जिय हो बिहार के फ़िरंगी लाला !

चार्ल्स थॉमसन

"नमस्ते जी! मैं देहाती फ़िरंगी हूँ ना.…बिहार का…आपसे मिलके अच्चा लगे..".

कुछ ऐसी हिंदी है चार्ल्स थॉमसन की. गोवा में चल रहे एनएफ़डीसी के फ़िल्म बाज़ार में मुझे ये शख़्स मिला जो गहरे लाल रंग के कुर्ते में लोगों को अपना परिचय कुछ ऐसे ही दे रहा है.

(मनोज कुमार की हॉलीवुड को 'चुनौती')

हाथ जोड़ कर सर झुकाए सबको नमस्ते कहना और उनका ध्यान आकर्षित कर, उनसे हिंदी में घंटों गप्पे हांकना चार्ल्स थॉमसन की ख़ासियत है.

थोड़ी देर उन्हें दूर से देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जाते ही चार्ल्स से हिंदी में बात करनी शुरू की.

मेरे एक एक सवाल के चार्ल्स के पास दो-दो जवाब. मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी.

(रेखा ने किसके पैर छुए)

मैं जानना चाहता था कि कोई विदेशी कैसे ऐसी स्पष्ट हिंदी, भारतीय हाव-भाव से और हिंदुस्तानी व्यंग्य को समझते हुए बोल सकता है.

'मैं हूँ बिहारी फ़िरंगी'

"देखिये ना मैं हूँ बिहारी फ़िरंगी." जब चार्ल्स ने ऐसा कहा तो मैंने पूछा, "वो कैसे." चार्ल्स ने बताना शुरू किया, "मैं 11 साल की उम्र में सिडनी से अकेले भारत आ गया था और आते ही मैं बिहार में बस गया. मुझे बचपन से भारत बहुत आकर्षित करता था और भारत आकर हिंदी सीखने के लिए बिहार से अच्चा क्या होता. 12 साल मैं बिहार में साधु संतों के साथ रहा, हिंदी सीखी, योग सीखा. तो हो गया ना मैं बिहारी फ़िरंगी."

23 साल की उम्र में चार्ल्स वापस अपने देश ऑस्ट्रेलिया चले गए. उन्होंने एक थाई रेस्टारेंट में काम किया और कई हिंदी भाषी दोस्त बनाए.

सिडनी में चार्ल्स की दोस्ती शशांक केतकर से हुई जो मराठी टीवी जगत के सुपरस्टार हैं . शशांक ने चार्ल्स को भारत बुलाया और एक मराठी फ़िल्म के लिए ऑडिशन देने को कहा.

'टॉम आल्टर के बाद अब मैं'

चार्ल्स ने वीर सावरकर पर बनने वाली मराठी फ़िल्म '1909' का ऑडिशन दिया और उसमें उन्हें सरकारी अफ़सर जैक्सन के रोल के लिए चुन लिया गया.

चार्ल्स बोले, "मुझे एक्टिंग का बहुत शौक है. देखिये ना में आया बॉलीवुड में काम करने मुझे मराठी ने पकड़ लिया. अगले महीने मेरी फ़िल्म आएगी और फिर हिंदी फ़िल्में भी मिलेंगी क्योंकि टॉम आल्टर के बाद में ही एक हिंदी बोलने वाला फ़िरंगी हूं."

(सागर किनारे फ़िल्मों का मेला)

चार्ल्स इस फ़िल्म बाज़ार में निर्माताओं, निर्देशकों और लेखकों से लगातार बात करके अपने संपर्क सूत्र बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

उनका विज़टिंग कार्ड भी उन्हें अनोखी पहचान देता है जिस पर तिरंगे के साथ लिखा है, वन्दे मातरम.

'मुझे राहुल गांधी समझते है लोग'

चार्ल्स ने मुझे एक रोचक किस्सा सुनाया. "मैं कुंभ के मेले में गया. वहां मुझे लोग बड़ी अहमियत देने लगे. वहां पर तैनात सरकारी अधिकारियों ने मुझे सलाम किया. किसी ने सुरक्षा जांच वाली जगह पर मेरी जांच भी नहीं की. मैं समझ नहीं पाया कि ये हो क्या रहा है. जब मैं आगे बढ़ा तो मुझे सुनाई पड़ा- ये राहुल गांधी है. इन्हें जाने दो."

फ़िलहाल चार्ल्स दिल्ली में एक गैर सरकारी संस्था से जुड़े हैं. वो गांवों में बैंकिंग की सुविधा और उसके इस्तेमाल के लाभ ग्रामीण लोगों तक लेकर जाते है .

लेकिन उनका सपना तो बॉलीवुड में आने का ही है. जिसके बारे में वो ख़ासे आशान्वित है. चार्ल्स कहते हैं, "मुझ जैसे बिहारी फ़िरंगी को बॉलीवुड में चांस तो मिलेगा ही."

जाते-जाते चार्ल्स ने मुझे वज़न कम करने की भी हिदायत दे डाली.

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