बॉबी के 40 साल: गाँव से चलती थी बॉबी बस

यूँ तो हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में बेशुमार फ़िल्में बनती हैं, लेकिन कुछ फ़िल्में ऐसे होती हैं जो यादगार बन कर रह जाती हैं. ऐसी ही एक फ़िल्म है राज कपूर की 'बॉबी'. 1973 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने अपने 40 साल पूरे कर लिए हैं.

बॉबी को असल मायनों में हिंदी फ़िल्मों की पहली ‘टीनएज लव स्टोरी’ कहना शायद ग़लत नहीं होगा. जहाँ अधेड़ उम्र के हीरो अक्सर कॉलेज के किशोर का रोल निभाते आए हैं, वहाँ 16-17 साल की डिंपल और कोई 20-21 साल के ऋषि कपूर पर्दे पर अलग ताज़गी लेकर आए. ऋषि कपूर के बेपरवाह बाप के रोल में प्राण साहब, बॉबी पर जान छिड़कने वाले पिता के रूप में प्रेमनाथ और मिसिज़ ब्रिगेंन्ज़ा के रोल में दुर्गा खोटे..सब एक से बढ़कर एक थे.

कहते हैं कि फ़िल्म बॉबी की लोकप्रियता का आलम ये था कि गाँवों-क़स्बों से बड़े शहरों के थिएटरों के लिए विशेष बसें चलती थीं जिन्हें ‘बॉबी बस’ कहा जाता था. ये बस लोगों को फ़िल्म दिखाकर वापस गाँव लेकर आती थी. लेकिन फ़िल्म बनाने और रिलीज़ करने से पहले राज कपूर के हालात काफ़ी मुश्किल थे. फ़िल्म में पैसा चाहिए था जिसके लिए हिंदूजा परिवार आगे आया.

वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे बताते हैं, "फ़िल्म बनकर तैयार थी. राज साहब फ़िल्म का ऊंचा दाम मांग रहे थे. वह राजेश खन्ना का दौर था और राज साहब, राजेश खन्ना की फ़िल्म से एक लाख ऊपर दाम मांग रहे थे. शशि कपूर पहले डिस्ट्रीब्यूटर थे जिन्होंने इसे ख़रीदा. शशि कपूर ने कोठारी साहब की साझेदारी में दिल्ली-यूपी ख़रीदा. और एक वकील हुआ करते थे जिन्होंने पंजाब के अधिकार ख़रीदे. और कहीं के लिए फ़िल्म बिकी ही नहीं."

'यह भी कोई उमर है प्यार करने की'

Image caption प्राण ने बॉबी ने अहम किरदार निभाया है

मुसीबत यहीं ख़त्म नहीं हुई और फ़िल्म में पैसा लगाने वाले हिंदूजा परिवार से अदालत तक की नौबत आ गई.

चौकसे बताते हैं, "राजकपूर को लगा कि अगर फ़िल्म हिट होगी तो बाक़ी जगहों के अधिकार भी बिक जाएंगे, लेकिन हिंदूजा को लगा कि सिर्फ़ दो जगह के अधिकार से पैसा कैसे निकलेगा. उन्होंने उनके ख़िलाफ़ हाइकोर्ट में केस कर दिया. रिलीज़ के पहले राजकपूर ने उनका पैसा लौटा दिया. लेकिन पिक्चर का पहला शो हाउस फुल हो गया और फ़िल्म चल पड़ी. उसके बाक़ी के अधिकार बिक गए और इंडस्ट्री में लोग फिर से राजकपूर को महान डायरेक्टर मानने लगे. वे लोग भी उनके साथ हो गए जो कहने लगे थे कि राज निर्देशन भूल गया है."

फ़िल्म के बनने और रचे जाने की कहानी भी काफ़ी दिलचस्प है. राज कपूर के क़रीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे बताते हैं, “राज साहब के ऑफ़िस में उस समय सिर्फ़ ज़मीन पर दरी बिछी रहती थी और मेज़ लगी रहती थी. उस मेज़ पर आर्ची कॉमिक्स पड़ी रहती थीं. ऐसे ही उन्होंने कॉमिक्स में एक कैरेक्टर के बारे में पढ़ा जिसे इश्क हो गया था तो उसका बाप बोलता है कि यह तुम्हारी उमर है इश्क करने की? यू आर टू यंग टू फॉल इन लव. वहीं से यह आइडिया आया कि ऐसी फ़िल्म बनाई जाए जिनके बारे में लोग कहते हैं कि यह भी कोई उमर है प्यार करने की.”

फ़िल्म बॉबी ने रिलीज़ होने के बाद कामयाबी के झंडे गाड़ दिए और इसके गानों का क्रेज़ भी ग़ज़ब था. लेकिन बॉबी बनाने से पहले भी निर्माता-निर्देशक राज कपूर के हालात अच्छे नहीं थे.

1970 में राज कपूर की फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' फ़्लॉप हो गई थी. उसके एक साल बाद राज जी की प्रोड्यूस हुई फ़िल्म 'कल आज कल', जिसे रणधीर कपूर ने डायरेक्ट की थी, वह भी फ़्लॉप हो गई. उस समय मार्केट में आरके बैनर की क्रेडिबिलिटी कम हो गई थी. उसी दौरान पृथ्वी राजकपूर की मृत्यु हुई, उनकी माताजी गुज़र गईं, उनके क़रीबी जयकिशन की भी मृत्यु हुई.

इन्हीं चुनौतियों के बीच राज कपूर ने एक युवा प्रेम कहानी बनाने की ठानी. ऋषि कपूर बतौर बाल कलाकार मेरा नाम जोकर में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर अपना जौहर दिखा चुके थे.

शूटिंग में ही डिंपल की शादी

डिंपल कपाड़िया को हीरोइन चुनने की रोचक कहानी जयप्रकाश चौकसे यूँ बताते हैं, “किशन धवन चरित्र कलाकार थे. उनकी पत्नी बुंदी धवन, राज कपूर की पत्नी कृष्णा की दोस्त थीं. उन्होंने डिंपल कपाड़िया का नाम सुझाया. स्क्रिप्ट के साथ डिंपल के सीन लिए गए वो आज भी आरके स्टूडियो में कहीं रखे हुए होंगे. स्क्रिप्ट सीन देख कर आपको यक़ीन नहीं होगा कि यह वही डिंपल कपाड़िया हैं. राज कपूर ने डिंपल को डांस और एक्टिंग क्लास भेजकर पारंगत करना शुरू किया. उस समय डिंपल की उम्र बमुश्किल 15 या 16 की रही होगी.”

वैसे जब बॉबी की शूटिंग अपने अंतिम पड़ाव में थी तो डिंपल कपाड़िया ने राजेश खन्ना से शादी कर ली थी.

बॉबी के रिलीज़ के बाद ऋषि कपूर-डिंपल की जोड़ी ने तहलका मचा दिया था. बॉबी सिर्फ़ एक फ़िल्म भर न होकर एक फ़ैशन स्टेटमेंट भी थी. डिंपल की वो मिनी स्कर्ट, पोलका डॉट वाली शर्ट, हॉट पैंट्स, बड़े चश्मे, पार्टियाँ...राज कपूर ने जवान भारत की पहचान एक नई जीवनशैली से कराई थी.

बॉबी बनी फ़ैशन स्टेटमेंट

बॉबी की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उसके गीत थे जो उस समय किसी ‘एंथम’ से कम नहीं थे. उस समय जय किशन की मृत्य हो गई थी और बताया जाता है कि शंकर से राज कपूर की अनबन हो गई. इसलिए उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारे लाल को साइन किया.

राज कपूर की आवाज़ मुकेश को माना जाता था लेकिन ऋषि कपूर के लिए वे नई आवाज़ चाहते थे. सो नए गायक शैलेंद्र सिंह को लिया गया.

फ़िल्म का हिट गीत झूठ बोले कौवा काटे दरअसल एक लोकगीत था जिसे राज कपूर ने तीसरी क़सम फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में सागर में बिट्ठल भाई पटेल के यहां सुना था. कहा जाता है कि उन्होंने तभी कहा था इसे रिकॉर्ड करके इसपर कोई गाना बनाऊंगा. उन्होंने यही गीत फ़िल्म में लिया भी.

कहते हैं कि बॉबी बनाते वक़्त इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोग धर्मेंद्र, प्राण साहब, राजेंद्र कुमार ने उनसे कहा था कि आरके बैनर को फिर से खड़ा करने के लिए वे लोग बिना पैसे लिए काम करेंगे. लेकिन राज कपूर ने सबका शुक्रिया अदा करते हुए कहा था, “इस वक़्त मेरी फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं इसलिए मेरा लेवल नीचे है और आपका ऊपर. हम तब साथ काम करेंगे जब हमारा और आपका लेवल बराबर हो जाएगा.”

और राज कपूर ने वो करके भी दिखाया.. बंदिशों को तोड़ता प्रेम, अमीरी-ग़रीबी को पाटता प्यार, बाली उम्र की ये प्रेम कहानी आज भी बेहतरीन टीनएज लव स्टोरी के रूप में याद की जाती है.

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