'सुलझी पर सीमित अपील वाली फिल्म है शाहिद'

'शाहिद'
Image caption (फ़िल्म 'शाहिद', शाहिद आज़मी नाम के सामाजिक कार्यकर्ता और वकील की कहानी पर आधारित है)

रेटिंग: ***

यूटीवी स्पॉटब्वॉय और बोहरा ब्रदर्स की फ़िल्म 'शाहिद' कहानी है एक वकील की जो मुस्लिम समुदाय के उन लोगों की कानूनी मदद करता है जिन्हें बेवजह परेशान किया जाता है और निर्दोष होने पर भी जेल में डाल दिया जाता है. साथ ही उन पर चरमपंथी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है.

शाहिद क़ाज़मी (राजकुमार) ख़ुद पुलिस की ज़्यादतियों का शिकार है. उस पर आतंक फैलाने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाता है जहां उसे पुलिस की ज़्यादतियां झेलनी पड़ती हैं.

(पढ़िए: 'बॉस' का रिव्यू)

जेल से बाहर आकर वो क़ानून की पढ़ाई करता है और अल्पसंख्यक समुदाय के उन तमाम लोगों की क़ानूनी मदद करता है जो ग़लत आरोपों में जेल में डाल दिए गए हैं.

वो ख़ासतौर से उन लोगों की मदद करता है जिनके पास क़ानूनी लड़ाई के लिए पैसा नहीं है.

लेकिन धार्मिक कट्टरपंथियों को 'शाहिद' के तौर तरीके रास नहीं आते. उसे धमकियां मिलती हैं कि वो अपनी 'हरकतों' से बाज़ आए. लेकिन शाहिद पुलिस ज़्यादतियों का शिकार हुए लोगों की लगातार मदद करता रहता है.

फिर एक दिन कुछ लोग उसकी हत्या कर देते हैं.

कहानी

फ़िल्म की कहानी, शाहिद आज़मी की असल ज़िंदगी पर आधारित है. समीर गौतम सिंह ने एक बेहद कसी हुई कहानी लिखी है.

(रिव्यू: 'बेशरम')

Image caption (फ़िल्म का निर्देशन जानदार है और कहानी कसी हुई है)

समीर गौतम सिंह, अपूर्वा असरानी और हंसल मेहता का लिखा स्क्रीनप्ले भी अच्छा है.

ड्रामा तेज़ गति से आगे बढ़ता है जिससे दर्शक बोर नहीं हो पाते. लेकिन फ़िल्म की कहानी में कोई 'शॉक वैल्यू' नहीं है. हालांकि ये लेखक की ग़लती नहीं है.

फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है. तो ज़ाहिर है इसमें घुमावदार मोड़ नहीं हैं. दर्शकों को पता होता है कि ड्रामा कहां ख़त्म होगा. इस वजह से फ़िल्म एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगी.

समीर गौतम सिंह के संवाद बेहद दमदार हैं और स्क्रीनप्ले को मज़बूत करते हैं.

अभिनय

फ़िल्म में सभी कलाकारों ने ज़बरदस्त काम किया है. राजकुमार ने शाहिद आज़मी के रोल में जान डाल दी है. वो फ़िल्म में बिलकुल वास्तविक लगे हैं.

राजकुमार के सुलझे हुए अभिनय को देखना और सीन दर सीन उनकी अप्रोच एक बेहद सुखद अहसास देती है.

शाहिद की पत्नी के रोल में प्रभलीन संधु ने भी बढ़िया अभिनय किया है. शालिनी वत्सा ने सरकारी वकील के रूप में उम्दा काम किया है. बाकी कलाकारों का प्रदर्शन भी सराहनीय रहा है.

निर्देशन

Image caption (राजकुमार यादव ने शाहिद काज़मी के किरदार में जान डाल दी है)

हंसल मेहता ने बेहतरीन निर्देशन किया है. उन्होंने इस संवेदनशील विषय को बेहद परिपक्व तरीके से संभाला है.

( रिव्यू: 'फटा पोस्टर निकला हीरो')

उन्होंने कहीं भी फ़िल्म को बोझिल नहीं होने दिया. करण कुलकर्णी का बैकग्राउंड संगीत फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाता है. फ़िल्म का संपादन और सिनेमेटोग्राफ़ी भी सराहनीय है.

कुल मिलाकर 'शाहिद' एक बेहद सुलझी हुई फ़िल्म है. लेकिन इसकी अपील बहुत सीमित है. ये एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही लुभा पाएगी.

'वर्ड आफ़ माउथ' से फ़िल्म को ज़रूर फ़ायदा पहुंचेगा. फ़िल्म के लो बजट होने की वजह से इसकी लागत वसूल हो सकती है.

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