थोड़ा काम, ज़्यादा आराम, यही मेरी फितरत: फारुख़ शेख़

  • 12 दिसंबर 2013
फारुख़ शेख़ और सारिका
हाल ही में फारुख़ शेख़ और सारिका 'कल्ब 60' में नज़र आए.

अभिनेता फारुख़ शेख़ का नाम सुनते ही शायद आपके ज़हन में आती हों 'चश्मेबद्दूर', 'साथ-साथ' और 'कथा' जैसी फ़िल्में.

फारुख़ साहब ने अपने करियर की शुरुआत की 1973 में आई फ़िल्म 'गरम हवा' से और वो हाल ही में नज़र आए 'क्लब 60' में. चालीस सालों से लगातार अभिनय से जुड़े फारुख़ शेख़ कहते हैं कि वह कम काम और ज़्यादा आराम में यकीन रखते हैं.

बीबीसी से हुई बातचीत के दौरान फारुख़ शेख़ बोले, ''थोड़ा काम करना और ज़्यादा आराम करना मेरी फितरत में शामिल है. एक दिन काम किया तो चार दिन आराम कर लो. वरना ऐसा लगता है मानो आप किसी दफ्तर में जा रहे हैं. मुझे उससे बहुत बोरियत होती है.''

फारुख़ साहब कहते हैं, ''मैं रोज़ काम नहीं कर सकता. अगर कोई मुझसे कहे कि मुझे रोज़ाना काम करना है तो मैं भाग जाऊंगा. अगर इंडस्ट्री में कोई मुझे कहे कि साहब आप साल में छह फ़िल्में कर लीजिए तो भी मैं भाग जाऊंगा. वैसे कम काम करना मेरे ही नहीं बल्कि दर्शकों की सेहत के लिए भी अच्छा है.''

फारुख़ शेख़ कहते हैं कि उन्हें कम फ़िल्मों में ही काम करना अच्छा लगता है.

भई फारुख़ शेख़ का कम काम करना उनके लिए अच्छा हो सकता है लेकिन दर्शकों को इससे क्या फायदा है भला? इस सवाल का जवाब देते हुए वह कहते हैं, ''अगर दर्शक मुझे सुबह-शाम, हर रोज़, हर जगह देखने लग गए तो वे जल्द ही मुझसे ऊब जाएंगे. यही सोचेंगे कि कमबख़्त जाता ही नहीं है, लगा ही रहता है.''

फारुख़ शेख़ ये भी मानते हैं कि फ़िल्में करना उनका एक शौक है. वह कहते हैं, ''फ़िल्में करना मेरा जूनून नहीं है. बल्कि ये तो मेरा एक शौक है. एक ऐसा शौक जिसे करने से मुझे पैसे भी मिल जाते हैं.''

सुनिए फारुख़ शेख़ से खास बातचीत

फ़िल्में करने का शौक तो अपनी जगह ठीक है लेकिन चालीस साल के लंबे करियर में कभी ऐसा हुआ कि उन्हें लगा कि करने को फ़िल्में नहीं हैं, कोई पूछ नहीं रहा? इस सवाल का जवाब भी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में देते हुए फारुख़ साहब कहते हैं, ''मैंने कभी भी ज़्यादा फ़िल्में करना पसंद नहीं किया. न ही मैं उस श्रेणी में कभी था कि ये है तो बस अब हमारी फ़िल्म 100 करोड़ का बिज़नेस कर लेगी.''

फारुख़ साहब कम फ़िल्में करते हुए भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे.

फ़ारुख़ के मुताबिक़, ''मेरे साथ तो ये होता था कि मेरी फ़िल्म या तो चलती थी या फिर नहीं चलती थी. ये होता था कि फारुख़ शेख़ कि वो फ़िल्म नहीं चली. या ये होता था कि फारुख़ शेख़ कि वो फ़िल्म नहीं चली. ये कभी नहीं होता था कि फारुख़ शेख़ की वजह से ये फ़िल्म चल पड़ी. न तो हम पर फ़िल्म चलाने कि ज़िम्मेदारी थी और न ही हमारे नाम से वो कमाल जुड़ता था. तो मेरे साथ ये कभी नहीं हुआ कि अब तो मामला निपट गया.''

साथ ही वह ये भी कहते हैं कि किसी ने कभी ये नहीं कहा कि देखिए ये तो बड़े बॉक्स ऑफिस स्टार थे पर अब तो इनकी फ़िल्में पिट जाती हैं.

फारुख़ शेख़ ये भी स्वीकार करते हुए ज़रा नहीं झिझकते कि वह कभी भी ए-लिस्ट की श्रेणी में आने वाले स्टार नहीं रहे. वह कहते हैं, ''सैकड़ों फ़िल्में हर साल बनती हैं. और मुख्य किरदार निभाने वाले कलाकार गिनती के 15 या 20 होंगे. तो जो बहुत टॉप के सितारों को काम मिलेगा वो काम आप को नहीं मिल सकता.''

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