क्या किशोर, रफ़ी और मुकेश से पीछे रह गए थे मन्ना डे?

मन्ना डे
Image caption समीक्षकों के मुताबिक़ मन्ना डे ने विविधतापूर्ण गाने गाए और उनको महज़ लोकप्रियता की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए.

शास्त्रीय गायन में सिद्धहस्त, हर तरह के गाने गाने में प्रवीण, 60 सालों से भी ज़्यादा समय तक गायन में सक्रिय रहे मन्ना डे क्या लोकप्रियता के पैमाने पर किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे अपनी पीढ़ी के गायकों से पीछे रह गए थे?

संगीत प्रेमियों के ज़हन में ये सवाल अक्सर कौंधता रहता है. फ़िल्म संगीत से जुड़े लोगों की इस पर मिली जुली प्रतिक्रिया है.

(मन्ना डे से बीबीसी की ख़ास बातचीत)

संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंद जी (जिनके लिए मन्ना डे ने 'यारी है ईमान मेरा' समेत कई हिट गाने गाए) के आनंद जी कहते हैं कि मन्ना डे जैसे गायकों को लोकप्रियता की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए.

बीबीसी से बात करते हुए आनंद जी ने कहा, "वो हीरो के साथ-साथ चरित्र कलाकारों के लिए भी गाने गाते थे. हर तरह के गाने गाने में उन्हें दक्षता हासिल थी. इसलिए ये कहना कि वो रफ़ी, किशोर या मुकेश से पीछे रह गए, ग़लत होगा."

संगीतकार-गायक बप्पी लाहिरी ने किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायकों और मन्ना डे के बीच फ़र्क को समझाते हुए कहते हैं, "रफ़ी और किशोर की तो बात ही अलग थी. एक तो दोनों ने मसाला और मेन्स्ट्रीम किस्म के गाने गाए जिनके आम लोगों के बीच हिट होने की ज़्यादा गुंजाइश हुआ करती थी. मन्ना दा ने अपेक्षाकृत कम और चुने हुए गाने गाए. शायद ये वजह हो सकती है लोकप्रियता में फ़र्क की."

'पूरब का भगवान'

लेकिन बप्पी लाहिरी ये भी मानते हैं कि मन्ना डे ने जो गाने गाए उनका कोई जवाब नहीं.

(मन्ना डे के मशहूर गाने)

वो कहते हैं, "बंगाल के तो वो किंग थे. यहां उनसे बड़ा कोई नहीं. जिस तरह के गाने उन्होंने गाए. उसकी मिसाल नहीं मिलती."

Image caption फ़िल्म संगीत से जुड़े लोगों का मानना है कि मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार ने ज़्यादातर गाने फ़िल्म के नायकों के लिए गाए शायद इस वजह से वो मन्ना डे से ज़्यादा लोकप्रिय हुए.

गायक अभिजीत की राय भी ऐसी ही है. वो कहते हैं कि ये तुलना बेमानी है.

अभिजीत के मुताबिक़, "मैं इसे इस तरह से नहीं देखता. अगर आप भारत के पूर्वी हिस्से की तरफ़ जाएं तो मन्ना डे को भगवान का दर्जा प्राप्त है. उन्हें पूरब का भगवान कहा जाता है. मेरे लिए मन्ना डे को गायक के तौर पर देखने के लिए लोकप्रियता कतई एक पैमाना नहीं है."

फ़र्क

वहीं संगीत समीक्षक पवन झा का मानना है कि करियर के शुरुआती दौर में मन्ना डे के गानों में शास्त्रीय संगीत का ज़्यादा पुट होता था जिन्हें फ़िल्म में नायक नहीं गाता था.

पवन झा के मुताबिक़, "ज़ाहिर है रफ़ी और किशोर मुख्य नायक के लिए गाते थे. इस वजह से उनके गाने ज़्यादा लोकप्रिय हुए. लेकिन 50 के दशक में मन्ना दा ने भी नायकों के लिए गाना शुरू कर दिया. भले ही मुकेश को राज कपूर की आवाज़ माना जाता है लेकिन मन्ना डे ने भी उनके लिए कई गाने गाए जो लोकप्रिय साबित हुए.

(सुनिए मन्ना डे से ख़ास मुलाक़ात)

"बल्कि मैं तो कहूंगा कि मन्ना डे ने अपनी आवाज़ के ज़रिए कलाकारों को जो विविधता पूर्ण अभिव्यक्ति दी वो किशोर, रफ़ी और मुकेश भी नहीं दे पाए."

संगीतकार ललित पंडित के मुताबिक़, "असल में मन्ना डे की आवाज़ हीरो पर उतनी नहीं जमती थी जितनी किशोर या रफ़ी की आवाज़ जमती थी. इस वजह से किशोर और रफ़ी जैसे गायक ज्यादा लोकप्रिय रहे. लेकिन मन्ना डे की विविधतापूर्ण गायकी का जवाब नहीं."

ज़्यादातर संगीत समीक्षकों का मानना है कि किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे अद्वितीय गायकों के सामने भी अपना एक अलग मुक़ाम बनाना मन्ना डे जैसे गायक के ही बूते की बात थी.

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