'सत्या-2' नहीं 'सत्यानाश'

  • 9 नवंबर 2013
'सत्या-2'

रेटिंग: 1/2

'सत्या-2', साल 1998 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'सत्या' का सीक्वल है. मुंबई पर अंडरवर्ल्ड का प्रभुत्व लगभग ख़त्म हो चुका है और सत्या (पुनीत सिंह रत्न) इस स्थिति का फ़ायदा उठाना चाहता है.

वो अपने छोटे गांव से मुंबई पहुंचता है और अपने दोस्त नारा के साथ रहने लगता है. नारा एक संघर्षरत फ़िल्म निर्माता है और अपनी फ़िल्म के लिए पैसा जुटाने की कोशिश में लगा है.

(फ़िल्म रिव्यू: 'कृष-3')

सत्या एक बिल्डर के साथ मिलकर लोगों के मन में एक बार फिर से अंडरवर्ल्ड का ख़ौफ लोगों के मन में पैदा करके उनसे पैसे उगाहने का काम करने लगता है. जल्द ही वो बिल्डर के साथ अंडरवर्ल्ड डॉन आरके का चहेता बन जाता है.

सत्या के कारनामों की चर्चा पूरे मुंबई में होने लगती है और वो सरकार की आंखों की किरकिरी बन जाता है. वो शहर में अपनी दहशत कायम करने के लिए मशहूर हस्तियों, रईस लोगों यहां तक कि मंत्रियों और व्यापारियों की हत्याएं करने और करवाने लगता है.

पुलिस और सरकार उस पर काबू करने में नाकाम रहती है.

आगे क्या होता है ? क्या सत्या पर अंकुश लगाया जा सकेगा ? पुलिस उसकी हरकतों को कैसे रोक पाएगी. यही आगे की कहानी है.

कहानी

Image caption पुनीत सिंह रत्न का अभिनय बेहद साधारण है.

राधिका आनंद की कहानी में ख़ामियां ही ख़ामियां हैं और वो लोगों के ज़ेहन में किसी तरह का डर या ख़ौफ़ पैदा करने में नाकाम रही है. स्क्रीनप्ले में जान ही नहीं है.

कहानी में दिखाया गया है कि अंडरवर्ल्ड कैसे बर्बादी से उठकर फिर से एक शहर पर काबू कर लेता है लेकिन फ़िल्म देखते समय दर्शकों को फिल्म के पात्र कहीं से भी खौफ़ज़दा नहीं कर पाते.

(फ़िल्म रिव्यू: 'बॉस')

फ़िल्म में हत्याओं के सिवा कुछ नहीं होता. फ़िल्म में लगभग सभी पात्र नए चेहरे हैं और उनके किरदारों को भी ठीक से डेवलप नहीं किया गया है. इस वजह से भी दर्शक फ़िल्म से जुड़ नहीं पाते.

धीमी और उबाऊ फ़िल्म

फ़िल्म की गति बेहद धीमी है. फ़िल्म का केंद्रीय पात्र सत्या भी इतनी धीमी गति से बोलता है कि दर्शकों को खीझ होने लगती है.

सत्या के किरदार को 'कूल' बनाने के चक्कर में फ़िल्म में उससे बहुत धीमी आवाज़ में संवाद अदायगी कराई गई है जो दर्शकों के संयम की परीक्षा लेती है.

कुल मिलाकर सत्या की कहानी और स्क्रीनप्ले बेहद बचाकाना किस्म के हैं. फ़िल्म देखकर दर्शकों के मन में ना तो किसी तरह का ख़ौफ़ पैदा हो पाता है ना ही उनका मनोरंजन हो पाता है.

अभिनय

पुनीत सिंह रत्न में आत्मविश्वास तो नज़र आया लेकिन अभिनय के मामले में वो साधारण ही रहे. परदे पर वो आलसी दिखे और उनकी संवाद अदायगी की वजह से वो दर्शकों के मन में किसी भी तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाए.

(फ़िल्म रिव्यू: 'मिकी वायरस')

सत्या की गर्लफ्रेंड चित्रा के रोल में अंकिता सोती ने अच्छा अभिनय किया है. फ़िल्म के दौरान मकरंद देशपांडे की हिंदी में कमेंट्री बेहद उबाऊ और लंबी है. इसके अलावा उनकी इस कमेंट्री की भाषा में कई गड़बड़ियां भी हैं.

रामगोपाल वर्मा का निर्देशन बिलकुल भी असरदार नहीं है. वो बिलकुल भी फॉर्म में नहीं है. फ़िल्म के गाने और संगीत भी बेदम हैं.

ये फ़िल्म ‘सत्या’ जैसी फ़िल्म का सीक्वल होना बिलकुल भी डिज़र्व नहीं करती. इस फ़िल्म को ‘सत्या’ नहीं बल्कि ‘सत्यानाश’ कहना ज़्यादा ठीक होगा.

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