों में इस तरह की किताबें ख़ूब चलती हैं लेकिन भारत में ऐसी किताबें अभी कम चलती हैं क्योंकि ज़्यादातर लोगों को फिल्मी कलाकारों की निजी ज़िंदगी में ज्यादा दिलचस्पी रहती है. ये किताब सिनेमा के कई दिग्गजों की दुनिया में झांकने का एक मौका देती है जहाँ चकाचौंध के पीछे की उनकी दुनिया को समझा जा सकता है.

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