फ़िल्म रिव्यू: 'आर..राजकुमार'

'आर..राजकुमार'

रेटिंग: *1/2

इरॉस इंटरनेशनल नेक्स्ट जेन फ़िल्म्स की ‘आर..राजकुमार’ एक्शन से भरपूर एक लव स्टोरी है. शिवराज (सोनू सूद) और परमार (आशीष विद्यार्थी) धरतीपुर गांव में रहते हैं.

दोनों कट्टर दुश्मन हैं और अजित टका (श्री हरि) को ड्रग्स की सप्लाई करते हैं जो हांगकांग में रहता है.

(रिव्यू: 'बुलेट राजा')

फिर कहानी में एंट्री होती है रोमियो राजकुमार (शाहिद कपूर) की जो शिवराज का भरोसा जीतकर उसके गैंग में शामिल हो जाता है.

वो चंदा (सोनाक्षी सिन्हा) से मोहब्बत करने लगता है. चंदा, परमार की भतीजी है.

दोनों की मोहब्बत जब परवान चढ़ने लगती है तभी परमार और शिवराज दुश्मनी भुलाकर एक दूसरे के दोस्त बन जाते हैं और परमार अपनी भतीजी का हाथ, शिवराज के हाथ में सौंपने का फ़ैसला कर लेता है.

(रिव्यू: 'सिंह साहब द ग्रेट')

इससे राजकुमार और शिवराज एक दूसरे के आमने-सामने आ खड़े होते हैं और एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं. आगे क्या होता है, यही फ़िल्म की कहानी है.

बासी कहानी

Image caption शाहिद कपूर का व्यक्तित्व इस रोल के लिए बिलकुल फ़िट नहीं है.

प्रभु देवा की लिखी कहानी बेहद पुरानी और घिसी-पिटी है. लड़का-लड़की का प्यार, फिर उनके प्यार के बीच में खलनायक का आ जाना, ऐसी कहानी बरसों से हम देखते चले आ रहे हैं.

प्रभुदेवा, सुनील अग्रवाल और रवि एस सुंदरम के लिखे स्क्रीनप्ले भी एकदम नीरस और बासी हैं. कहानी में तर्कों की धज्जियां उड़ा दी गई हैं. जैसे, जहां पर भी राजकुमार मार-धाड़ करता है वहां बिना किसी वजह के चंदा का आ जाना, बिल्कुल अतार्किक और बेवक़ूफ़ाना लगता है.

(रिव्यू: 'गोरी तेरे प्यार में')

साथ ही शाहिद कपूर जैसी रोमांटिक हीरो की छवि वाले कलाकार का ज़ोरदार एक्शन करना और एक साथ 20-30 गुंडों को धूल चटा देना भी गले नहीं उतरता.

लेखक ने ये बताने की ज़हमत भी नहीं उठाई कि भला कैसे राजकुमार इतना शक्तिशाली है.

सस्तापन

इंटरवल से पहले फ़िल्म में कई कॉमिक सीन डालकर दर्शकों को हंसाने की कोशिश की गई है लेकिन ये कोशिश कुछ ख़ास कामयाब होती नहीं दिखती.

इंटरवल के बाद फ़िल्म में कई स्टंट और एक्शन सीन हैं. कुछ तो असरदार बन पड़े हैं लेकिन एक भी सीन ऐसा नहीं है जो दर्शकों को चौंका सके. फ़िल्म खींची गई भी लगती है.

फ़िल्म में सिंगल स्क्रीन दर्शकों को आकर्षित करने के लिए कई बेवजह के मसाले डाले गए हैं.

(रिव्यू: 'राम-लीला')

फ़िल्म के कई दृश्य और भाषा, महिलाओं और बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं है और इस वजह से एक बड़ा दर्शक वर्ग फ़िल्म से दूर रहेगा. संवाद ठीक ठाक हैं लेकिन कोई बहुत ज़्यादा असरदार नहीं बन पड़े हैं.

‘सायलेंट हो जा..वर्ना वायलेंट हो जाऊंगा’ और ‘प्यार प्यार प्यार या मार मार मार’ जैसे संवाद फ़िल्म में इतनी बार दोहराए गए हैं कि अपना असर ही नहीं छोड़ पाते.

अभिनय

Image caption सोनाक्षी सिन्हा ने ठीक-ठाक अभिनय किया है लेकिन फ़िल्म में उनके कपड़ों का चुनाव बेकार है.

शाहिद कपूर ने अपने रोल को ईमानदारी से निभाने की पूरी कोशिश की है लेकिन उनका व्यक्तित्व इस रोल के लिए बिल्कुल भी फ़िट नहीं है. हां, उन्होंने डांस बेहतरीन किया है.

सोनाक्षी सिन्हा ने भी ठीक काम किया है लेकिन फ़िल्म में उनके ड्रेसेज बेकार हैं.

(रिव्यू: 'कृष-3')

आशीष विद्यार्थी भी ठीक रहे हैं लेकिन हास्य दृश्यों में नहीं जम पाए हैं. सोनू सूद ने अच्छा अभिनय किया है. प्रभु देवा ने एक गाने में अपनी छाप छोड़ी है.

प्रभु देवा का निर्देशन बेहद साधारण है. प्रीतम का संगीत अच्छा है. गंदी बात और साड़ी के फॉल जैसे गाने मनोरंजक हैं.

कुल मिलाकर ‘आर..राजकुमार’ सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को लुभा सकती है लेकिन मल्टीप्लेक्स दर्शकों के लिए फ़िल्म में कुछ नहीं है.

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