फ़िल्म रिव्यू: 'गोरी तेरे प्यार में'

(''गोरी तेरे प्यार में)

रेटिंग: **

धर्मा प्रोडक्शंस की 'गोरी तेरे प्यार में' कहानी है एक दक्षिण भारतीय लड़के और उत्तर भारतीय लड़की की.

श्रीराम वेंकट एक आलसी, बेकार, दिलफेंक किस्म का लड़का है. उसके पिता उससे बेहद परेशान रहते हैं और उसे परिवार के नाम पर एक काला धब्बा मानते हैं.

उसकी शादी वसुधा (मेहमान भूमिका में श्रद्धा कपूर) से तय हो जाती है. लेकिन वसुधा किसी और से प्यार करती है और वो ये बात अपने मां-बाप को बताने का साहस नहीं कर पा रही है.

(केबीसी में करीना के ठुमके)

Image caption करीना कपूर ने बेहतरीन अभिनय किया है.

दोनों की शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और इसी दौरान श्रीराम भी वसुधा को बताता है कि वो भी दिया शर्मा (करीना कपूर) नाम की एक लड़की से प्यार करता है जो सामाजिक कार्यकर्ता है. दिया और श्रीराम एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन एक ग़लतफ़हमी की वजह से दोनों का रिश्ता टूट जाता है.

श्रीराम से बात करके वसुधा को महसूस होता है कि वो अब भी दिया से प्यार करता है. वो श्रीराम को दिया के पास जाने की सलाह देती है. वसुधा की बात मानकर श्रीराम अपनी शादी से भाग खड़ा होता है.

(रिव्यू: 'राम-लीला')

दिया गुजरात के एक गांव में रह रही है. वो गांव के लोगों के लिए एक पुल बनवाने की मांग को लेकर संघर्ष कर रही है. श्रीराम भी दिया की ख़ातिर गांव पहुंचता है.

शुरुआत में तो उसे गांव की ज़िंदगी से नफ़रत होती है लेकिन बाद में वो अपने प्यार के लिए पुल बनवाने में दिया की पूरी मदद करता है.

दिया, श्रीराम की इज़्ज़त करने लगती है. लेकिन तभी उसे पता चलता है कि श्रीराम ने उसकी पीठ पीछे कुछ ऐसा किया है जिसके परिणाम घातक साबित हो सकते हैं.

आगे क्या होता है ? यही फ़िल्म की कहानी है.

स्क्रीनप्ले

एक लड़का लड़की का मिलना, एक दूसरे से शुरुआत में नफ़रत करना, फिर प्यार करने लगना, ऐसी कहानी न जाने कितने बार बॉलीवुड में आ चुकी है. लेकिन अरशद सैयद और पुनीत मल्होत्रा ने कहानी में कई दिलचस्प घटनाओं को पिरोया है ताकि दर्शकों की रुचि फ़िल्म में बनी रहे.

(रिव्यू: 'कृष-3')

फ़िल्म का पहला हिस्सा हल्का-फुल्का और मज़ेदार है जो युवाओं और मल्टीप्लेक्स दर्शकों को पसंद आएगा. इंटरवल के बाद फ़िल्म की कहानी शहर से गांव में शिफ़्ट हो जाती है और फ़िल्म यहीं अपनी पकड़ खो देती है.

इंटरवल के बाद इसमें मनोरंजन का वो पुट नहीं है जो शुरुआत में है. नदी पर पुल बनवाने का बीड़ा अकेले करीना कपूर संभालती है.

ये काम एक अकेले शख़्स के हिसाब से कुछ ज़्यादा भारी-भरकम लगता है और पर्दे पर विश्वसनीय नहीं लगता.

लेकिन इस हिस्से में भी हास्य है जो फ़िल्म को पूरी तरह डूबने से बचाए रहता है. साथ ही कुछ दिलचस्प मोड़ हैं जिससे फ़िल्म में दर्शकों की रुचि बनी रहती है.

हां फ़िल्म का क्लाईमेक्स ज़रूर कमज़ोर है. श्रीराम का शादी से भाग जाना और ऐसे ही कुछ सीन काफ़ी अच्छे बन पड़े हैं. फ़िल्म के संवाद भी मज़ेदार हैं.

अभिनय

इमरान ख़ान ने अपने रोल को अच्छे से निभाया है. करीना कपूर फ़िल्म में बहुत ख़ूबसूरत लगी हैं और उन्होंने अपने किरदार को भी बखूबी निभाया है.

श्रद्धा कपूर ने अतिथि भूमिका में अच्छा काम किया है. बाकी कलाकारों का काम भी अच्छा है.

पुनीत मल्होत्रा का निर्देशन अच्छा है. इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले कमज़ोर होने के बावजूद उनके कहानी कहने के ढंग ने दर्शकों को बोर होने से बचाए रखा.

उन्होंने कलाकारों से भी अच्छा काम निकलवाया है. विशाल-शेखर का संगीत अच्छा है. टूं-टूं और च्युंगम चबा के जैसे गाने तो पहले ही मशहूर हो चुके हैं.

कुल मिलाकर 'गोरी तेरे प्यार में' एक ठीक-ठाक फ़िल्म है. इंटरवल के बाद फ़िल्म कमज़ोर पड़ जाती है. सिंगल स्क्रीन थिएटरों में फ़िल्म के चलने की गुंजाइश बेहद कम है.

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